किसान आत्महत्या: आंकड़ों का गड़बड़झाला?

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    • Author, पी साईनाथ
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए

भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक 2013 में 11,744 किसानों ने आत्महत्या की जबकि 2012 में 13,754 किसानों ने आत्महत्या की थी.

ज़ाहिर है कि किसानों की आत्महत्या के मामलों में कमी आई है. तो क्या भारतीय किसानों की मुश्किलें कम हुई हैं?

भारत में ज्यादातर किसान कर्ज़, लागत बढ़ने, सिंचाई के अभाव, कीमतों में कमी और फसल के बर्बाद होने के चलते आत्महत्या का रास्ता चुनते हैं. 1995 से लेकर अब तक 2,96,438 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. ऐसे में किसानों की आत्महत्यामें कमी क्या संकेत देती है?

खेती किसानी मामले पर लगातार लिख रहे और इस मामले पर काफी अध्ययन कर चुके पत्रकार पी साईनाथ को यह आंकड़ों की बाज़ीगरी लगती है.

भारतीय किसानों के आत्महत्या की घटती दर का पूरा सच, पढ़िए विस्तार से.

आंकड़ों में आत्महत्या में कमी अच्छा संकेत है, लेकिन तभी तक जब तक आप इन आंकड़ों को गंभीरता से नहीं देखते.

आत्महत्या करने वालों में से 7,653 किसान पांच अहम राज्यों- महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और कर्नाटक के थे. देश भर में आत्महत्या करने वालों में दो तिहाई किसान इन्हीं राज्यों से हैं. इस सूरत में कोई बदलाव नहीं हुआ है.

अमीर राज्य महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा 3,146 किसानों ने आत्महत्या की. लगातार 12वें साल महाराष्ट्र किसानों की आत्महत्या के मामले में टॉप पर है. राज्य में 1995 से अब तक 60,750 किसान आत्महत्या कर चुके हैं.

दरअसल, किसानों की आत्महत्या के मामले में कमी इसलिए देखी जा रही है कि क्योंकि परंपरागत तौर पर किसानों की आत्महत्या वाले राज्यों में इस मामले को दबा दिया जा रहा है.

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मसलन छत्तीसगढ़ सरकार के मुताबिक 2011 में 0, 2012 में 4 और 2013 में 0 किसानों ने आत्महत्या की. पश्चिम बंगाल सरकार के मुताबिक 2012 और 2013 में किसी किसान ने आत्महत्या नहीं की.

इन दावों से पहले के तीन साल के दौरान छत्तीसगढ़ में किसानों की आत्महत्या का औसत 1567 और पश्चिम बंगाल का औसत 951 था.

संदेह बढ़ाने वाले आंकड़े

मैं ये नहीं कहता कि इन राज्यों में किसानों की आत्महत्या में कोई कमी नहीं हुई. लेकिन सालाना गिरावट या बढ़ोत्तरी मामूली ही होगी.

इस लिहाज़ से देखें तो पिछले तीन सालों के गिरावट के आंकड़े संदेह पैदा करने वाले हैं.

छत्तीसगढ़ में 2001 से 2010 के दौरान करीब 14 हज़ार किसानों ने आत्महत्या की, लेकिन आंकड़ों के मुताबिक 'अचानक' से अंतिम तीन सालों में किसी किसान ने आत्महत्या नहीं की.

किसानों की आत्महत्या के लिहाज़ से केंद्र शासित प्रदेशों में पांडिचेरी की स्थिति सबसे ख़राब रही है. यहां के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2011, 2012 और 2013 में किसी किसान ने आत्महत्या नहीं की. हालांकि 2010 में यहां चार किसानों ने आत्महत्या की. 2009 में इसी प्रदेश में 154 किसानों ने आत्महत्या की थी.

भारतीय किसानों की आत्महत्या के मसले पर महत्वपूर्ण अध्ययन करने वाले चेन्नई स्थित एशियन कॉलेज़ ऑफ़ जर्नलिज़्म के प्रोफेसर के नागाराज बताते हैं, "साफ़ है कि आंकड़ों के साथ बाज़ीगरी हुई है."

नागाराज कहते हैं, "अगर आप आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या कम करना चाहते हैं, तो उसे एकदम ग़ायब नहीं कर सकते. उसे आप किसी दूसरी कैटेगरी में डाल देते हैं. आंकड़ों में हेरफेर करने के लिए यही रास्ता अपनाया जाता है."

