अंबेडकर के घर में दलित राजनीति फिसड्डी?

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- Author, प्रकाश दुबे
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
हाल में आए महाराष्ट्र विधानसभा के नतीजों ने दलित राजनीति की झंडाबरदार पार्टियों की पोल खोल दी.
दलित आंदोलन, राजनीति और अस्मिता के लिहाज से महाराष्ट्र हमेशा केंद्रीय भूमिका निभाता रहा है.
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की कर्मभूमि के रूप में महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम दलित राजनीति करने वाली पार्टियों को क्या संदेश दे रहा है ?
पढ़िए प्रकाश दुबे का विश्लेषण
महाराष्ट्र के चुनावी नतीजों ने एक बार फिर साबित किया है कि डॉक्टर अंबेडकर और उनकी रिपब्लिकन पार्टी के नाम पर वोट मांगने वाले नेताओं को दलित मतदाता तरज़ीह नहीं देते हैं.
डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के पोते प्रकाश अंबेडकर के भारतीय रिपब्लिकन पक्ष-बहुजन महासंघ ने अकोला ज़िले में एक सीट पर जीत हासिल की और दो जगहों पर इसके प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे.
बहुजन समाज पार्टी का प्रत्याशी एक जगह दूसरे स्थान पर रहा. बाक़ी रिपब्लिकन, दलित पैंथर या ऐसे ही नाम के झंडे घुमाने वाले सारे प्रत्याशी पिछड़ गए.
अल्पसंख्यक हितों की बात करने वाली एमआइएम का समर्थन पाने के बावजूद दलित पैंथर के गंगाधर गाढ़े तीसरे स्थान पर रहे.
महाड में दलितों को तालाब का पानी इस्तेमाल करने का अधिकार दिलाने के लिए डाक्टर भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में आंदोलन हुआ था.
दलित आंदोलन की ज़मीन

नासिक के कालाराम मंदिर में उन्होंने दलितों के पूजा करने के अधिकार की मांग की थी. गांधीजी ने जाकर दलितों के साथ पूजा की थी.
औरंगाबाद में डाक्टर अंबेडकर ने कॉलेज खोला ताकि दलित शिक्षित हों.
महाराष्ट्र के पूर्व हिस्से में स्थित खैरलांजी में दलित परिवार की सदस्यों के गैंग रेप और हत्याओं के कारण जबर्दस्त आंदोलन हुआ था.
यहां के चार विधानसभा क्षेत्रों में से तीन में भारतीय जनता पार्टी की जीत हुई.
कोंकण के महाड में शिवसेना उम्मीदवार ने बाजी मारी. उत्तर महाराष्ट्र में अनुसूचित जाति के मतदाताओं ने मराठी प्रत्याशी के बजाए अन्य पिछड़ा वर्ग को पसंद किया, मसलन बंजारा, माली, तेली आदि.
विशेषता यह रही कि इस बार दलित वोटों की बिक्री की बोली लगाने वाले सौदागर सामने नहीं आए.
चुनाव से पहले वोट दिलाने के नाम पर प्राध्यापक जोगिंदर कवाड़े ने कांग्रेस और प्रकाश गजभिए ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की बदौलत विधान परिषद की सदस्यता पाई.
खोखली ताक़त

उत्तर महाराष्ट्र में रिपब्लिकन एवं दलित पैंथर के दर्जन भर धड़े हैं.
प्रचार और मतदान में किसी की भूमिका उल्लेखनीय नहीं रही. आम दलित मतदाता या तो जीतने की संभावना वाली पार्टी के साथ जुड़ा या फिर भावना के आधार पर महाराष्ट्रवादी या विदर्भवादी दल के साथ.
नव-बौद्ध दलित उम्मीदवारों का सबसे रोचक संघर्ष उत्तरी नागपुर में रहा.
कांग्रेस सरकार के मंत्री डा. नितिन राऊत ने पीएचडी किया हुआ है. उन्होंने बौद्ध विवाह विधेयक का प्रारूप बनाया है.
बहुजन समाज पार्टी के किशोर गजभिए भारतीय प्रशासनिक सेवा छोड़कर चुनाव मैदान में थे.
भारतीय जनता पार्टी के डाक्टर मिलिंद माने शिशुरोग विशेषज्ञ हैं. जीत की संभावना वाला कांग्रेस प्रत्याशी तीसरे स्थान पर रहा.
भाजपा की बयार

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भाजपा का कम बोलने वाला उम्मीदवार आराम से जीता.
गैर बौद्ध दलित आम तौर पर कांग्रेस का साथ देते रहे हैं लेकिन इस बार बयार भाजपा की ओर बही.
भाजपा की रणनीति को इसका श्रेय दिया जा सकता है. लाखों छत्तीसगढ़ी महाराष्ट्र में रोजगार के कारण आकर बसे हैं. कई बोझा ढोते हैं. रिक्शा चलाते हैं. खेतों में काम करते हैं.
भाजपा ने छत्तीसगढ़ के चुनाव विशेषज्ञ मंत्री बृज मोहन अग्रवाल को कमान सौंपी. उत्तर नागपुर में भाजपा ने बाजी जीती. भंडारा ज़िले की सभी सीटें भाजपा के खाते में गईं.
मुंबई में दलित मतदाताओं ने भाजपा की तुलना में शिवसेना से निकटता जताई है.
झंडा उठाऊ, नारे लगाऊ राजनीति

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इसके पीछे भाषा एक बड़ा कारण रहा. दूसरी वज़ह रही दलबदल से विरक्ति.
शरद पवार के नज़दीक रहे मज़दूर नेता विजय कांबले भाजपा में शामिल हो गए.
इंडिया यूनाइटेड मील की जमीन पर डाक्टर अंबेडकर की समाधि के लिए आंदोलन आरंभ करने वाले कांबले कुर्ला-मुंबई में शिवसेना से मुकाबला हार गए.
रिपब्लिकन पार्टी से कांग्रेस में आकर मंत्री बने चंद्रकांत हंडोरे चेंबूर में शिवसेना से हार गए.
महाराष्ट्र में 60 प्रतिशत दलित शिक्षित हैं. वे झंडा उठाऊ, नारे लगाऊ भ्रष्ट राजनीति से ऊब रहे हैं.
महाराष्ट्र विधानसभा के नतीजे इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं.
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