बर्लिन की सड़कों पर बिकती है गीता

इमेज स्रोत, Pratiksha Thangi
- Author, डॉक्टर प्रतीक्षा थांकी
- पदनाम, लेखक और शोधकर्ता, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
अगर संस्कृत को लेकर हो-हल्ला होगा तो चाहे-अनचाहे जर्मन भाषा पर बात होगी ही. अजीब विडंबना है कि भारत के बाहर अगर कोई देश संस्कृत की वाजिब चिंता करता है तो वह जर्मनी है.
बर्लिन की सड़कों पर आपको जर्मन भाषा में गीता की प्रतियां और संस्कृत-जर्मन शब्दकोश आसानी से मिल जाएंगे.
जर्मन-संस्कृत के विद्वान नियमित रूप से अपने शोधपत्र प्रकाशित करते रहते हैं. ऊंघती संस्कृत भाषा को यूरोप के इस शक्तिकेंद्र में हरसंभव तवज्जो मिलती है.
इसके बावजूद भारत के मानव संसाधन मंत्रालय ने पहले जर्मन को त्रिभाषा योजना में शामिल करने का निर्णय लिया और अब उसकी जगह संस्कृत या किसी अन्य भारतीय भाषा को रखने का फ़ैसला. हालांकि 2011 तक यही व्यवस्था थी.
बहस की गड़बड़ी

भारत सरकार के इस फ़ैसले को बहुत ज़्यादा चर्चा मिल रही है. जर्मनी ने इस संबंध में भारत को नया प्रस्ताव दिया है ताकि जर्मन भाषा को हायर सेकेंडरी कक्षाओं में पढ़ाया जा सके.
जर्मनी में रहने वाले भारतीय के तौर पर मुझे यह सारी बहस ही थोड़ी गड़बड़ लगती है. यह एक कूटनीतिक आदान-प्रदान है.
आख़िरकार भारत को हर छात्र कोई भी और चाहे जितनी भी भाषाएं सीखने के लिए स्वतंत्र है, फिर इसे इतना बड़ा मुद्दा क्यों बनाया जा रहा है?
एक बात हमें सीधे तौर पर समझ लेनी चाहिए कि जर्मनी कई बड़े उद्योगों का केंद्र है, वहाँ रोज़गार के काफ़ी अवसर हैं और दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय हैं जो बच्चों के सिर पर कभी न ख़त्म होने वाले छात्र ऋण का बोझ नहीं लादते.
जर्मनी का आकर्षण

इमेज स्रोत, Pratiksha Thagi
जर्मनी में उम्रदराज लोगों की जनसंख्या बढ़ रही है और यह बीसवीं सदी की छाया से निकलकर लोकप्रिय हो रहा है जिसके कारण इसके प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ रहा है.
जर्मनी में काम करने की एक ही शर्त है कि आपको जर्मन भाषा आनी चाहिए. आप इसे अपने स्कूल में अनिवार्य भाषा के रूप में सीखते हैं या नहीं, यह आपकी समस्या है.
जर्मन मीडिया में आने वाली ख़बरों के मद्देनज़र यह कहा जा सकता है कि भारतीयों को रोज़गार दिलाने के मामले में जर्मन संस्कृत से काफ़ी ज़्यादा मददगार साबित हो सकती है.
इस बात को परखने के लिए भारत में सक्रिय जर्मन कंपनियों की सूची पर नज़र डाल लेना काफ़ी होगा.
उपयोगिता की बहस

इमेज स्रोत, THINKSTOCK
किसी भाषा की उपयोगिता का विषय हमेशा विवादित रहा है. लेकिन हानि-लाभ की सूची बनाई जाए तो रोज़गार की दृष्टि से जर्मन व्यावहारिक रूप से ज़्यादा उपयोगी होगी.
बहरहाल, एक और भाषा सीखना कभी भी घाटे का सौदा नहीं होता.
जर्मनी के हाइडलबर्ग विश्वविद्यालय में चलने वाला 'ग्रीष्मकालीन संस्कृत संभाषण स्कूल' (द समर स्कूल ऑफ़ स्पोकेन संस्कृत) इस बात को शायद अच्छी तरह समझता है.
अध्यात्म की भाषा

इमेज स्रोत, THINKSTOCK
संस्कृत भाषा को प्रोत्साहन देने के पीछे भारत की सांस्कृतिक विरासत को सम्मानित करने का उद्देश्य है.
दुनिया की बड़ी आबादी के लिए यह अध्यात्म की भाषा भी है. आज भले ही संस्कृत उतनी सक्रिय भाषा न हो लेकिन विभिन्न भारतीय भाषाओं में यह आज भी जीवित है.
अपनी भाषा का सम्मान करना क्या होता है इसे जर्मनी अच्छी तरह समझता है.
जर्मनी के महान कवि गोएथे भारतीय कवि कालिदास के बड़े प्रशसंक थे.
सदियों पुराना रिश्ता

इमेज स्रोत, THINKSTOCK
गोएथे ने कालिदास के बारे में कई सराहनीय बातें कही हैं जो किसी भी भाषा में कालिदास पर शोध करने वाले शोधार्थियों के आज भी काम आ सकती हैं.
जिस तरह की बहस खड़ी हुई है उसे देखते हुए कई ज्ञानपिपासुओं को फिर से इन दोनों महान रचनाकारों को पढ़ना पड़ेगा.
फौरी बहस में कही गयी अधपकी बातों से दोनों भाषाओं के बीच सदियों पुराना संबंध टूटेगा नहीं क्योंकि ये दोनों भाषाएं एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी नहीं है.
आख़िरकार 'संस्कृत और जर्मन' सुनने में हर हाल में 'संस्कृत बनाम जर्मन' से ज़्यादा भला लगता है.
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi " platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi " platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>












