रोहतक बहनों ने दिखाया बंटे भारत का सच

- Author, रूपा झा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, रोहतक से लौटकर
हरियाणा में एक बस में कथित छेड़छाड़ के विरोध में लड़कों से भिड़ने वाली बहनें इस हफ़्ते मीडिया और सोशल मीडिया में छाई रहीं.
शुरू में प्रशंसा के बाद इन पर कई आरोप लगाए गए. इन बहनों का एक और वीडियो सामने आया है. दूसरे वीडियो के सामने आने के बाद तो मामला और उलझ गया है.
बीबीसी संवाददाता रूपा झा ने रोहतक जाकर इस मामले को समझने की कोशिश की.
पढ़िए पूरी रिपोर्ट
भारत में लिंगभेद की बात करें, तो आंकड़ों में हरियाणा की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है.

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इस राज्य में देश का सबसे ख़राब लिंगानुपात है. यह एक समृद्ध और पितृसत्तात्मक समाज है.
पिछले हफ़्ते यहीं दो बहनों ने एक बस में कथित छेड़खानी करने वालों को मुंहतोड़ जवाब दिया.
उन्हें बसों में महिला शोषण के ख़िलाफ़ खड़ी होने वाली के रूप में, #rohtakbravehearts, के नाम से पूरे भारत में प्रशंसा मिली. दोनों सोशल मीडिया की चहेती बन गईं और राज्य सरकार से सम्मानित होने वाली थीं.
दिल्ली सामूहिक बलात्कार के बाद से महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों की ख़बरें ज़्यादा रिपोर्ट हो रही हैं और महिलाओं के खिलाफ हिंसा की ओर ज़्यादा ध्यान जाने लगा है. ऐसे में इन दोनों बहनों को मिसाल के रूप में देखा गया .
उसके बाद पलटवार शुरू हुए. एक और वीडियो सामने आया, जिसमें कुछ समय पहले इन लड़कियों को पार्क में एक आदमी को पीटते दिखाया गया.
इसके बाद इन बहनों की कहानी अचानक संदिग्ध नज़र आने लगी- कम से कम कुछ लोगों को.

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अचानक इस बात का शक कि शायद इन्होंने और भी लड़कों को पीटा है या ये झगड़े करती हैं- ये सारी बातें उन पर शक करने के लिए काफ़ी हो गईं.
दोनों बहनों का सरकारी स्वागत टाल दिया गया और अब उनकी बहुत कम चर्चा हो रही है. मीडिया की मशीन आगे बढ़ चुकी है.
'शाप'
मैं हरियाणा के उस उलझे हुए समाज को समझने वहां गई, जहां से यह बवंडर उठा था. थाना खुर्द गांव में मैं जिस पहले व्यक्ति से मिली, वह नीली कमीज़ और जीन्स पहने हुए लड़का था और उसकी राय ठोस थी.
"वो चरित्रहीन हैं", उसने कहा, "वो बहुत ज़्यादा तेज़ हैं." और फिर बोला, "मुझसे अब ज़्यादा न पूछो."

यह गांव, जो एक छोटा कस्बा बन रहा है, बदलाव के मुहाने पर है. गांव के ज़्यादातर लोग ग़ुस्से से भरे हैं- "वे मिस वर्ल्ड नहीं हैं", "वे अकेली लड़कियां नहीं हैं, जिन्हें छेड़ा जा रहा है."
यहां कोई भी उन हज़ारों लोगों से सहमत नज़र नहीं आता जो लोग इन लड़कियों के समर्थन में उमड़े थे.
लड़कों के रिश्तेदारों की शिकायत यह है कि मामले की निष्पक्ष सुनवाई के बजाय मीडिया ट्रायल किया जा रहा है. और उनमें से कुछ जिन्होंने शुरू में लड़कियों का समर्थन किया था, दूसरा वीडिया सामने आने के बाद पीछे हट गए हैं.
दोनों बहनें इस नज़रिए को खुलकर ख़ारिज करती हैं. बड़ी बहन आरती ने कहा कि लोगों का जो मन है, वे कहते हैं.
"उन्हें लड़कियों को टिश्यू पेपर की तरह इस्तेमाल करने की आदत पड़ गई है और इसीलिए वे हम पर अजीब तरह के आरोप लगा रहे हैं.. हमने कई बार आदमियों की पिटाई की है, जब भी उन्होंने हमसे बदतमीज़ी की कोशिश की है और हम क्यों न करें? आख़िर कब तक हम मर्दों का इस तरह का बर्ताव सहन करेंगे?"

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उनके पिता भी थक गए लगते हैं. इस घटना के बाद से वे काम पर नहीं गए हैं.
वह कहते हैं, "इस समाज में लड़की का बाप होना अभिशाप है और हम इसे भुगत रहे हैं. मैं तो बस यही उम्मीद करता हूं काश हमारा समाज ऐसा न होता."
'भाग्यवाद'
इन बहनों का अक्खड़पन समझ आता है. जिस रूढ़िवादी समाज से वो हैं, उसमें कई विसंगतियां हैं और उनसे मज़बूती से लड़ना और बात करना ऐसी चीज़ नहीं है जिसे उनके गांववाले आसानी से समझ सकें.
ऐसा भी नहीं कि उनके गांववाले यह मानते हों कि वे मामले को बढ़ा रही हैं. उनमें से कई स्वीकार करते हैं कि महिलाओं के साथ ऐसी घटनाएं अक्सर होती हैं और कुछ पलटकर जवाब भी देती हैं.

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लेकिन उन्हें इसकी ओर ध्यान न देने की आदत पड़ गई है. खड़े होकर विरोध करने के लिए अब तक यहां किसी को 'हीरो' दर्जा नहीं मिला है- कम से कम अभी तक तो नहीं.
तो इस घटना ने उस भारत को उजागर कर दिया है, जो बदल रहा है और बदलाव के तरीक़े से सहज नहीं है.
ऐसे रुढ़िवादी राज्यों में ये लड़कियां बेमेल लगती हैं. कई लोगों को इन लड़कियों का आत्मविश्वास अच्छा लगता है लेकिन शायद उनको लगता है कि इस गांव में इस पर टिप्पणी न ही की जाए तो बेहतर है.
यहां 'किस्मत में जो है सो होगा' वाला अहसास तारी है, या जो जैसा है वैसा ही रहे वाली स्थिति है-तो फिर इसमें दख़ल क्यों देना?
कोई नहीं जानता कि इस कहानी में सच क्या है, कहां है. बेशक इसमें कुछ भेद है जो शायद कभी पता न चले लेकिन हर नए बदलाव पर हर पक्ष उछल पड़ रहा है.
पर इन सबके बीच कम से कम लड़ती हुई इन बहनों ने यह तो दिखा ही दिया है कि इस नए भारत में क्या संभव है.
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