'युवाओं की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी कांग्रेस'

- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
कांग्रेस के युवा नेता सचिन पायलट मानते हैं कि कांग्रेस पार्टी युवा मतदाताओं की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई. लेकिन एक चुनाव में हार का मतलब कांग्रेस का अंत नहीं है और पार्टी दोबारा खड़ी होगी.
सचिन पायलट से बात की बीबीसी संवाददाता सलमान रावी ने.
कांग्रेस की सरकार में अग्रिम पंक्ति के जो चेहरे नज़र आते थे, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत, ज़्यादातर राज्यसभा सांसद थे. जिन नेताओं ने कभी चुनाव नहीं लड़ा, वे आगे रहे. क्या कारण है कि युवा चेहरे पीछे ही रह गए?
कांग्रेस पार्टी में सब तरह के लोग हैं. मगर ये बात भी सच है की हम युवाओं की अपेक्षा पर खरा नहीं उतर पाए.
युवाओं ने कांग्रेस के पक्ष में ज़्यादा मतदान नहीं किया. इसमें ग़लती किसी की नहीं है. ग़लती सिर्फ़ हमारी है. हमने उनकी उम्मीदों को सही तरह से समझा नहीं.
जो नया वोटर है, या यूं कहिए कि जो 18 से लेकर 25 साल की उम्र के मतदाता हैं, उसे हम पूरी तरह संतुष्ट करने में कामयाब नहीं रहे.
क्या कांग्रेस चुनाव के लिए तैयार ही नहीं थी?
दस सालों तक हमने सरकार चलायी. मेरा ऐसा मनना है कि अपने कार्यकाल में हमने जो नियम, क़ानून, कार्यक्रम और योजनाएं लागू की थीं वह देश के कल्याण के लिए थीं. मगर कहीं ना कहीं हमारा संदेश देश की जनता तक सही ढंग से नहीं पहुँच पाया. हमारी मार्केटिंग, पैकेजिंग, ब्रांडिंग उस स्तर की नहीं हो पायी जैसी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की थी. हम लोगों के अंदर भी आत्मचिंतन करने की ज़रूरत है क्योंकि हार एक तरफ़ होती है, मगर जिस अंतर से हम हारे हैं वो निश्चित रूप से काफ़ी चिंता का विषय है. कांग्रेस पार्टी का एक कार्यकर्ता होने के नाते मुझे लगता है कि हम एक चौराहे पर खड़े हैं. आने वाला रास्ता तय करने के लिए हमें बड़े बदलाव करने पड़ेंगे और ख़ुद को झिंझोड़ना पड़ेगा.
कांग्रेस क्या एक परिवार की पार्टी बन कर रह गई है?
आपको याद होगा कि पिछले 25 साल में गांधी परिवार का कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री नहीं बना, साल 1989 से लेकर आज तक.

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यह बात सही है कि सोनिया गांधी को लोग बार-बार पार्टी अध्यक्ष चुनते हैं क्योंकि वह पार्टी में एकता का प्रतीक हैं. वह चुनाव जीतती रही हैं और जिताती रही हैं. साल 2004 में उनके नेतृत्व में हम चुनाव जीते और साल 2009 में उन्होंने चुनाव जिताया और इस बार हम हारे हैं.
हमें लगता है कि वह अपनी कार्यशैली से लोगों को संगठित करने में कामयाब रहती हैं. कांग्रेस के नेता उन्हें धर्म, भाषा, जाति से हटकर देखते हैं. उनसे पार्टी को लाभ मिलता है, नेतृत्व मिलता है.
लेकिन अब समय आ गया है कि हमें भविष्य के लिए दूसरे स्तर का नेतृत्व तैयार करना होगा. राज्य के नेतृत्व को और मज़बूत करना होगा. जनाधार वाले नेताओं को अगर सम्मान और इज़्ज़त देकर संगठन में जगह दी जाएगी, तो कांग्रेस पार्टी का कार्यक्षेत्र और व्यापक होगा.
मनीष तिवारी चुनाव लड़ने से पीछे हट गए और बहुत से नेताओं ने आधे मन से चुनाव लड़ा. जबकि यूपीए-1 और यूपीए-2 ने जनता के लिए कई अहम काम किए. तो क्या वे अपनी उपलब्धियां जनता तक नहीं पहुंचा सके?
जब कोई पार्टी या आदमी चुनाव हारता है, तो इसके कारण बताने वाले 500 लोग आ जाते हैं. मगर यह सही है कि हमने लोगों को अधिकार दिया है शिक्षा, खाद्य सुरक्षा और सूचना का.
स्वास्थ्य का अधिकार हम देने वाले थे. हमारे काम में कमी नहीं थी, चाहे वह ऊर्जा का क्षेत्र हो या कृषि का.
दूसरी बात चुनाव कौन लड़ेगा या नहीं लड़ेगा, यह पार्टी का निर्णय होता है. पार्टी जिताऊ उम्मीदवार को टिकट देकर चुनाव लड़ाती है. कभी कोई चुनाव हारने के लिए चुनाव नहीं लड़ता.
हम चुनाव लड़े और हमने जनादेश को बड़ी विनम्रता से स्वीकार किया है. और यह जीवन का अंत नहीं है. चुनाव हारे हैं, हमारा अस्तित्व ख़त्म नहीं हुआ है.

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हम कांग्रेस के कार्यकर्ता अपनी जगह पर खड़े हैं. देश की नई सरकार अगर कभी वह जनहित के ख़िलाफ़ काम करती है, तो हम अपनी ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी निभाएंगे.
मगर प्रभावी विपक्ष की भूमिका आप कैसे निभाएंगे क्योंकि कांग्रेस को इतनी सीटें भी नहीं मिली हैं?
प्रभावी विपक्ष के लिए संख्या बल की नहीं बल्कि मनोबल की ज़रूरत होती है.
सचेत रहकर सरकार को सही रास्ते पर चलाने की ज़िम्मेदारी प्रजातंत्र में जितनी सत्ता पक्ष की होती है, उतनी ही विपक्ष की भी होती है. संख्या बल चाहे कुछ भी हो, हमारे मनोबल, हमारे संकल्प में कोई कमी नहीं आई है.
कांग्रेस का क्या भविष्य देखते हैं? पार्टी किस मोड़ पर खड़ी है?
कांग्रेस एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां बहुत से बदलाव करने होंगे. अभूतपूर्व बदलाव करने होंगे, सच्चाई कबूल करनी होगी. सच्चाई यह कि यह भारत 21वीं सदी का भारत है.
हमें नौजवानों की इच्छा और आकांक्षाओं के अनुरूप काम करना होगा. जो जननेता नीतियां बनाते हैं और कांग्रेस पार्टी के जो नीति निर्धारक हैं, उन्हें ज़मीन से जुड़ना होगा.
जनाधार वाले व्यक्ति को ही शीर्ष पद पर बैठाना होगा, चाहे वो राज्य में हों या ज़िले में हो. राष्ट्रीय स्तर पर सोनिया गांधी हमारी राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.
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