धर्मांतरण के मुद्दे पर इतना हंगामा क्यों?

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत में इन दिनों जबरन धर्म परिवर्तन पर खासी बहस छिड़ी हुई है और इसी बीच सरकार ने इसको रोकने के लिए अलग से क़ानून बनाने की पेशकश रखी है.

मगर सरकार की इस पेशकश से धार्मिक संगठन और विपक्षी दल खुश नहीं हैं. उनका कहना है कि भारतीय दंड संहिता(आईपीसी) और दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) में जबरन धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए पहले से ही प्रावधान हैं.

कुछ धार्मिक संगठनों का आरोप है कि इस तरह का क़ानून लाकर सरकार हिंदूवादी संगठनों की ही मदद करना चाहती है.

पढ़िए रिपोर्ट विस्तार से

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भारत में छह राज्य ऐसे हैं जिन्होंने जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ अपने स्तर पर अलग-अलग क़ानून बनाए हैं. ये राज्य गुजरात, ओडिशा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, अरुणाचल प्रदेश और हिमाचल प्रदेश हैं.

तमिलनाडु में भी यह क़ानून था. मगर वर्ष 2004 में इसे ख़त्म कर दिया गया.

अब पूरे भारत में जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ एक क़ानून बनाने की सरकार वकालत कर रही है और इस मुद्दे को लेकर संसद में काफी बहस चल रही है. विपक्षी दलों के तेवर इस मुद्दे पर काफी तीखे हैं.

भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ अपने धर्म पर चलने की आज़ादी संविधान ने दे रखी है.

कानून पर सवाल

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संविधान के अनुच्छेद 25 (1) में अपने धर्म पर चलने और उसका प्रसार करने का अधिकार नागरिकों दिया गया है. तो क्या अलग से जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ वाक़ई एक सख्त क़ानून की ज़रूरत है.

विपक्षी दलों का आरोप है कि यदि अलग से इस तरह का क़ानून लाया जाता है तो इसका दुरुपयोग हिंदूवादी संगठन, अल्पसंख्यकों के खिलाफ कर सकते हैं.

अखिल भारतीय क्रिश्चियन काउंसिल के महासचिव जॉन दयाल को लगता है कि जिसे रोकने की बात कहकर सरकार यह क़ानून लाना चाहती है उसका प्रावधान पहले ही आईपीसी और सीआरपीसी में किया गया है.

वो कहते है, "अलग क़ानून से केवल दक्षिण पंथी हिंदूवादी संगठनों का तुष्टिकरण होगा. हमें सबसे पहले साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए क़ानून बनाना चाहिए. हमारे सामने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का उदहारण है जहाँ जब असामाजिक तत्व किसी धार्मिक स्थान पर हमला करते हैं तो उनके साथ पुलिस भी होती है."

दयाल का कहना है कि इस तरह के क़ानून से जिसकी सरकार है उसको फायदा होगा और पुलिस को उगाही का एक साधन भी मिल जाएगा.

अलग कानून की जरूरत नहीं

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संविधानविद सुभाष कश्यप का कहना है कि जो प्रावधान संविधान में हैं और जो क़ानून पहले से मौजूद हैं, उन्हें अगर ठीक तरीके से लागू किया जाता है तो अलग से जबरन धर्म परिवर्तन रोकने के लिए क़ानून की ज़रूरत नहीं है.

वो कहते हैं, "जब राजनीति बीच में आ जाती है, तब समस्या आ जाती है, राजनीतिक लाभ के लिए संविधान में दी गई आज़ादी का दुरुपयोग किया जाए."

पिछले सप्ताह उत्तर प्रदेश के आगरा में जबरन धर्मांतरण के आरोप के बाद उठे विवाद ने काफी तूल पकड़ा है. ख़ास तौर पर आगामी 25 दिसंबर को हिंदूवादी संगठनों के 'धर्म वापसी' कार्यक्रम की घोषणा के बाद इस पर तीखी बहस छिड़ गयी है.

धर्म के नाम पर सियासत

भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा है कि जो भी अपनी मर्ज़ी से धर्म बदलता है उसमे कोई हर्ज नहीं है.

उनका दावा है कि ग़ैर-हिन्दुओं में 90 प्रतिशत वो लोग हैं जिन्हें ज़बरदस्ती उनके धर्म से हटाकर दूसरे धर्म को अपनाने के लिए मजबूर किया गया था.

वहीं ऑल इंडिया मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने स्वामी की बातों का खंडन करते हुए कहा कि यह धारणा ग़लत है.

ओवैसी ने कहा कि भारत में इस्लाम किसी बादशाह की तलवार की नोक पर नहीं आया बल्कि सूफियों के ज़रिए आया है.

उनका कहना था कि भाजपा को चाहिए कि सबसे पहले वो अपनी सरकार के मुस्लिम मंत्रियों की 'घर वापसी' करें.

इस मुद्दे पर हो रही बहस के बीच सुभाष कश्यप कहते हैं, "आप इसे किसी ओर से देख लीजिए. असली समस्या यह है कि यह धार्मिक स्वतंत्रता का मुद्दा नहीं है. मुद्दा है कि धर्म के नाम पर सियासत कैसे की जाए."

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