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के पास जमा कराए गए आंकड़ों में भारतीय राज्यों की ओर से यही गड़बड़झाला किया गया है.

क्या है गड़बड़झाला?

इसके अलावा राज्य स्तर पर एक दूसरी तरह की गड़बड़ी भी हुई है. एनसीआरबी के आंकड़ों वाले पृष्ठ पर दो तरह की कैटेगरी दर्ज है- एक तो स्वरोज़गार (खेती-किसानी) और दूसरी कैटेगरी है- स्वरोज़गार (अन्य).

छत्तीसगढ़ में किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा शून्य की ओर जा रहा लेकिन स्वरोज़गार (अन्य) की कैटेगरी में आत्महत्या करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी है.

छत्तीसगढ़ सरकार ने 2008 और 2009 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या नहीं बताई है. इन सालों में स्वरोज़गार (अन्य) की कैटेगरी में आत्महत्या करने वालों की संख्या है- 826 और 851.

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बीते दो साल में, राज्य में किसी किसान के आत्महत्या करने का मामला सामने नहीं आया है लेकिन इसी दौरान राज्य में स्वरोजगार (अन्य) की कैटेगरी में आत्महत्या करने वालों की संख्या है- 1826 और 2077.

महाराष्ट्र सरकार के दावे के मुताबिक उसके यहां किसानों की आत्महत्या में 640 मामले कम हुए हैं, जबिक इस दौरान स्वरोजगार (अन्य) की कैटेगरी में 1000 आत्महत्याएं बढ़ गई हैं.

मध्य प्रदेश में किसानों की आत्महत्या के 82 मामले कम हुए हैं जबकि स्वरोजगार (अन्य) कैटेगरी में 236 मामले बढ़ गए हैं. पांडेचरी में यही हाल है. पश्चिम बंगाल ने समस्या का और भी आसान हल निकाला है. राज्य सरकार ने किसी भी कैटेगरी में आत्महत्या करने वालों की संख्या 2012 से ही दर्ज नहीं की है.

<link type="page"><caption> किसानों की आत्महत्या </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/01/130128_indian_farmers_suicide_pk.shtml" platform="highweb"/></link>के मामले कमी का जश्न मनाने वाले, एक अन्य पहलू पर भी ध्यान नहीं दे रहे हैं.

आत्महत्या की वजह

भारतीय जनगणना के मुताबिक 2001 के मुक़ाबले 2011 तक किसानों की संख्या में 77 लाख की कमी हुई हैं. लाखों की संख्या में लोग खेती-किसानी छोड़ रहे हैं.

औसतन देश में 2000 से कम किसान खेती–किसानी छोड़ रहे हैं. इस लिहाज़ से 2013 में किसानों की संख्या भी कम हुई होगी.

कई अध्ययनों के मुताबिक 2011 में आबादी के दूसरे हिस्सों की तुलना में किसानों की आत्महत्या की दर 47 फ़ीसदी ज़्यादा थी. जिन राज्यों में खेती किसानी पर संकट है, वहां तो यह दर सौ फ़ीसदी ज़्यादा है.

तो क्या सिर्फ़ सूखे और फ़सल बर्बाद होने के चलते किसान आत्महत्या करते हैं?

दरअसल, अच्छी फ़सल होने पर भी किसान आत्महत्या करते हैं और जब फसल बर्बाद होती है तब भी. जब बारिश होती है तब भी, जब नहीं होती है तब भी.

आत्महत्या की वजहें

अच्छे मानसून के दौरान भी किसानों की आत्महत्या के ज़्यादा मामले सामने आए हैं और सूखे के दौरान भी.

कपास, गन्ना, मूंगफली, वनिला, कॉफी और काली मिर्च जैसी नकदी फसल उगाने वाले किसान भी आत्महत्या करते हैं.

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वहीं धान और गेहूं उपजाने वाले किसानों में आत्महत्या की दर कम है.

तो क्या तर्क देना सही होगा कि सूखे से नकदी फ़सल वाले किसान आत्महत्या करते हैं, खाद्यान्न उत्पादन करने वाले नहीं.

भारतीय खेती पर दक्षिण-पश्चिम मानूसन का अहम प्रभाव पड़ता है, लेकिन मानसून की कमी किसानों की आत्महत्या का मुख्य कारण नहीं है.

नकदी फसल के किसानों की आत्महत्या के ज़्यादातर मामलों में कर्ज़, लागत का बढ़ना, सिंचाई का तरीका और फसल का उचित दाम नहीं मिलने की भूमिका ज़्यादा होती है.

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