एक महीने में मोदी का रिपोर्ट कार्ड कितना जायज़?

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
नरेंद्र मोदी को बतौर प्रधानमंत्री एक महीना हो गया है. उनके काम की समीक्षा हो रही है. ये 30 दिन सरकार के लिए काफ़ी चुनौती भरे रहे हैं.
उतार-चढ़ाव के बीच अब सरकार अपना पहला आम बजट पेश करने की तैयारी में है और समीक्षक मानते हैं कि तब यह पता चल पाएगा कि सरकार की दिशा क्या है.
सरकार की शुरुआत अच्छी मानी जा रही है क्योंकि मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के मुखिया शामिल हुए. इनमें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ और श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे भी थे.
फिर नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रियों से कहा कि वह अपने सौ दिनों की कार्ययोजना तैयार कर लें. इस क़दम की भी सराहना की गई. साथ ही मंत्रियों के निजी सचिवों की नियुक्ति पर प्रधानमंत्री कार्यालय की सहमति को भी एक बेहतर क़दम माना जा रहा है.
मंत्रियों के अलावा उनकी वरिष्ठ नौकरशाहों के साथ हुई बैठक और उसमें दिए गए उनके सुझाव की भी सराहना की गई.
विवाद भी
लेकिन शपथ लेने के अगले ही दिन सरकारी अधिकारियों को सोशल मीडिया पर हिंदी को प्राथमिकता देने के निर्देश के बाद विवाद छिड़ गया.

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ग़ैर हिंदी भाषी राज्यों के विरोध के बाद सरकार को स्पष्ट करना पड़ा कि यह आदेश सिर्फ हिंदी भाषी इलाक़ों के लिए ही था. उसी तरह धारा 370 और सेना अध्यक्ष की नियुक्ति पर उठे विवाद पर सरकार को थोड़ा परेशान होना पड़ा.
दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के राकेश सिन्हा का कहना है कि 30 दिनों में ही सरकार की समीक्षा करना नाइंसाफी होगी क्योंकि 'यह सरकार के अंकुरण का समय' ही है. वह कहते हैं कि इसके बावजूद इतने कम समय में ही नरेंद्र मोदी ने सरकार की कार्यशैली को बदलने के लिए महत्वपूर्ण क़दम भी उठाए हैं.
वह कहते हैं, "राजनेताओं और नौकरशाहों के बीच जो अस्वस्थ गठजोड़ था उसे बदलने की उन्होंने कोशिश की और उसमें वह कामयाब भी रहे. पहले मंत्री राजनीतिक ज़मींदारों की तरह होते थे मगर अब उसके शुद्धिकरण का काम हुआ है. मैं मानता हूँ कि किसी भी सरकार के लिए यह अहम होता है कि जिस स्थान से उसे काम करना है उस स्थान को वह उसके अनुकूल बनाए. नरेंद्र मोदी ने ऐसा करने में कामयाबी हासिल की है."
राकेश सिन्हा मानते हैं कि सरकार से सामने बड़ी चुनौती है महंगाई को रोकना और आम नागरिक को राहत देना जबकि दूसरी चुनौती है कालेधन की उगाही को रोकना.
रेल के किराए में हुई वृद्धि को वह रेल के सुधार की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण क़दम मानते हैं. उसी तरह उनका कहना है कि विदेशों में जमा काले धन पर जिस विशेष दल का गठन किया है वह भी एक सराहनीय क़दम है.
यह दल सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर तैयार किया गया है.
बजट का इंतज़ार
विदेश मामलों की भी सराहना करते हुए वह कहते हैं कि पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ-साथ विकसित देशों को भी सरकार ने काफ़ी अच्छा संदेश भेजा है जब नरेंद्र मोदी ने कहा कि वक़्त आंख दिखाने का नहीं बल्कि आंख मिलाकर काम करने का है.

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वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वर्धराजन कहते हैं कि सरकार ने अपने चुनावी घोषणापत्र में भी बड़े-बड़े वायदे किए. राष्ट्रपति के भाषण में भी उन्हीं वादों को दोहराया गया, मगर किस तरह वह अपने वादों पर अमल करेंगे, यह अभी तक नहीं दिख पा रहा है.
वह कहते हैं, "नरेंद्र मोदी ने गोवा में जो बयान दिया वह एक तरह की चेतावनी ही थी कि अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए कुछ सख्त फैसले लिए जा सकते हैं. इस कड़ी में रेल का किराया तो बढ़ गया और मुझे लगता है कि आने वाले आम बजट में चीज़ों की कीमतें भी बढ़ेंगी."
दूसरी तरफ़ उनका कहना है कि नरेंद्र मोदी ने अपनी छवि एक निर्णय लेने वाले राजनेता की बनाई थी मगर ऐसा होता नज़र नहीं आया.
वह मानते हैं कि हिंदी को सरकारी सोशल मीडिया पर पहली भाषा के रूप में इस्तेमाल करने का निर्देश भी ऐसा ही कुछ है. वहीं हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय में उठे विवाद को भी वह उसी की कड़ी के रूप में देखते हैं.
लेकिन सभी पक्षों का मानना है कि एक महीने की अवधि सरकार के काम-काज की समीक्षा करने के लिए पर्याप्त नहीं है. कुछ का मानना है कि आम बजट के बाद यह स्पष्ट हो जाएगा कि सरकार अपने वादों पर कितना खरा उतरती है.
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