मोदी के लिए कितना अहम पूर्वोत्तर भारत?

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनावों के दौरान पूर्वोत्तर भारत में कई रैलियां कीं. चुनाव जीतने के बाद भी मोदी इस क्षेत्र को नहीं भूले.
मोदी ने नगालैंड के 51वें स्थापना दिवस पर कोहिमा में पूर्वोत्तर भारत में विकास की कई योजनाओं को लागू करने का भरोसा दिया.
उन्होंने पूर्वोत्तर भारत को देश के दूसरे हिस्सों से जोड़ने के लिए 40 नई रेलवे लाइनों के निर्माण कार्य के लिए करीब 28 हज़ार करोड़ रुपए देने का वादा किया है.
उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के उस वादे को याद किया जिसमें सरकार ने बजट का दस फ़ीसदी हिस्सा उत्तर-पूर्व के विकास में लगाने का वादा किया था.
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दिल्ली की सड़कों पर अगर आप भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों के बारे में सवाल करें तो जवाब से महसूस होगा कि ये कोई अलग देश है. बेंगलुरु और दिल्ली जैसे शहरों में इस क्षेत्र के युवाओं पर हमले भी होते रहे हैं.
क्या इसलिए कि वहां के लोग अलग दिखते हैं? या उनका रहन-सहन अलग है? या फिर इसलिए कि उनके बारे में जानकारी कम है?
मैं उत्तर-पूर्वी राज्यों में एक पत्रकार की हैसियत से काम कर चुका हूँ और उनके बारे में कह सकता हूँ कि वो दिल्ली (उत्तर भारतीय के लोगों को वो दिल्ली वाले कहते हैं) वालों को शक की निगाह से देखते हैं.
उन्हें लगता है दिल्ली वाले खुद को उत्तर-पूर्वी राज्यों का हाकिम समझते हैं. वो ये भी यक़ीन रखते हैं कि केंद्र की सरकारें उनको नज़रअंदाज़ करती आई हैं.
आक्रामक रुख

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इसलिए उत्तर-पूर्वी राज्यों के अंदरूनी देहातों और छोटे शहरों के लोग दिल्ली वालों के ख़िलाफ़ आक्रामक रुख अपनाते हैं. मुझे भी शुरू में इस रवैए का सामना करना पड़ा था.
लेकिन जब मैंने उनसे सच्ची सहानुभूति दिखाई और उनकी समस्याओं को अपनी रिपोर्टों में उजागर करना शुरू किया तो उनका रवैया मेरे प्रति नरम हुआ.
इस सब के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उत्तर-पूर्वी राज्यों का दौरा काफी अहम साबित होगा. वो भारत के पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने इस पिछड़े क्षेत्र में लगातार तीन दिन गुज़ारे हैं.
उत्तर-पूर्वी राज्यों में रहने वालों को विकास तो चाहिए लेकिन उससे पहले उन्हें इंसाफ चाहिए.
दिल्ली पर राज करने वालों की तरफ से उनका हाथ पकड़ने वाला या उनके कन्धों पर हाथ रखने वाला चाहिए. उनके घावों पर मरहम लगाने वाला चाहिए.
जीता होगा दिल

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उनके सामाजिक समारोहों में शामिल होकर और उनकी संस्कृति के बारे में अच्छे शब्दों का इस्तेमाल करके प्रधानमंत्री ने वहां के लोगों का दिल ज़रूर जीता होगा.
दिल्ली में बैठ कर शायद इसका एहसास न हो लेकिन उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोगों के लिए देश के प्रधानमंत्री का इन समारोहों में शामिल होना बहुत बड़ी घटना है.
प्रधानमंत्री ने केवल समारोहों में शामिल हुए बल्कि उस क्षेत्र के विकास की बात भी कही और इससे सम्बंधित कई परियोजनाओं का ऐलान भी किया.
इसमें 28 हज़ार करोड़ रुपए की लागत से उस क्षेत्र में शुरू होने वाली रेलवे योजना भी शामिल है. मोदी ने वहां कनेक्टिविटी और आईटी क्षेत्र में विकास लाने की भी बात कही.
अनदेखी का इल्ज़ाम

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नरेंद्र मोदी पर इस क्षेत्र से संबंधित कई अहम मुद्दों को नज़रअंदाज़ करने का भी इल्ज़ाम लगाया जा रहा है.
जैसे, सेना को दिए गए विशेष अधिकार के क़ानून आर्म्ड फ़ोर्सेज़ स्पेशल पॉवर एक्ट (एएफएसपीएस) और नगा शांति प्रक्रिया पर उनकी ख़ामोशी से लोगों में मायूसी भी हुई है. इसके लिए उनकी आलोचना भी की जा रही है
प्रधानमंत्री के इस दौरे में एक बड़ा विवाद भी खड़ा हो गया है. उन्होंने बांग्लादेश के साथ भूमि की अदला-बदली समझौते को संसद की मंज़ूरी का वादा किया.
असम में उनकी पार्टी इसका विरोध करती आई है और चुनाव में इस समझौते पर कांग्रेस की कड़ी आलोचना भी की थी. लेकिन अब प्रधानमंत्री ने कांग्रेस सरकार द्वारा किए गए इस समझौते की पुष्टि कर दी है.
असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने इस ऐलान पर कहा है कि भाजपा उस मौसमी पंछी की तरह है जो चुनाव के पहले और इसके बाद रंग बदलती रहती है
नरेंद्र मोदी भले दिल्ली लौट गए हों लेकिन वहां की आम जनता फिलहाल प्रधानमंत्री के नरम शब्दों की गर्मी महसूस कर रही है.
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