राजनीति के अखाड़े में बच्चों का इस्तेमाल

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- Author, आरज़ू आलम
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
दिल्ली विधानसभा के चुनाव प्रचार अभियान में बच्चों से धड़ल्ले से काम लिया जा रहा है.
चुनाव प्रचार के आख़िरी चरण में चुनावी अभियान में तेज़ी लाने के लिए विभिन्न दलों के उम्मीदवार अपने हुजूम में नौ साल से 14 साल के बच्चों को शामिल कर काम ले रही हैं.

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कई जगहों पर इन बच्चों से रैलियों में नारेबाज़ी कराई जाती है, तो कुछ को रैली या सभा में हुजूम के लिए जमा किया जाता है.
कुछ सभाओं में इनसे पर्चा बंटवाने का काम लिया जा रहा है. इनमें ज़्यादातर बच्चे पास की किसी झुग्गी झोपड़ी से लाए जाते हैं.

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ये बच्चे इनके लिए आसानी से मिल जाते हैं.
जसोला गाँव की झुग्गियों में रहने वाले बॉबी को रैली में चिल्लाने के लिए 300 रुपए मिले हैं.
जसोला से ही कांग्रेस के उम्मीदवार की सभाओं में शामिल होने और प्रचार के लिए अनीस को 150 रुपए रोज़ के मिले हैं.

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वहां उन्हें खाने के लिए भी चीज़ें दी जाती हैं.
वो बताते हैं कि बड़ों को 300 रुपये मिलते हैं और बच्चों को 150. उन्होंने अब तक 4000 रुपये इकट्ठा कर लिए हैं.

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ओखला विधानसभा क्षेत्र से ही आप के उम्मीदवार की एक सभा में पर्चियां बाँटने वाले साहिल बताते हैं, "किसी किसी को सामान दिया जाता है, तो किसी किसी को लड्डू."
ख़ानपुर में रहने वाले गुडडू, रीतेश और बलबीर पहले झाड़ू का प्रचार कर रहे थे तो आज से कमल का प्रचार कर रहे हैं.

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उन्हें 200 से 500 रुपये तक मिलने की उम्मीद है.
देखा जाए तो दलों के उम्मीदवार अपनी रैलियों में भीड़ दिखाने के लिए बच्चों तक को पैसे या खाने-पीने के समान का लालच दे कर बुलाते हैं.

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इसके लिए वे उसी इलाके के ही लोगों की मदद लेते हैं.
प्रचार के दौरान इनकी देखभाल और सुरक्षा का भी कोई ध्यान नहीं रखा जाता और उन्हें गाड़ियों की छतों से लेकर बोनट तक पर बैठा कर घुमाया जाता है.
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