तस्वीरेंः हरिहर क्षेत्र का सोनपुर मेला

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- Author, आरज़ू आलम
- पदनाम, फ़ोटो पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
सोनपुर मेले का आयोजन अमूमन कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर किया जाता है.
अंग्रेज़ी कैलेंडर के मुताबिक़ यह वक़्त नवंबर से दिसंबर के बीच का होता है.
जानवरों से लेकर थिएटर तक, रोज़मर्रा की ज़रूरत से लेकर मनोरंजन तक के साधन सोनपुर में खोजे जा सकते हैं.
सोनपुर मेला पूरे देश में अपने थियेटरों के लिए भी जाना जाता है.

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सोनपुर मेला एशिया का सबसे बड़ा पशु मेला है. यहां तरह तरह के जानवर बिकने आते हैं जिनमें हाथी आकर्षण का एक प्रमुख केंद्र होता है.
यहां हाथियों की ख़रीद-फ़रोख़्त की बात भी कही जाती है, हालांकि भारत में ऐसा करना ग़ैरक़ानूनी है.

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मेले में प्रत्येक तरह के देशी-विदेशी कुत्तों की नस्ल ख़रीद-फ़रोख़्त के लिए मौजूद थी.
सोनपुर के मेले में शिल्प कला का पैवेलियन भी देखा जा सकता है जिसके माध्यम से लोगों को पुरानी शिल्प कलाओं की जानकारी भी दी जा रही है.

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सोनपुर और उसके आस-पास के इलाक़ों में बाँस से विभिन्न प्रकार की वस्तुएं बनाई जाती हैं.
एक समुदाय विशेष के लिए यह उनके जीविकोपार्जन का प्रमुख साधन है. मेले में बाँसुरी, चिलम, बाँस के बने उत्पादों की माँग रहती है.

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सोनपुर मेले के खान-पान की कई चीज़ों का ज़ायक़ा लिया जा सकता है. यहां 'चाट' की बिक्री भी ख़ूब हो रही है.
इसकी गुणवत्ता के बारे में जानने की किसी को कोई बहुत ज़्यादा दिलचस्पी नहीं मालूम देती है. सभी इसके चटकीले रंग और सजावट पर फ़िदा लगते हैं.

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सोनपुर मेला जानवरों के ज़ेवरों के लिए भी काफ़ी प्रसिद्ध है.
लोग अपने पालतू पशुओं को सजाने का शौक़ रखते हैं और गाय बैलों को पहनाने के काम में आने वाली छोटी घंटियों से लेकर उनके लिए मालाएं तक यहां ख़रीदी जा सकती है.

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सोनपुर की सोनपापड़ी मेले का एक ख़ास आकर्षण है.
मेले में आने वाले सोनपापड़ी ले जाना नहीं भूलते.

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यह मेला बुनकरों को भी एक मौक़ा देता है. उनकी कला को देश-विदेश के अन्य हिस्सों तक अपनी पहचान पहुँचाने का.

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पंछियों का व्यापार भारत में प्रतिबंधित है. लेकिन सोनपुर मेले में यह धड़ल्ले से चलता हुआ देखा जा सकता है.
अब बाज़ बहुत कम देखने को मिलते हैं लेकिन सोनपुर में इसे भी बिकता हुआ देखा जा सकता है.

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हरिहर क्षेत्र सोनपुर मेला 'करामती और भाग्य बदलने वाला घोड़े की नाल' और नाव के निर्माण में प्रयुक्त होने वाले लोहे की काँटी से बनी अंगूठियों के लिए भी मशहूर है.
आमतौर पर लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार इसे ख़रीद कर अपने घर के प्रवेश द्वार पर ठोक देते हैं.

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सोनपुर मेले में घोड़ों की माँग हमेशा रहती है.
इस बार के मेले में बड़ी संख्या में आए अच्छी नस्ल के घोड़ों ने बिक्री का पिछला रिकार्ड तोड़ दिया है .

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"आइए आइए चले आइए अपना भविष्य महाराज तोते के द्वारा जानिए" मेले में आवाज़ लगाता यह भविष्य वक्ता अपनी बढ़ी हुई आमदनी से बहुत ख़ुश है.
इसके ग्राहकों में से कई बच्चे भी हैं जो अपना भविष्य जानने को लेकर बहुत उत्सुक थे.
मेले में महिलाओं की इस्तेमाल की बुहत सी चीज़ें उपल्बध थी. लेकिन चूड़ियों के प्रति उनका लगाव देखता ही बनता था.

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"ये ज़िंदगी के मेले दुनिया में कम ना होंगे, अफसोस हम ना होंगे" इस गाने की धुन पर नाचती एक लड़की.

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मेला और बाजा दोनों एक दूसरे के पूरक हैं. सोनपुर मेले में लगभग 10 से अधिक क़िस्म के बाजे बिक रहे थे.

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सोनपुर मेले तरह तरह की पंछियों को बिकते हुए देखा जा सकता है. ये और बात है कि उनमें से कई पंछियों की ख़रीद बिक्री पर रोक लगी हुई है.
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