बहुत मुश्किल थे वो चार दिन

- Author, सुहैल अकरम
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
पिछले कुछ दिनों से भारत प्रशासित कश्मीर में मौजूद घरवालों से कई बार फ़ोन पर हुई बातचीत के बाद मैं इस बात का कुछ हद तक ही अंदाजा लगा सकता हूं कि वहां बाढ़ से किस कदर तबाही हुई होगी.
वे कहते हैं कि घाटी ने ऐसा सैलाब कभी नहीं देखा है.
वो इतवार का दिन था, सात सितंबर की तारीख. श्रीनगर के ज्यादातर हिस्से पहले ही पानी में डूब चुके थे.
एक कश्मीरी की डायरी
उम्मीद थी कि शहर के बाहरी हिस्से में स्थित मेरा घर महफ़ूज होगा.
लेकिन देर रात मेरे छोटे भाई ने फोन किया. फोन पर अक्सर आहिस्ता बात करने वाला मेरा भाई उस रोज बहुत तेज़ बोल रहा था, "तुम क्या कह रहे हो."
झेलम नदी

जब मैंने उससे ये कहा कि तुम घरवालों को लेकर पहली मंजिल पर चले जाओ तो उसने मुझे लगभग झिड़क ही दिया.
उसने कहा कि घर के पीछे धान के खेत से पानी तेजी से आ रहा है.
वहां से बहुत दूर दिल्ली में मैं इन अलफ़ाजों से कांप गया, 'तेजी से आ रहा है.'
धान के उन खेतों के पीछे गरजती हुई झेलम नदी सांप की तरह मचल रही थी. आहिस्ता आहिस्ता वह अपनी ही हदें तोड़ रही थी.
मुश्किल दिन

घंटे भर में ही, तब 12 बजने ही वाले थे, भाई ने फिर फोन किया.
हमारी बातचीत बहुत संक्षिप्त रही, "हम घर छोड़कर जा रहे हैं. पड़ोस के सभी लोग ऊंची जगह का रुख कर रहे हैं. हम मेन रोड पर स्थित तीन मंजिला शॉपिंग कॉम्पलेक्स में शरण ले सकते हैं."
फिर चार दिनों तक घर वालों से कोई बातचीत नहीं हुई. बहुत मुश्किल थे वो चार दिन.
ये मुश्किल कई लोगों पर बीती होगी.
आखिरी बार

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जर्मनी में मौजूद मेरे एक कश्मीरी दोस्त ने बताया कि वह कई दिनों तक इबादत से उठा ही नहीं.
वह खुदा से बस इतनी दुआ करता रहा कि बस एक बार, आखिरी बार घरवालों से बात हो जाए.
उस एक हफ्ते तक कश्मीर का कम्यूनिकेशन नेटवर्क खामोश हो गया था. फोन लाइनें काम नहीं कर रही थीं.
भयावह तस्वीर

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घाटी के बाहर रह रहे कश्मीरी, सोशल मीडिया के लगभग हर कोने पर अपने लोगों की एक खबर के लिए भटक रहे थे. और फिर धीरे धीरे खबरें आनी शुरू हो गईं.
घाटी की दिल दहला देने वाली जो पहली तस्वीर सामने आई जिसमें एक परिवार पानी के एक प्लास्टिक टैंक में एक बीमार महिला को लिए जा रहा था.
बीबीसी के एक मेरे साथी भारत प्रशासित कश्मीर से रिपोर्टिंग असाइनमेंट से वापस लौटे ही थे.
गम और उदासी

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उन्होंने बताया कि आसमां से देखने पर श्रीनगर बहुत खामोश लगता है.
लेकिन जैसे ही आप ज़मीन पर उतरते हैं तो आपको बाढ़ के भयानक मंजर का एहसास होता है. वहां सब कुछ बर्बाद हो गया है.
कश्मीर को वापस संभलने में महीनों लग जाएंगे. फोन लाइनें कुछ हद तक बहाल हो चुकी हैं.
जब भी घरवालों से बात करता हूं, ग़म और उदासी की एक नई कहानी सुनता हूं.
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