सार्क: क्या हासिल और क्या है मंशा?

सार्क सम्मेलन में नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) का 18वां शिखर सम्मेलन गुरुवार को नेपाल के काठमांडू में संपन्न हुई.

दो दिन के इस सम्मेलन में अंतिम दिन गुरुवार को सदस्य देशों ने ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए समझौता किया. कुछ लोग इस सम्मेलन को सफल तो कुछ इसे असफल बता रहे हैं.

की सफलता-असफलता और सार्क की भूमिका पर बीबीसी के ज़ुबैर अहमद:

क्या चर्चित उपन्यास 'एलिस इन वंडरलैंड' में कोई सियासी पैग़ाम छिपा है?

इसका जवाब 1865 में जब से ये किताब छपी थी, तब से पूछा जा रहा है. इस पर आज भी कोई सहमति नहीं है. सहमति इस बात पर है कि पाठक जो अर्थ निकालना चाहे वह उसकी मर्ज़ी है.

अब उपन्यास के कल्पना-लोक से परे, नेपाल की राजधानी काठमांडू में 18वां सार्क सम्मलेन भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के नवाज़ शरीफ के गर्मजोशी से हाथ मिलाने पर ख़त्म हुआ.

रिश्तों में गर्मजोशी

सार्क के सदस्य देशों के झंडे
इमेज कैप्शन, दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) की स्थापना 1985 में हुई थी

दोनों नेता दो दिन तक सम्मलेन में साथ थे. लेकिन एक दूसरे से नज़रे चुराते रहे. आखिर में दोनों ने हाथ मिलाया और गर्मजोशी दिखाई.

अधिकतर लोग इसका सतही मतलब निकाल रहे हैं. इसे एक बेहतरीन तस्वीर या ख़बरों की एक सुर्खी से अधिक अहमियत नहीं दे रहे हैं.

लेकिन सकारात्मक तरीके से देखें तो यह आने वाले दिनों में सार्क के दोनों सदस्य देशों के बीच रिश्ते को आगे बढ़ाने का प्रतीक भी हो सकता है.

इस बात पर तो अनेक सहमत हैं कि सार्क की सफलता का दारोमदार इन दो बड़े देशों के अच्छे रिश्ते पर ही निर्भर है.

सफलता और असफलताएं

सार्क सम्मेलन में शामिल सदस्य देशों के नेता

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सार्क की स्थापना 1985 में हुई थी. आम राय यह है कि अब तक सफलताओं से अधिक असफलताएं इसके हाथ आई हैं.

सार्क ने अब तक कुछ छोटे कदम उठाए हैं. लेकिन अब ज़रुरत है बड़े कदम उठाने की.

सार्क की स्थापना के 30 साल बाद इसे प्रतीकों से आगे बढ़ कर देखने की ज़रुरत है. सार्क विश्वविद्यालय हो या सार्क सैटेलाइट, इसे इसकी वास्तविक उपलब्धि नहीं कह सकते.

संभावनाओं का द्वार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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दक्षिण एशिया में तरक्की की संभावनाएं अनेक हैं, चाहे कच्चा माल हो या कार्यकुशल श्रम, यहाँ सब कुछ मौजूद है.

सार्क की स्थापना के उद्देश्यों में एक था इस क्षेत्र को ग़ुरबत से उठा कर विकास के रास्ते पर लाना.

सार्क का मक़सद था क्षेत्र में एकीकरण, बेहतर कनेक्टिविटी और आपसी व्यापार बढ़ाना. इसमे ख़ास सफलता नहीं मिली है.

इसके विपरीत यूरोपीय संघ एक कामयाब गुट है, जहाँ एक देश का नागरिक दूसरे देश में बग़ैर पासपोर्ट के घूम सकता है, रह सकता है, नौकरी कर सकता है और संपत्ति खरीद सकता है.

यूरोपीय संघ की आर्थिक और व्यापारिक नीतियों से संघ के नागरिकों की ज़िन्दगी में फ़र्क़ आया है.

एक समय था जब संघ के कई सदस्य देश एक दूसरे के जानी दुशमन थे. लेकिन आज ये दुनिया का एक मज़बूत संघ है.

भारत की भूमिका

सार्क देशों की संस्कृति और रीति रिवाज लगभग एक जैसे हैं. आपस में आम लोगों के बीच मतभेद भी अधिक नहीं हैं.

लेकिन इसके बावजूद ये एक दूसरे से मीलों दूर हैं, जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा - 'सिंगापुर और दुबई जाना सार्क देशों में जाने के मुकाबले अधिक आसान और सस्ता है.'

सार्क शिखर सम्मेलन के मंच पर जमा नेता

उन्होंने कहा कि एक पंजाब से दूसरे पंजाब में व्यापार के लिए दुबई जाने की क्या ज़रूरत?

सार्क भी एक अटूट संघ बन सकता है. इसकी सफलता में भारत सबसे अहम भूमिका निभा सकता है.

नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में पहल भी की है. छह महीने पहले अपने शपथ ग्रहण के दौरान सार्क देशों के नेताओं को न्योता देना और नेपाल, भूटान का दौरा करना अहम कदम हैं.

काठमांडू में भारत सरकार की तरफ से सार्क व्यापारियों को तीन से पांच साल तक का वीज़ा देने की पेशकश भी ऐसा कदम है जो आने वाले दिनों में सार्क की कामयाबी का प्रतीक बन सकता है.

अब ज़रूरत है दूसरे सदस्य देशों के पहल करने की. अगले सार्क सम्मलेन का मेज़बान पाकिस्तान है. नवाज़ शरीफ और नरेंद्र मोदी के बीच यह गरमजोशी अगले सम्मलेन में रंग ला सकती है.

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