टैक्स माफ़ी: 'ये सेठजी को दान नहीं है'

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- Author, स्वामीनाथन अय्यर
- पदनाम, आर्थिक विश्लेषक
अगर आप ये सोचते हैं कि आप बहुत भारी टैक्स लगाएंगे तो बहुत आमदनी हो जाएगी और टैक्स का रेट कम रखेंगे तो नुक़सान हो जाएगा तो ये बिलकुल ग़लत है.
हमारी आयकर दर एक ज़माने में 97 फ़ीसदी थी. तब टैक्स की आमदनी जीडीपी का एक फ़ीसदी होती थी.
अभी इसे तीस फ़ीसदी कम कर दिया तो आपको ढाई फ़ीसदी मिल रहा है.
एक वक़्त कॉर्पोरेट टैक्स 58 फ़ीसदी था. उस वक़्त ये जीडीपी का एक फ़ीसदी होता था.
अभी आपने तीस फ़ीसदी कम कर दिया तो क्या वो कम हो गया? नहीं वह बहुत बढ़ गया. अब वो जीडीपी का पांच फ़ीसदी पहुंच गया है.
जैसे हर साल ये हिसाब साईंनाथ निकालते हैं, वो एक बजट एंट्री का है. लोग समझते हैं कि आप जितना टैक्स लगाते रहें अर्थव्यवस्था पर कोई असर नहीं होगा, ये ग़लत है.
ये नहीं है कि ऊंचा टैक्स लगाएं तो ये बहुत अच्छी चीज़ है और अगर उसे हमने कम किया तो क्या हमने कोई गिफ़्ट दे दिया?
'कुछ टैक्स छूट बंद हो'

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ये पूछने कि ज़रूरत पड़ेगी कि इतना टैक्स हम क्यों लगा रहे हैं. अगर वो बहुत ज़्यादा है और आपने कम किया तो अर्थव्यवस्था की रफ़्तार बढ़ती है, रोज़गार बढ़ता है.
बल्कि उसकी वजह से सरकार को कम टैक्स नहीं मिलता, सरकार को और ज़्यादा टैक्स मिलता है.
मैं साईंनाथ साहब से इतना ज़रूर इत्तेफ़ाक़ रखता हूं कि जो टैक्स छूट दी रही है वो बहुत ज़्यादा है और अच्छी चीज़ों के लिए नहीं है.
मुझे लगता है कि कुछ टैक्स छूट बंद होनी चाहिए.
बजट के दस्तावेज़ में भी लिखा होता है कि इस तरह से हिसाब नहीं लगना चाहिए कि ये टैक्स छूट बंद होती है तो सरकार को इतना पैसा मिल जाएगा.
ये सोचना कि टैक्स छूट की वजह से हमने कोई दान दे दिया वो ग़लत है. ये वामपंथी सोच है जो पता नहीं कितने साल से लोग बोलते रहे हैं.
(बीबीसी संवाददाता स्वाति बक्शी से बातचीत पर आधारित)
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