भाजपा ने कैसे हासिल की ऐतिहासिक जीत?

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- Author, संजय कुमार
- पदनाम, प्रोफ़ेसर, सीएसडीएस, बीबीसी हिंदी डॉटकाम के लिए
16वें आम चुनाव में 282 सीटों पर विजय हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी भाजपा को अकेले अपने दम पर बहुमत मिल चुका है. भाजपा गठबंधन को 330 से ज़्यादा सीटें मिली हैं. यानी यह एक भारी जीत है.
ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर भाजपा की इस अभूतपूर्व जीत के पीछे क्या कारण थे. और क्या भाजपा की इस जीत ने कुछ पुराने जमे-जमाए राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं.
इस जीत का पहला सबसे बड़ा कारण तो यह रहा कि कांग्रेस ने भाजपा के लिए अकेले खेलने के लिए पूरा मैदान खाली छोड़ दिया.
वहीं कांग्रेस के प्रति लोगों में बहुत आक्रोश था. इसकी वजह से ढेर सारे मतदाताओं ने, जिन्होंने पहले कांग्रेस और उसके सहयोगियों के लिए वोट किया था, इस बार उन्होंने भाजपा को वोट दिया.
ये सभी लोग परिवर्तन चाहते थे और भाजपा के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर जो पार्टी विकल्प के रूप में दिखाई दे रही थी, उसे इन सबने वोट दिया.
गांव बनाम शहर
आमतौर पर माना जाता था कि भाजपा शहरी पढ़े-लिखे मध्य वर्ग की पार्टी है.
भाजपा को जिस तरह वोट प्रतिशत मिला है, जिस तरह की सीटें मिली हैं उसके अऩुसार भाजपा ने इस मिथक को तोड़ दिया है.

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भाजपा को छोटे छोटे ग्रामीण इलाके में अभूतपूर्व समर्थन मिला है. पहले कभी भी भाजपा को गांवों में इस तरह वोट नहीं मिला.
इससे एक संकेत यह भी मिल रहा है कि भाजपा की लंबी पकड़ बन सकती है, क्योंकि वह गांवों तक पहुंच गई है.
जाति का बंधन
कुछ लोग कह रहे हैं आकांक्षाओं और विकास के नाम पर वोट पड़ा है. जाति के आधार पर वोट नहीं पड़ा है. लेकिन इस चुनाव में भी जाति के आधार पर वोट पड़ा है. लेकिन इस बार इसकी दिशा थोड़ी अलग थी.
पहले जाति के आधार यादव, पिछड़े वर्ग और दलित वोट दिया करते थे. लेकिन ऊँची जातियों का वोट इस बार जिस तरह भाजपा के लिए ध्रुवीकृत दिखाई दे रहा है बिहार, उत्तर प्रदेश एवं अन्य कई राज्यों में, वैसा कभी नहीं देखा गया. साथ ही साथ भाजपा अन्य जातियों के वोट बैंक में सेंध लगाने में सफल रही है. यही भाजपा की बड़ी जीत का कारण है.

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ऐसा नहीं है कि इस चुनाव में जातीय समीकरण ध्वस्त हो गए हैं. कुछ पार्टियों के लिए जातीय समीकरण थोड़े ढीले पड़े हैं. जैसे बिहार जातीय समीरकरण स्पष्ट दिखाई पड़ रहे हैं.
राष्ट्रीय जनता दल के लिए मुस्लिम और यादव मतदाताओं ने बड़ी संख्या में वोट किया है. लेकिन दूसरी तरफ़ अन्य जातियों का ध्रुवीकरण भाजपा की तरफ हुआ है.
बिहार में चार ऊँची जातियों (ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ) के 85-90 प्रतिशत मतदाताओं ने भाजपा के लिए वोट किया.
ऐसा बिहार में पहले कभी नहीं हुआ. यहाँ किसी एक जाति ने किसी एक पार्टी के लिए ऐसा जन समर्थन पहले नहीं दिखाया था.
उत्तर प्रदेश में भी ऐसा ही हुआ. यूपी में एक तरफ़ यादवों और दलितों को वोट कुछ बंटता हुआ दिखाई पड़ता है लेकिन यहाँ भी जिस तरह ऊँची जातियों का ध्रुवीकरण भाजपा की तरफ हुआ वो ध्यान देने वाला है.

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यूपी में ऊंची जातियों का भाजपा की तरफ़ ऐसा ध्रुवीकरण में पहले कभी नहीं दिखाई पड़ा था.
इसलिए कुछ हद तक मैं मानता हूँ कि इस बार जातियों और पार्टियों का वोट देने का परंपरागत संबंध नदारद दिखाई पड़ता है लेकिन एक दूसरे तरह का ध्रुवीकरण हुआ है.
दलित वोट बैंक
अगर यूपी की बात करें तो यूपी में दो तरह के दलित हैं जाटव और ग़ैर जाटव. जाटव तो अभी भी मायावती के लिए वोट कर रहे हैं.
लेकिन जो अन्य दलित जातियाँ हैं उनमें भाजपा ने बड़ी पैठ बनाई है. ऐसी जातियों ने बहुत बड़ी संख्या में यूपी में भाजपा के लिए वोट किया है.
बिहार में दलितों को दो भागों में बांट कर देख सकते हैं, पासवान और ग़ैर पासवान.
पासवान जाति ने बड़ी संख्या में भाजपा और लोजपा के लिए वोट किया है. इसकी ख़ास वजह है कि भाजपा ने रामविलास पासवान के साथ गठबंधन किया था.
जहाँ तक दूसरी दलित जातियों का सवाल है उनका बंटा हुआ है. लेकिन उनमें भी पिछले चुनावों की तुलना में भाजपा को वोट देने वाली की संख्या काफ़ी बढ़ी है.
(बीबीसी संवाददाता रूपा झा से बातचीत पर आधारित)
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