'मुड़कर देखा, शेरनी ठीक पीछे खड़ी थी...'

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- Author, सुमिरन प्रीत कौर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
"हम शेर के बच्चों को कैमरे में उतार रहे थे. थोड़ी ही दूरी पर सांप और नेवले की लड़ाई चल रही थी. हमारे तो दोनों हाथ में जैसे लड्डू थे. हम दोनों नज़ारे बारी-बारी शूट करने लगे. हमें अहसास ही नहीं था कि दबे पांव ख़तरा हमारे ठीक पीछे पहुंच चुका है."
मशहूर वाइल्ड लाइफ़ फ़िल्ममेकर बेदी ब्रदर्स के नरेश बेदी ने बताया कि ये वाक़या तब पेश आया जब वो अपनी एक डॉक्यूमेंट्री शूट कर रहे थे.
वन्य जीवन पर फ़िल्म बनाने वाले फ़िल्मकारों को ऐसे ख़तरों से अक्सर जूझना पड़ता है और वो जिन कैमरों और दूसरे साज़ो सामान का प्रयोग करते हैं वो ख़ास क़िस्म के होते हैं.
'जानवर निर्देशों के ग़ुलाम नहीं'
बेदी ने बताया, "हम जैसे ही मुड़े हमारे ठीक पीछे शेरनी खड़ी थी. हमें अपना शिकार बनाने के लिए उसे बस एक छलांग लगानी थी."

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मशहूर डॉक्यूमेंट्री मेकर माइक पांडे बताते हैं, "कई बार हमें एक शॉट के लिए महीनों इंतज़ार करना पड़ता है. एक दफ़ा कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में कई महीनों की मशक्कत के बाद हमें शेरनी नज़र आई. लेकिन मैडम 15 सेकंड तक पोज़ देने के बाद फिर जंगल में ग़ायब हो गईं."
जंगल की दुनिया को कैमरे में उतारना बेहद मुश्किल होता है क्योंकि जानवर आपके निर्देशों के ग़ुलाम नहीं होते, आपको उनके हिसाब से चलना पड़ता है तब जाकर मनमाफ़िक दृश्य मिलते हैं.

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विशेष कैमरे
माइक पांडे कहते हैं, "हमें इंफ़्रा रेड कैमरों का इस्तेमाल करना पड़ता है. थर्मल कैमरे शरीर के तापमान के हिसाब से तस्वीरें उतारते हैं. जंगल के कई ऐसे इलाके होते हैं जहां हम नहीं जाते, वहां हम हैलीकैम का इस्तेमाल करते हैं. ये कैमरे रिमोट संचालित होते हैं और उड़ते भी हैं."

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शेर की तस्वीर लेने के लिए हाथी पर बैठना सबसे उपयुक्त होता है. लेकिन हाथी हिलता रहता है, ऐसे में तस्वीरों में ठहराव कैसे आता है?

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नरेश बेदी कहते हैं, "हमने इसके लिए विशेष डिज़ाइन वाली एलिफ़ेंट ट्राइपोड बनाई."
लद्दाख में ठंड से बचने के लिए बेदी ब्रदर्स को कैमरा को पॉलिथीन में रखकर इस्तेमाल करना पड़ा.
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