क्यों नहीं छोड़ा पंडित मोहनलाल ने कश्मीर?

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- Author, माजिद जहाँगीर
- पदनाम, कश्मीर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
कश्मीर में साल 1990 में हथियारबंद आंदोलन शुरू होने के बाद लाखों कश्मीरी पंडित अपना घर बार छोड़ कर चले गए और कश्मीर से बाहर जाकर पनाह ली.
लेकिन कश्मीरी पंडित मोहन लाल की कहानी कुछ अलग है. वे जिस गाँव में रहते हैं, वहां 1990 में 10 पंडित परिवार आबाद थे, लेकिन आज उनका अकेला परिवार वहां रहता है.
कश्मीर घाटी के कुलगाम ज़िले के दमहल हांजीपुरा गाँव में रहने वाले मोहन लाल कश्मीर छोड़कर नहीं गए और वजह थी 'मिट्टी से प्यार और वहां के हालात.'
27 बरस पहले की उस रात को याद करते हुए मोहन लाल कहते हैं, "वो बड़ी भयानक रात थी जब कश्मीर से लाखों पंडित आनन फ़ानन में घाटी छोड़कर चले गए. मैं भी सोच रहा था कि अपना घर छोड़कर कर चला जाऊं लेकिन फौरन इरादा बदल दिया."
वो कहते है, "हम यहाँ से जाने के लिए तैयार थे लेकिन जब हमसे कहा गया कि रास्ते में पंडितों का कत्ल किया जा रहा है तो मैंने इरादा बदल लिया. मैंने अपने घर में खुद को अधिक सुरक्षित पाया."
'जान से मारेंगे'

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कश्मीरी पंडितों को घाटी में फिर से बसाने को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार की योजना पर मोहन लाल और उन की पत्नी दुलारी कौल कहती हैं, "हम तो खुद भी चाहते हैं कि पंडित वापस लौट कर आएं लकिन भारत सरकार की मर्ज़ी के मुताबिक़ नही. हमें कोई अलग होमलैंड नही चाहिए."
वो कहते हैं, "अलग होमलैंड का मतलब है कि हमें घरों में कैद करके रखा जाएगा. हम पारंपरिक तौर पर बसना चाहते हैं. यहां कुछ पंडितों को पिछले दो चार बरसों में लाया गया है. उनको अलग कॉलोनियों में रखा गया है. वे तो कैदियों की ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं. हम सुरक्षा की संगीनों में नहीं रहना चाहते. यहां के मुसलमान हमें सुरक्षा देंगे."
मोहन लाल के परिवार को कई बार डराने की कोशिश की गई. कई बार मकान पर रात के वक्त पत्थर फेंके गए. 'जान से मारेंगे' जैसे शब्द लिखे गए.
सरकार ने उन्हें सुरक्षा देने की पेशकश भी की थी लकिन उन्होंने कभी भी इसे कुबूल नहीं किया, क्योंकि उन्हें डर था कि इससे वो और अलग-थलग पड़ जाएंगे.
मंदिर के लिए लकड़ी

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उनके घर के पास एक मंदिर है जो अब खंडहर की शक्ल ले चुका है. उनकी शिकायत है कि सरकार ने कभी उनकी धार्मिक भावनाओं की परवाह नहीं की और न ही उनके आस पड़ोस के लोगों ने ही इसका ख्याल रखा.
वो कहते हैं, "पूजा भी अब अपने ही घर में करते हैं. मांगने के बावजूद सरकार ने मंदिर के लिए चार फ़ुट लकड़ी तक नहीं दी. क्या ये ज़ुल्म नहीं है?"
जब भी किसी त्योहार का कोई मौका होता है तो मोहनलाल के लिए मुश्किल पैदा हो जाती है. त्योहार मनाने के लिए मोहनलाल को अपने घर से दूर जाना पड़ता है क्योंकि आस पास कोई पंडित परिवार नहीं रहता है और न ही कोई सजा सजाया मंदिर, जहाँ जाकर वे त्योहार मना सकें.
मोहन लाल के गाँव में जब भी मुसलमानों के यहाँ कोई शादी विवाह होता है तो वे वहाँ चले जाते हैं लेकिन अपने बच्चों की शादी के लिए उन्हें 100 किलोमीटर दूर जाकर श्रीनगर शहर के एक होटल में अपने बच्चों की शादी करनी पड़ी.
हिंदुओं का श्मशान

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इसकी वजह ये थी कि मोहन लाल का कोई रिश्तेदार डर के कारण उनके गाँव आने के लिए तैयार नहीं था. लेकिन उन्होंने अपनी परंपरा को ज़िदा रखते हुए शादी के बाद गाँववालों को गाँव में ही दावत दी थी.
लेकिन वो मानते हैं कि सरकार से खफ़ा होने के लिए उनके पास कई वजहें हैं.
मोहन लाल कहते हैं, "हिंदुओं का एक श्मशान घाट होता है जहाँ उन्हें जलाया जाता है, लेकिन उस पर कब्ज़ा कर लिया गया है और वहाँ गाड़ियों का अड्डा बना दिया गया है. अब हमारा श्माशान घाट भी नहीं बचा है. भागे हुए पंडितों को यहाँ लाकर क्या करेगी सरकार?"
मोहन लाल का मानना कहते हैं कि सरकार की ओर से कश्मीरी पंडितों को वापस बसाने की कोशिश एक अच्छा क़दम है लेकिन तब तक नाकाम है जब तक यहाँ के लोग उनकी वापसी न चाहें.
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