मुक्तिबोधः जिसकी कविता ख़त्म नहीं हुई

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- Author, अपूर्वानंद
- पदनाम, विश्लेषक, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
इस साल 11 सितम्बर को मुक्तिबोध को गुज़रे पचास साल हो जाएँगे.
महज 47 वर्षों के जीवन में उन्होंने हिंदी के पाठकों को ऐसी नई कविता से परिचित कराया, जो मनुष्यों के अंतर्मन में झांकती है.
उनकी कविताएं मध्यवर्ग के अंतर्मन को जैसे नंगा कर देती हैं और एक ऐसे भविष्य से आगाह करती हैं जो इंसानियत के लिए बहुत ही भयावह साबित होने वाला है.
मुक्तिबोध की कविताओं में जहाँ आत्मध्वंस की ख़बर है तो दूसरी ओर मानवीय संभावनाओं की मर्माहत से भरी जागरूकता भी है.
वे मानव सभ्यता की ट्रेन को तेज़ी से भागते हुए देखकर चिंतित थे और ऐसी दुर्घटना की आशंका से ग्रस्त जो उसके साथ होने ही वाली थी.
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1964 की गर्मी में अचेत मुक्तिबोध को छत्तीसगढ़ के एक कस्बे से ट्रेन में लेकर हरिशंकर परसाई और अन्य युवा लेखक दिल्ली पहुँचे.
उम्मीद थी कि नौजवान लेखकों का प्यारा यह लेखक, जो तब सैंतालीस साल का भी नहीं हुआ था, ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के माहिर डॉक्टरों के चमत्कार से बचा लिया जाएगा. वह नहीं होने को था.
एक निम्न मध्यवर्ग का पारिवारिक व्यक्ति, नौकरी और शहर बदलता रहा. थोड़े चैन और सुकून की तलाश में, जिससे वह उन कविताओं को वह वक़्त दे सके जो वे उससे चाहती थीं, जो उसके साथ बरसों-बरस रहती थीं, बक्से में बंद और अपने कवि को लगातार पुकारती हुई.
चेतावनी देता एक कवि

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वह उसे मिला अपने अंतिम सालों में, जब उसे राजनादगाँव के कॉलेज में लेक्चररशिप मिल गई.
मुक्तिबोध स्वतंत्र भारत की उषाकाल के कवि थे, लेकिन उनकी कविता में सुकून नहीं है, कहीं पहुँच जाने की तसल्ली नहीं है. वे मानव सभ्यता की ट्रेन को तेजी से भागते हुए देखकर चिंतित थे और ऐसी दुर्घटना की आशंका से ग्रस्त जो उसके साथ होने ही वाली थी.
क्या इस दुर्घटना को रोका जा सकता है? या यह ऐसी ट्रेन है जिसके सारे डब्बे बंद हैं और जिनमें एक से दूसरे में नहीं पहुँचा जा सकता और जिसकी सवारियां सो चुकी हैं और कोई आवाज़ उन तक नहीं पहुँच सकती.
कवि को चेतावनी सुने जाने का भरोसा नहीं है फिर भी ख़तरे की लाल झंडी दिखाते ही रहना है. मुक्तिबोध मार्क्सवादी थे. लेकिन अस्तित्ववादी अतीत के कारण उनमें स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व के बीच के रिश्ते का बोध इतना तीव्र था कि मार्क्सवाद उपलब्ध हो जाने के बाद वे निश्चिंत नहीं हो पाए.
यह देखना दिलचस्प है कि किस तरह मार्क्सवाद जैसी परिवर्तनकारी विचार पद्धति या दर्शन की प्राप्ति के बाद कैसे परिवर्तन न होने की आसान व्याख्याएं करके अपनी ज़िम्मेदारी से बचने का रास्ता निकाल लिया जाता है.
आत्मा के भीतर यात्रा

