जंतर-मंतर पर क्यों हुआ हल्ला बोल?

- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
दिल्ली के जंतर-मंतर पर मंगलवार को विभिन्न सामाजिक संगठनों के बैनर तले क़रीब 10 हज़ार लोगों ने स्वास्थ्य, रोज़गार, शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर सरकार के सामने अपनी मांगें रखी.
बिहार में अररिया ज़िले के बेलसरा गांव के अशोक श्रीदेव कहते हैं कि उन्हें मनरेगा के भीतर काम मिलना बंद हो गया है, इसलिए वो सरकार को आवेदन देने आए हैं.
नए और पुराने मुद्दे

इस तरह की ख़बरें थीं कि मोदी सरकार मनरेगा स्कीम को पूरे देश की बजाए सिर्फ़ 200 ज़िलों तक सीमित कर देगी. हालाँकि सरकार ने साफ़ किया है कि उसका ऐसा कोई इरादा नहीं है, लेकिन मज़दूर पूरी तरह से आश्वस्त नहीं दिखते.
अशोक श्रीदेव और उनके साथी नागो श्रीदेव और दूसरे लोगों का कहना था कि वो अपने ख़र्च पर दिल्ली आए हैं और दो दिन से आनंद विहार रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर रातें गुज़ार रहे हैं.
लगभग 200 स्वयंसेवी संस्थाओं की मदद से निकाली गई इस देशव्यापी रैली में नए मुद्दों के साथ कुछ पुराने मुद्दे भी जुड़ गए हैं.
सरदार सरोवर
जिकू भाई जयसिंह भाई चावड़ी गुजरात के हैं, जिन्हें सरदार सरोवर बांध की वजह से हुए विस्थापन के लिए पांच एकड़ ज़मीन मुआवज़े में मिली थी.
लेकिन वो कहते हैं, "ये ज़मीन हमसे वापस ली जा रही है, हम क्या करेंगे, कहां जाएंगे?"

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उनसे पूछने पर कि आख़िर ये ज़मीन उनसे क्यों ली जारी है, वो कहते हैं कि आजकल सरकारें ग़रीबों की ज़मीन लेकर कॉर्पोरेट हाउसेज़ को दे रही हैं, ये क़दम भी शायद उसी का हिस्सा हो.
स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले संगठन अमूल्यनिधि के अनुसार सरकार हर क्षेत्र में सामाजिक सुरक्षा के कामों से पीछे हटने की कोशिश में है.
उसका दावा है कि प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों को निजी हाथों में देने की योजना बन रही है और ये स्वास्थ्य व्यवस्था को और कमज़ोर कर देगी.
जंतर-मंतर पर जो प्रदर्शन हुआ उसका नाम 'अबकी बार, हमारा अधिकार' रखा गया था.
मांगें

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दिन भर की बैठक के बाद शाम में मांगों की एक लिस्ट सरकार को सौंपी गई है.
इसमें भूमि, श्रम, रोज़गार, वन, सूचना, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के मुद्दों को लेकर ये कहा गया है कि उनमें किसी तरह की कोई कटौती न की जाए बल्कि उसे और बेहतर बनाया जाना चाहिए.
इसमें शामिल स्वयंसेवी संस्थाओं का कहना है कि वो अपने आंदोलन को गांव और क़स्बों के स्तर पर आगे भी जारी रखेंगी.

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स्वयंसेवी कार्यकर्ता अरुणा राय सवाल करती हैं जब लोग ही नहीं रहेंगे तो आख़िर सरकारें क्या काम करेंगी?
अरुणा राय कहती हैं कि सवाल-जवाब का वक़्त ख़त्म हो गया है और ये हुकूमत को चेतावनी है कि यहां यूं तो सिर्फ़ 10 से 12 हज़ार लोग जमा हुए हैं, लेकिन उनमें से एक-एक के साथ दस दूसरे लोग भी हैं.
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