महँगाई-जमाख़ोरी: कहीं निगाहें, कहीं निशाना?

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भारत सरकार खाद्य पदार्थों के बढ़ते दाम के लिए जमाखोरी को ज़िम्मेदार बताती है. केंद्र में नई चुनी सरकार जमाखोरों के ख़िलाफ़ छापे मार रही है लेकिन क्या इससे खाने की चीज़ों के दाम कम हो जाएंगे? पूर्व कृषि मंत्री सोमपाल शास्त्री बता रहे हैं जमाखोरी की सात वजहें और महंगाई की असली वजह-

1. परिभाषा साफ़ नहीं

जमाखोरी का मतलब क्या है? अगर बड़ी कंपनियों ने खाद्य पदार्थों का स्टॉक कर लिया है तो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं होगी लेकिन अगर किसी दुकानदार ने राशन जमा किया तो उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई होगी. ये नीति साफ़ नहीं है. नियम साफ़ होने चाहिए कि कितना जमा किया जा सकता है और वो सब पर लागू हो. दूध या सब्ज़ियों की तो जमाखोरी नहीं हो सकती. वो ख़राब हो जाएंगी. आलू-प्याज़ की थोड़ी बहुत हो जाए तो हो जाए.

2. मार्केटिंग में समस्या

समस्या मार्केटिंग की है यानी कि वो मंडी व्यवस्था जिसमें जमाखोर बैठे हैं. इस संबंध में क़ानून 1954 में बना था. उसमें कोई सुधार नहीं करती है कोई सरकार. गुड़गांव में मंडी में मूली एक रुपए की थी और मंडी के गेट के बाहर दस रुपए में.

3. जमाखोरी का इलाज कानूनी नहीं नीतिगत

मंडियों में आए सामान का भाव गुप-चुप तय होता है इसकी कोई नीति नहीं है. किसानों को भी सही दाम नहीं मिलते. बाहर वही सामान महँगा बिकता है.

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4. सरकारी गोदामों की समस्या थोड़ी अलग

जमाखोरी शब्द का इस्तेमाल किया जाता है कि जानबूझकर उपभोक्ता से अधिक कीमत लेने के लिए सामान को दबा दो. बाज़ार में न आने दो. सरकारी गोदाम में तो चावल और गेहूं है, जो आवश्यकता से अधिक है. दाल और तिलहन का आयात हो रहा है. वो बैलेंस नहीं है कृषि उत्पादन में. इसलिए सरकारी गोदाम को दोषी नहीं ठहरा सकते. उनमें अनाज बर्बाद होता है वो एक अलग मुद्दा है.

5. खाद्य पदार्थों की सप्लाई

सप्लाई मूल समस्या है. ज़्यादातर गोदाम शहरों में हैं. आलू-प्याज़ के गोदाम खेतों के पास होने चाहिए. दिल्ली में नारायणा और लॉरेंस रोड में गोदाम बनाना बेमतलब है. आलू-प्याज़ के गोदाम हापुड़ जैसी जगहों में हों. गोदामों का कंप्यूटरीकरण होना चाहिए जिसका फ़ायदा किसान और उपभोक्ता दोनों को होगा. गोदाम से सरकार सामान ले-ले.

6. सरकारों की मंशा नहीं

भारत सब्ज़ी बाज़ार

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केंद्र की सरकारें कहती हैं कि ये राज्य सरकार का मसला है. केंद्र में अगर बीजेपी है और उन राज्यों में जहां बीजेपी है वो केंद्र की बात कैसे नहीं मानेंगे? ये बरगलाने की बात है. सरकारें कृषि को लेकर (जिसमें जमाखोरी भी आता है) गंभीर नहीं हैं और उनकी नीयत ठीक नहीं है.

7. मंडी समिति कानून का अड़ंगा

मंडी समिति क़ानून असल में जमाखोरी से बचाने के लिए बना था लेकिन इसके तहत जिसको लाइसेंस मिला वो जमाखोरी कर रहे हैं. किसान मंडी के अलावा बाहर बाज़ार में किसी को बेच नहीं पाता. असल में व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि किसान अपना सामान सीधे बाज़ार में बेच दे. मंडी समिति कानून कोई बदलता नहीं. चंडीगढ़ में किसान सीधे बाज़ार में माल बेचता है. इससे किसान को ज़्यादा पैसा और उपभोक्ता को सस्ता माल मिलता है.

बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत पर आधारित

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