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इस प्रकार मार्क्सवाद सक्रियता की जगह वस्तुगत परिस्थितियों के निर्माण की अंतहीन प्रतीक्षा के लिए खूबसूरत आवरण बन जाता है. मुक्तिबोध विचारधारा के हामी होते हुए भी उसके इत्मीनान का लाभ नहीं लेते. उनकी बेचैनी और छटपटाहट का कारण यही है.
मुक्तिबोध के काव्य जीवन की शुरुआत रोमांटिक ज़मीन पर हुई, लेकिन बीसवीं सदी के पांचवें और छठे दशक तक आते-आते उनका अपना कंठ फूटने लगा और छायावादी शब्दावली और मुद्राओं से वे मुक्त होने लगे.
वाग्मिता उनमें थी और तरानेबाजी की प्रवृत्ति भी आरंभ में दिखलाई पड़ती है, लेकिन समय गुजरने के साथ वे इरादों का बयान करने की जगह अंतर्कथाओं को सुनने और सुनाने में दिलचस्पी लेने लगते हैं.
मुक्तिबोध का काव्य संसार घटनापूर्ण है, लेकिन वे बाहरी दुनिया में, ऐतिहासिक अवकाश में नहीं घटतीं. वे मनुष्य की आत्मा के भीतर यात्रा करते हैं और उसके ज़ख़्मी होने या ध्वंस की खबर लाते हैं.
उनका सबसे बड़ा दुःख है मनुष्य का स्वयं अपनी संभावनाओं की ओर से उदासीन हो जाना. 'एक अंतर्कथा' नामक कविता में माँ-बेटे की जंगल में 'अग्नि-काष्ठ' चुनने की कथा है, "मैं हर टहनी में डंठल में... एक-एक स्वप्न देखता हुआ... पहचान रहा प्रत्येक..."
हम अपनी सर्जनात्मक क्षमताओं को इस वजह से नज़र अंदाज़ कर देते हैं कि वे हमें हमारे सुरक्षित आराम के दायरे से खींच निकालती हैं और जीवन की गाड़ी में जोत देती हैं.
न ख़त्म होने वाली कविता

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अपनी आज़ादी के लिए ज़रूरी अपनी ज़िम्मेदारी से बचने के कारण हम अपने 'अंतर्जीवन के मूल्यवान संवेदन' को कचरे पर फ़ेंक देते हैं.
दूसरी कविताओं में मुक्तिबोध इस वजह से इस आलसी और सुविधावादी शिक्षित वर्ग की भर्त्सना करते हैं कि वह भयवश इन कोमल संवेदनाओं को तलघर में डाल देता है.
मुक्तिबोध की कविताओं में जहाँ आत्मध्वंस की ख़बर है तो दूसरी ओर मानवीय संभावनाओं की मर्माहत से भरी जागरूकता भी है. इसलिए दूसरी बड़ी बेचैनी है दोस्तों की तलाश, सहचर मित्र की खोज और अपने अंतःकरण का विस्तार करने का यत्न.
यह सारा काम फौरी है, कल पर नहीं टाला जा सकता. इसलिए मुक्तिबोध अपनी कविताओं को इस असंभव संधान के काम पर लगा देते हैं. और चूँकि यह खोज अंतहीन है, कभी पूरी तरह से पूरी नहीं होगी, कविता का समाप्त होना भी कठिन होता जाता है.
मुक्तिबोध की कविता इस तरह एक अजीबोग़रीब तरीके से ख़त्म होने से इंकार करने लगती है. वह शिल्प और रूप के दायरे से निकल जाती है. बालचंद्र राजन, यूरोपीय कविता के संदर्भ में असमाप्य के रूप पर विचार करने का प्रस्ताव करते हैं.
जो सामाजिक और राजनीतिक तनाव कविता को समाप्ति के इत्मीनान से वंचित करते हैं, उनका शमन करके कविता से सौंदर्य की कोई पूर्ण अनुभूति प्राप्त करने की कोशिश उसकी राजनीति से साथ एक तरह का धोखा है.
अंधेरे में

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मुक्तिबोध अपनी छाँह को सर्वगामी कहते हैं. 'अँधेरे में' नामक कविता में वे हर नुक्कड़-चौराहे पर मौजूद रहते हैं, हर संघर्ष में भागीदारी करते हुए. और यह अंतहीन है क्योंकि अंत में जब ऐसा लगता है कि अभीष्ट मिल गया, वह खो जाता है और उठी हुई बांह, उठी ही रह जाती है.
वृद्ध, मार्क्स से इंटरव्यू लेने गए एक पत्रकार ने उनसे पूछा, ''(असल में) क्या है?...'' समंदर के गर्जन ने उसके सवाल को डुबा दिया. मार्क्स को सुनाई पड़ा, क्या है..... समंदर गरजता रहा. कुछ खामोशी के बाद पत्रकार को सुनाई पड़ा, संघर्ष.
संघर्ष ही है और कवि के पास इस संघर्ष में भाग लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं और उससे सुखकर काम भी नहीं क्योंकि इसी के दौरान वह खुद को भी हासिल करता है. मुक्तिबोध संघर्ष में निजी भागीदारी के दायित्व बोध के कवि हैं.
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