लालू-नीतीश की नज़दीकी गठबंधन में बदलेगी?

नीतीश और लालू

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    • Author, मनीष शांडिल्य
    • पदनाम, पटना से बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए

सोलहवें लोकसभा के नतीजे जितने चौंकाने वाले नहीं रहे उनसे ज़्यादा चौंकाने वाली राजनीतिक ख़बरें इसके असर से आ रही हैं. 17 मई से लगभग हर रोज़ बिहार से यह सिलसिला जारी है.

17 मई से 21 मई के बीच इस्तीफ़ा देने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जनता दल यूनाइटेड अपने फ़ैसलों से सुर्ख़ियां बटारेते रहे, तो 22 मई को राष्ट्रीय जनता दल ने चौंकाया.

22 मई को जदयू सरकार को राजद के समर्थन देने के बाद राजनीति का सबसे चर्चित सवाल यह है कि इस नज़दीकी के मायने क्या हैं? क्या यह अप्रत्याशित है? साथ ही यह भी कि आने वाले दिनों में इसका अंजाम क्या एक नए राजनीतिक गठबंधन की शक्ल में दिखाई देगा?

आम चुनाव के नतीजे लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार दोनों के लिए अप्रत्याशित रहे. ख़ासकर लालू प्रसाद के लिए. मीडिया में राजद के अच्छे प्रदर्शन की बात कही जा रही थी, लेकिन नतीजों में यह दिखा नहीं.

लोकसभा चुनाव के नतीजे

दोनों दलों के क़रीब आने को लेकर वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं, चुनाव "नतीजों ने इन दोनों के अस्तित्व के समक्ष गंभीर चुनौती पेश की है. ख़तरे की घंटी ये साफ़ सुन पा रहे हैं और ऐसा लग रहा है. इससे बचने के लिए इन दोनों के बीच कुछ पक रहा है."

साथ ही शिवानंद यह राय भी रखते हैं कि दोनों दल फिलहाल क़रीब आकर यह संदेश भी देना चाहते हैं कि वे सांप्रदायिक ताक़तों के ख़िलाफ़ हैं.

राजनीतिक विश्लेषक सत्यनारायण मदन का कहना है, "सामाजिक न्याय की विरोधी शक्तियां पहले सिर्फ लालू के ख़िलाफ़ थीं और अब नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ भी हो गई हैं. ऐसे में यह क़रीबी सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले दो दलों के बीच से निकलने वाले स्वाभाविक संकेत हैं."

दिलचस्प यह भी है कि पर्दे के पीछे जो भी चला हो, प्रत्यक्ष तौर पर जदयू ने समर्थन मांगा नहीं था. बिन मांगे दिए गए समर्थन की वजह शिवानंद तिवारी यह देखते हैं कि ऐसा कर राजद जदयू को राजनीतिक प्रतिक्रिया देने के लिए बाध्य करना चाह रहा है.

नया मुख्यमंत्री

नीतीश कुमार के इस्तीफ़े के बाद जदयू विधायक दल के नेता के रूप में कई लोगों के नाम ज़ोर-शोर से चर्चा में थे. इनमें से यादव जाति से आने वाले दो नेता भी थे. ये थे विजेंद्र प्रसाद यादव और नरेंद्र नारायण यादव.

ऐसे में बिहार की राजनीति में एक सवाल यह भी तैर रहा था कि अगर जदयू की ओर से इन दोनों में से किसी को नेता चुना जाता है तो क्या राजद और जदयू क़रीब आएंगे?

यह सवाल इस कारण चर्चा में था क्योंकि जानकारों का मानना था कि जदयू के यादव मुख्यमंत्री को समर्थन देना राजद के लिए इस कारण संभव नहीं होगा क्योंकि इससे उसके मूल आधार वर्ग को नुक़सान पहुंचने का ख़तरा पैदा होता.

नीतीश शरद

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जहां एक ओर शिवानंद इस बात से इत्तेफ़ाक रखते हैं कि किसी यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद राजद के लिए क़रीब आना मुश्किल होता.

वहीं सत्यनारायण मदन इन नामों को मीडिया की कयासबाज़ी क़रार देते हैं, "जदयू का ऐतिहासिक उद्भव जिस तरह हुआ है, उसमें यह संभव नहीं है कि कोई यादव इस दल का नेतृत्व करे."

गठबंधन

20 साल बाद नीतीश और लालू के क़रीब आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आने वाले दिनों में दोनों दलों के बीच गठबंधन होगा?

इस संबंध में जानकार अलग-अलग राय रखते हैं. संभावित रुकावटों के बारे में वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार कहते हैं कि गठबंधन की स्थिति में यह सवाल होगा कि नेता नीतीश होंगे या लालू. किस पार्टी के हिस्से ज़्यादा सीटें आएंगी.

राजद हालिया आम चुनाव के आधार पर ख़ुद को बड़ा कहेगी तो जदयू विधायक संख्या के आधार पर. उनका कहना है कि ऐसे में दावों-प्रतिदावों पर सहमति कैसे बनती है, यह देखना दिलचस्प होगा.

इस संबंध में शिवानंद तिवारी का कहना है कि दोनों दलों का सामाजिक या जातीय आधार एक-दूसरे को कितना स्वीकार कर पाता है. यह भी गठबंधन का स्वरूप तय करने में मुख्य भूमिका निभाएगा.

लालू प्रसाद यादव

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लेकिन सत्यनारायण मदन इस शंकाओं और सीमाओं को ख़ारिज करते हैं.

वे कहते हैं, "दोनों दलों के आधार वर्ग के बीच अंतर्विरोध है, लेकिन ये विरोधी नहीं हैं. यह अप्रत्यक्ष सूत्र सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के एजेंडे के साथ इन दोनों दलों को एकसाथ लाएगा."

उपचुनाव

दोनों दलों की राजनीतिक नज़दीकियां किसी चुनावी गठजोड़ या कम-से-कम चुनावी तालमेल की शक्ल लेती हैं या नहीं, इसके लिए 2015 के अंत में तय विधानसभा चुनाव का इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा.

जल्द ही बिहार में 11 विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव होंगे. फिलहाल बिहार विधानसभा में सात सीटें खाली हैं और जल्द ही चार और सीटें खाली हो जाएंगी, क्योंकि बिहार से भाजपाके चार विधायक सांसद चुने गए हैं.

इसमें दिलचस्प यह है कि वर्तमान में जो सात सीटें खाली हैं इनमें से पांच 17 मई के बाद तब खाली हुईं, जब राजद के तीन और भाजपा के दो विधायकों ने जदयू से अपनी नज़दीकियों के कारण अलग-अलग तर्कों के साथ इस्तीफ़ा दे दिया.

ऐसे में आगामी उपचुनाव के दौरान राजद-जदयू गठबंधन की तस्वीर साफ़ होने की संभावना है. कम-से-कम इसके संकेत तो मिल ही सकते हैं.

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