अब मुट्ठी भर लोगों की जागीर नहीं रचनाएं

समन्वय 2014, दिल्ली
इमेज कैप्शन, दिल्ली में हुए 'समन्वय 2014' कार्यक्रम में भाषा और साहित्य पर हुआ विमर्श
    • Author, निखिल रंजन
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

टूटती क़लमों और कागजी पन्नों को पीछे छोड़ लेखन अब आलोचकों, प्रकाशकों के चंगुल से भी आज़ाद है. बदलाव के झंझावातों का सामना कर उसने तकनीक को अपना हथियार बना लिया है.

छपाई का सामान घर-घर में है, आलोचकों से भिड़ने के लिए सोशल मीडिया है और बाज़ार में उतरने के लिए ई-कॉमर्स तो फिर डर काहे का.

वरिष्ठ लेखक प्रभात रंजन कहते हैं, “नए साहित्यकार इतने पेशेवर हैं कि वे आलोचक नाम की संस्था को ही मिटाते जा रहे हैं, जैसे पूजा में पंडितों की भूमिका सिमट रही है वैसे ही साहित्य से आलोचकों की, पाठक और लेखक के बीच अब सीधा संवाद है.”

सोशल मीडिया ने लिखने पढ़ने वालों की तादाद भी बढ़ा दी है और उनकी रूचि भी.

कीबोर्ड, फॉन्ट की उलझनें

ज़्यादा वक़्त नहीं बीता जब तकनीक का प्रवाह साहित्य और सृजन का शत्रु दिख रहा था. कहीं कोई कलम टूट रही थी तो कहीं टाइपराइटर कबाड़खाने में जा रहे थे.

कोई कीबोर्ड की मुश्किल से परेशान, तो कोई फॉन्ट की उलझनों से, पर अब लिखने वालों ने तकनीक से दोस्ती कर ली है और दोनों की गलबहियां नए दरवाज़े खोल रही है.

नए रचनाकारों के लिए तो यह ख़ासतौर से फ़ायदेमंद है.

अपने पहले कहानी संग्रह से ही सुर्ख़ियों में आईं कहानीकार अनु सिंह चौधरी की किताब ‘नीला स्कार्फ’ को बाज़ार में उतरने से पहले ही हज़ारों ग्राहक मिल गए.

तकनीक की दखल

अशोक वाजपेयी, समन्वय 2014

अनु सिंह बताती हैं, “सोशल मीडिया पर लिखते-लिखते ही एक वक़्त आया जब लगा कि अब कहानी भी लिखी जा सकती है.”

उनका यह भी कहना है कि पहले जो दुर्लभ था, अब वो सुलभ है कोई भी किसी माध्यम को चुन कर छप सकता है, दिख सकता है.

अब हमारे अगल बगल से लेकर दूर दराज़ तक हर जगह रचनाकार हैं लेकिन चुनौतियां अब भी हैं. साहित्य में तकनीक की दखल से नाराज़ लोगों के पास अपनी वजहें हैं.

वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी मोबाइल को इंसान का “सबसे अभद्र अविष्कार मानते” हैं. उनका ये भी कहना है कि आधुनिक संवाद के तरीक़ों ने प्रचलित शब्दों की संख्या सीमित कर दी है.

मोबाइल 'अभद्र आविष्कार'

समन्वय, 2014 दिल्ली के हैबिटेट सेंटर
इमेज कैप्शन, दिल्ली के हैबिटेट सेंटर में समन्वय भारतीय भाषा महोत्सव 2014 में शामिल रचनाकार.

अनु सिंह ख़ुद ही मानती हैं, “बहुत कुछ छप रहा है, दिख रहा है तो स्मृति से जल्दी ही गायब भी हो रहा है, काफ़ी कुछ ख़राब भी लिखा जा रहा है.”

ये और बात है कि तकनीक के पुजारी इन सबसे बेपरवाह हैं.

गए वो दिन जब प्रकाशकों के खौफ़ में रचनाशीलता बाहर आने से पहले ही दम तोड़ जाती थी. कुछ छप जाए तो आलोचकों की लाठी कमर तोड़ने पर आमादा.

जैसे तैसे यहां से निकले तो पाठकों तक पहुंचने की दिक़्क़तें. तकनीक के एक ही वार ने सारी मुश्किलें आसान कर दीं.

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