हिंदी साहित्य सम्मेलन या साड़ी सेल सेंटर?

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- Author, संजीव चंदन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए, नागपुर से
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु ने पांच जनवरी 1954 को तत्कालीन मध्यप्रदेश का हिस्सा रहे नागपुर में 'मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन' का शिलान्यास किया था.
और ठीक इसके आठ महीने बाद 19 सितंबर 1956 को पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने उसका उद्घाटन किया था. आज नागपुर में 'मोर भवन' के नाम से प्रसिद्ध यह सम्मेलन 'विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मलेन' कहलाता है.
हिंदी दिवस के मौक़े पर पढ़िए संजीव चंदन का विश्लेषण
शहर के केंद्र में बसे इस ऐतिहासिक और सर्वकालिक महत्व के संस्थान की एक और पहचान है, इसके प्रवेश द्वारों पर लगे सेल, जिनमें अधिकांश साड़ियों के सेल हैं.
इस संस्थान की मुख्य पहचान इसके अपने साहित्यिक गतिविधियों से कम और इसकी व्यावसायिक गतिविधियों से ज़्यादा होती है.
इसके अलग–अलग हॉल भी विविध कार्यक्रमों के लिए किराए पर दिए जाते हैं. यह संस्थान साहित्य की समृद्धि से ज़्यादा नौकरी देने के लिए कोचिंग चलाने में रुचि ले रहा है.
वित्त प्रबंधन के लिए इसीलिए यहाँ एक जेनरल मैनेजर भी नियुक्त किया गया है .
हिंदी का प्रचार

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प्रस्तावित विदर्भ राज्य की प्रस्तावित राजधानी नागपुर मराठी भाषी इलाक़े का केंद्र है. इसीलिए यहाँ हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए ऐसी कई संस्थाएं बनाई गई हैं.
नागपुर से 80 किलोमीटर दूर वर्धा में महात्मा गांधी ने 1936 में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए एक संस्थान राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना की थी.
नागपुर में भी एक राष्ट्रभाषा प्रचार समिति है, जिस पर वर्धा वाली समिति का अपना दावा है. सवाल है कि ये संस्थाएं हिंदी के लिए क्या कर रही हैं?
साहित्यकारों की राय

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विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मलेन की कार्यप्रणाली से ख़फ़ा हिंदी के कवि और जनवादी लेखक संघ के सदस्य वसंत त्रिपाठी कहते हैं, "इसकी प्रभावी सक्रियता के बारे में कभी सुना था. आज तो यह मृतप्राय है. शहर या आस–पास के जन सरोकारी साहित्यकारों से इसका कोई संपर्क नहीं है. ख़ानापूर्ती के कार्यक्रम ज़रूर होते हैं."
प्रगतिशील लेखक संघ के सदस्य पुष्पेन्द्र फाल्गुन कहते हैं, "विवादों में फंसी संसाधनहीन नागपुर की राष्ट्रभाषा प्रचार समिति इससे बेहतर काम करती है. संसाधन संपन्न विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मलेन नामालूम साहित्यकारों का अड्डा है."
उर्दू के प्राध्यापक और साहित्यकार फ़िरोज़ हैदरी कहते हैं , "राष्ट्रभाषा समिति तो कम से कम बच्चों के बीच वैज्ञानिक चेतना फैलाने का काम कर लेती है, विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मलेन एक व्यावसायिक केंद्र भर है."
आरोपों का खंडन

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इन आरोपों का खंडन करते हुए विदर्भ हिंदी साहित्य सम्मलेन के उपाध्यक्ष और वरिष्ठ पत्रकार उमेश चौबे कहते हैं कि किसी संस्थान को चलाने के लिए धन की आवश्यकता होती है.
उन्होंने कहा, "महाराष्ट्र सरकार इसे महज़ सात हज़ार पांच सौ रुपये देती है. हम हर वर्ष लेखन शिविर से लेकर बड़े कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं, अलग–अलग ज़िलों में भी सक्रिय हैं."
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