भारत और अमरीका के बीच 'फंसा परमाणु पेंच'

इमेज स्रोत, Getty
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
अमरीका में आमतौर से आपसी रिश्ते लैटिन के तीन शब्दों 'क्वि़ड प्रो को' पर आधारित होते हैं यानी दोनों पक्षों को एक दूसरे से फ़ायदा होना चाहिए.
ये सम्बन्ध दोनों के फ़ायदे पर टिका होता है. इसकी झलक अमरीका की विदेशी नीतियों में भी साफ़ दिखाई देती है.
मिसाल के लिए अमरीका और पाकिस्तान के रिश्ते को देखिए. अमरीका हर साल पाकिस्तान को दो अरब डॉलर की असैन्य और फ़ौजी सहायता देता है जिसके बदले पाकिस्तान को अपने देश में अमरीका विरोधी तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान और दूसरे चरमपंथी संगठनों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी होती है.
अमरीका ने भारत के साथ 2007 में ऐतिहासिक असैन्य परमाणु समझौता करके भारत का वैश्विक परमाणु अलगाव समाप्त किया था जिससे भारत में परमाणु बिजलीघर के निर्माण का रास्ता खुल गया.
इजाज़त

इमेज स्रोत, MEA INDIA
अमरीका को आशा थी कि भारत अमरीकी कंपनियों को इसके बदले परमाणु बिजलीघरों के निर्माण के ठेके देगा. लेकिन ऐसा अब तक नहीं हो सका है.
इसका कारण है भारत का असैन्य परमाणु दायित्व क़ानून जिसके दो प्रमुख प्रावधानों का अमरीका विरोध कर रहा है.
क़ानून के अनुसार परमाणु कंपनियों को हादसे की सूरत में केवल मुआवज़ा ही नहीं देना पड़ेगा बल्कि उनके ख़िलाफ़ पीड़ितों को क़ानूनी कार्रवाई करने की इजाज़त भी होगी.
अमरीका चाहता है कि क़ानूनी कार्रवाई वाले इस हिस्से को भारत अपने क़ानून से हटा दे. लेकिन भारत ऐसा करने से इंकार करता आया है.
मतभेद
अब मतभेद का एक दूसरा पहलू सामने आया है.
अमरीका चाहता है कि उसके पास अमरीकी कंपनियों के ज़रिए भारत में बनाए जाने वाले हर परमाणु रिएक्टर को मुहैया की जाने वाले सामग्री और उपकरण की हमेशा के लिए निगरानी का अधिकार हो.
भारत ने इससे साफ़ इंकार कर दिया है.
इन दो मामलों पर किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए दोनों देशों ने वर्किंग ग्रुप्स बनाए है जिनकी तीसरी और आख़िरी बैठक लंदन में अभी ख़त्म हुई है.
ताज़गी

इमेज स्रोत, Getty
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता सैयद अकबरुद्दीन का कहना है कि लंदन वार्ता में प्रगति हुई है.
लेकिन हमेशा के लिए परमाणु सप्लाई पर निगरानी वाला मामला अटक गया है. अब दोनों वर्किंग ग्रुप्स ने इस पर अंतिम निर्णय बराक ओबामा और नरेंद्र मोदी पर छोड़ दिया है.
राष्ट्रपति बराक ओबामा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली में रविवार को द्विपक्षीय संबंधों पर बैठक कर रहे हैं जिसमें परमाणु मुद्दा अहम है.
मोदी के पिछले साल के अमरीका के दौरे के बाद दोनों देशों के बीच रिश्तों में गर्माहट आई है. इन दोनों नेताओं के बीच निजी दोस्ती से संबंधों में ताज़गी आई है.
समझौता
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि अब द्विपक्षीय संबंधों में गहराई लाने की ज़रुरत है जिसके लिए परमाणु मुद्दे पर समझौता ज़रूरी है.
ओबामा अमरीका के पहले राष्ट्रपति हैं जो अपने काल में भारत का दूसरा दौरा कर रहे हैं.
अमरीकी विश्लेषक कहते हैं कि ओबामा को मोदी से बहुत उम्मीदें हैं, इसीलिए वो दोबारा भारत के दौरे पर आने के लिए तैयार हुए है.
शायद उन्हें अपने दोस्त से 'क्वि़ड प्रो को' का इंतज़ार हो.
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>












