कश्मीरी मुसलमानों में 'असुरक्षा की भावना'!

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भारत प्रशासित कश्मीर में भारतीय सैनिकों की गोली से दो लड़कों की हत्या के बाद घाटी में ग़ुस्से का माहौल है.
हालांकि कश्मीर में ये चुनाव का वक़्त है और जानकारों का कहना है कि लोगों की नाराज़गी के सियासी परिणाम मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों को भुगतने पड़ सकते हैं.
इस घटना ने आर्म्ड फोर्सेज़ स्पेशल पॉवर्स ऐक्ट (एएफ़एसपीए या आफ़्स्पा), फ़ौज की भूमिका और राजनीतिक दलों के रोल पर नए सिर से बहस छेड़ दी है.
श्रीनगर से स्थानीय पत्रकार शमीम मेराज का कहना है कि लोगों के ग़ुस्से का सिलसिला देर तक चलेगा.
शमीम मेराज का विश्लेषण
घाटी में जिन दो बच्चों की मौत हुई है, वे गाड़ी तेज़ चला रहे थे लेकिन आर्मी ने उन पर जो फ़ायरिंग की है, घाटी में उसका ग़ुस्सा लाज़िम था.
बड़ी मुश्किल से जम्मू-कश्मीर में चुनाव का माहौल बन रहा था. सोमवार को हुई इन लड़कों की मौत से इस पर असर पड़ेगा.
इसका नुक़सान सबसे ज़्यादा भारतीय जनता पार्टी और नेशनल कांफ्रेंस को हो सकता है. लेकिन सवाल उठता है कि ये ग़ुस्सा किसके ख़िलाफ़ ज़्यादा है?

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इसमें शक नहीं कि इस बार ये ग़ुस्सा आर्मी के ख़िलाफ़ है. उसके बाद लोग मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों से नाराज़ हैं.
चुनावी मुद्दा
इनमें नेशनल कांफ्रेंस भी है क्योंकि वह सत्ता में है. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह की पार्टी से आने वाले दिनों में लोगों की नाराज़गी बढ़ सकती है.
लेकिन कश्मीरियों का ये ग़ुस्सा सिर्फ़ नेशनल कांफ्रेंस तक सीमित नहीं दिखाई देता है.

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कई लोग ये भी कह रहे हैं कि निहत्थे लड़कों की मौत सेना की गोलीबारी से होना चुनावी मुद्दा बन सकता है. और एक सच यह भी है कि ये चुनावी मुद्दा बन चुका है.
चुनाव लड़ रही पार्टियों ने सोमवार से ही इस पर सवाल उठाया है. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह का बयान आया कि सारी बीमारियों की जड़ आफ़्स्पा है.
बीते दिनों जब कश्मीर में सैलाब आया था तो आफ़्स्पा पर सवाल पृष्ठभूमि में चला गया था. लेकिन सोमवार को हुई मौतों के बाद ये मुद्दा फिर से उफ़ान पर आ गया है.
आफ़्स्पा

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मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह लगातार ये कह रहे हैं कि उन्होंने आर्म्ड फ़ोर्सेज़ स्पेशल पॉवर्स ऐक्ट हटाने की कई कोशिशें कीं लेकिन वे ऐसा नहीं कर पाए.
महबूबा मुफ़्ती की पीडीपी भी इस मुद्दे पर कूद चुकी है. सज्जाद लोन भी कह रहे हैं कि एक निश्चित समय सीमा के भीतर इसकी जांच कराई जाए.
इस बीच ये ख़बर भी मिली है कि प्रशासन ने भारतीय सेना की एक यूनिट पर दो लड़कों की हत्या का मामला दर्ज किया है.
इसके क्या नतीजे होंगे, फ़िलहाल इस बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता. कश्मीर में लोगों में ज़्यादा नाराज़गी फ़ौज को लेकर है.
उनका कहना है कि उन सैनिकों के ख़िलाफ़ कोई क़ानूनी कार्रवाई की उम्मीद नहीं है क्योंकि आफ़्स्पा इसके आड़े आ जाएगा.
इसलिए सबसे ज़्यादा अफ़सोस और ग़ुस्से की बात यही है कि लगभग सभी लोगों ने ये मान लिया है कि फ़ौजियों के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई नहीं होगी.
बीजेपी का एजेंडा

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इन्हीं हालात में बीजेपी कश्मीर में सियासी ज़मीन बनाने की भी कोशिशें कर रही है. और सियासी पंडितों का कहना है कि इस घटना से बीजेपी की कोशिशों को झटका लग सकता है.
बीजेपी का कश्मीर वादी में वैसे भी कोई ख़ास जनाधार नहीं है. उसे यहां बहुत अच्छे नतीजों की उम्मीद भी नहीं होगी. कश्मीरी पंडितों की बहुलता वाले कुछ इलाक़ों में ही बीजेपी ज़्यादा ज़ोर लगा रही है.
मुझे लगता है कि बीजेपी के ख़िलाफ़ घाटी में ध्रुवीकरण जैसी स्थिति बन सकती है. और कश्मीरी मुसलमानों में अल्पसंख्क होने की असुरक्षा की भावना इस तरह से पहले कभी नहीं देखी गई.
(श्रीनगर के स्थानीय पत्रकार शमीम मेराज से बीबीसी संवाददाता ज़ुबैर अहमद की बातचीत पर आधारित)
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