कैसी होती अखंड भारत की क्रिकेट टीम

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- Author, रामचंद्र गुहा,
- पदनाम, मशहूर इतिहासकार
अगर भारत का विभाजन नहीं होता तो शायद भारत दुनिया की सबसे शक्तिशाली क्रिकेट टीम होती. यह कहना है वरिष्ठ इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा का.
पैंग्विन प्रकाशन से प्रकाशित उनकी क़िताब 'विदेशी खेल अपने मैदान पर' में उन्होंने भारतीय क्रिकेट के इतिहास के गुमानाम क्रिकेटरों के बारे में पड़ताल की है.
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आज़ादी के दिनों में क्रिकेट ने कभी राष्ट्रवादी भावनाओं को मज़बूत करने का काम किया था, लेकिन आज यह अंधराष्ट्रवाद को बढ़ा रहा है. वो मानते हैं पाकिस्तान के साथ मैच में राष्ट्रीय मान को जीत हार से नहीं जोड़ना चाहिए.
पढ़ें क्रिकेट इतिहास पर रामचंद्र गुहा का नज़रिया
भारत-पाकिस्तान की कभी भी साझा टीम बनने की कोई सम्भावना नहीं है.
लेकिन अगर भारत का विभाजन नहीं होता तो शायद हम दुनिया की सबसे शक्तिशाली क्रिकेट टीम बन जाते.
आप सत्तर के दशक को लीजिए- भारत के बैटिंग लाइनअप में गावस्कर और मियांदाद, विश्वनाथ और ज़हीर होते.
इमरान ख़ान और सरफ़राज़ नवाज़ गेंदबाजी की ओपनिंग करते और बेदी और इसके बाद चंद्रशेखर आते.

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दुख की बात है कि ये कल्पना थी और कल्पना रहेगी. भारत-पाकिस्तान की कभी भी एकीकृत टीम बनने की कोई सम्भावना नहीं है.
बस आप आशा और कामना कर सकते है कि दोनो देशों के बीच खेले जाने वाले क्रिकेट मैच अत्यधिक कटुता की भावना से न खेले जाए.
आज़ादी के संघर्ष के दौरान क्रिकेट ने राष्ट्रवादी आकांक्षाओं के साधन के रूप में भूमिका निभाई थी.
इसीलिए 1926-27 में एक एमसीसी टीम के ख़िलाफ़ सीके नायडू के शतक (जिसमें 11 छक्के शामिल थे) ने ऐसी व्यापक प्रशंसा को जन्म दिया था और 1971 में हमारी विजय के बाद प्रधानमंत्री क्रिकेटरों से मिली थीं.
एक बार फिर, 1990 के दशक में, कारगिल युद्ध और कश्मीर में विद्रोह के दशक में, भारत और पाकिस्तान के बीच होने वाले मैच राजनीतिक अर्थ लिए हुए होते थे.
लेकिन अब इसे देखते हुए कि अब हम करीब सात दशक पुराने राष्ट्र हैं, हमें कम अंधराष्ट्रवादी होना चाहिए. अगर हम ऑस्ट्रेलिया से या फिर पाकिस्तान तक से एक मैच या श्रृंखला हारते हैं, तो इससे हमारा राष्ट्रीय मान प्रभावित नहीं होना चाहिए.
(पेंग्विन से साभार)
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