'कांग्रेस हारी तो है, लेकिन ख़त्म नहीं हुई'

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- Author, मिलन वैष्णव
- पदनाम, राजनीतिक विश्लेषक
भारतीय जनता पार्टी के हाथों मिली करारी हार के बाद राजनीतिक विश्लेषक देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस पर श्रद्धाजंलि लेख लिखने लगे हैं.
भारत की आज़ादी के बाद देश में ज़्यादातर समय इसी पार्टी का राज रहा है. ये श्रद्धाजंलि लेख चाहे जितने भी लुभावने हों, समय से पहले ही लिखे जा रहे हैं.
कांग्रेस के उत्थान और पतन की कहानी पहले भी कई बार लिखी जा चुकी है और हर बार इन कहानियों को फाड़कर कूड़े के डब्बे में फेंकना पड़ा है.
पहले भी कम से कम दो बार ऐसा हो चुका है, जब कांग्रेस लगभग मृतप्राय हो गई थी. सबसे पहले 1977 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी दो सालों के आपातकाल के बाद सत्ता से बाहर कर दी गई थीं.
उसके तीन साल बाद कांग्रेस ने संसदीय चुनाव में लगभग 70 फ़ीसदी सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की थी. यह कांग्रेस के सबसे शानदार प्रदर्शनों में से एक था.
पार्टी को एक बार 1999 में ख़त्म घोषित कर दिया गया था जब कांग्रेस के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी ने पार्टी की कमान अपने हाथों में ली थी.
हार के बाद जीत

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1999 में हुए चुनावों में कांग्रेस को बड़ी हार का सामना करना पड़ा था. कांग्रेस को कुल 543 लोकसभा सीटों में से 114 पर ही विजय मिली थी. लेकिन साल 2004 में सोनिया ने पार्टी को उबार लिया, एक नहीं दो बार.
संसदीय सीटों के लिहाज से देखें तो इस बार कांग्रेस का प्रदर्शन ऐतिहासिक रूप से बेहद ख़राब रहा है. लेकिन अखिल भारतीय स्तर पर कांग्रेस को प्राप्त वोट का प्रतिशत देखें तो उसके आधार पर पार्टी की स्थिति उतनी ख़राब नहीं हुई है.
भारत की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था और भारती सत्ता विरोधी भावनाओं के कारण कांग्रेस को 20 प्रतिशत से थे से कम वोट मिले हैं.
इस चुनाव में बने विरोधी राजनीतिक माहौल के बावजूद कांग्रेस ने अपने 'समर्पित वोट बैंक' के बड़े हिस्से को बचाए रखा है. कांग्रेस के लिए समर्पित मतदाताओं की संख्या में तेज़ी के गिरावट आई है लेकिन यह गिरावट स्थाई नहीं है हा हतोत्साहित करने वाला ज़रूर है.
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हालांकि मीडिया को पूरा ध्यान संसद के निचले सदन (लोकसभा) पर रहता है लेकिन भारत एक द्विसंसदीय प्रणाली वाला देश है. ऊपरी सदन यानी राज्यसभा के सदस्य अपरोक्ष मतदान के ज़रिए छह साल के लिए चुने जाते हैं. राज्यसभा के लिए नए सदस्य हर दो साल पर चुने जाते हैं.

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भले ही लोकसभा चुनाव में भाजपा को ऐतिहासिक जीत मिली है राज्यसभा में उसके 46 सदस्य ही हैं जबकि कांग्रेस के 68 सदस्य हैं.
यानी राज्यसभा के कुल 245 सदस्यों में भाजपा और उसके सहयोगी दलों का बहुमत नहीं है. जबकि राज्यसभा में कांग्रेस के पास प्रभावशाली संख्या है.
2015 के अंत तक राज्यसभा की केवल 23 सीटें खाली होने वाली हैं, इसलिए राज्यसभा की आंतरिक गणित में ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला है.
सत्ता का केंद्र
एक बात यह भी ध्यान देने वाली है कि भारत सरकार के प्रशासन का केंद्र मुल्क की राजधानी दिल्ली से सूबों की राजधानियों की तरफ स्थानांतरित हो रहा है.
लोकसभा में भारी हार का सामना करने के बावजूद देश के 29 राज्यों में से 11 में कांग्रेस की सरकार है. दो अन्य राज्यों में कांग्रेस गठबंधन की सरकार है.
इनमें से कई राज्य है छोटे राज्य हैं और उनका कोई राजनीतिक प्रभाव नहीं है. लेकिन संगठित रूप से इन राज्यों की संघीय सत्ता में उल्लेखनीय भागीदारी है.
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प्रतिशत के अनुसार देखें तो अभी भी देश भर में मौजूद कुल विधायकों में से 27 प्रतिशत कांग्रेस के पास हैं, भाजपा के कुल 21 प्रतिशत विधायक हैं.

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लोकसभा चुनावों के साथ हुए चार विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को लगे झटके के बाद कांग्रेस के विधायकों के प्रतिशत में कुछ कमी ज़रूर आएगी. लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक विधायकों के संख्या के मामले में शायद कांग्रेस अब भी देश की सबसे बड़ी पार्टी रहेगी.
कांग्रेस के पास जो शक्ति अभी है वो इस बात का बहाना नहीं बन सकती कि पार्टी के वफ़ादार आम चुनावों में मिली क़रारी हार से किनारा कर लें. इसके उलट पार्टी को कई मोर्चों पर एक साथ त्वरित कार्रवाई करनी होगी.
पार्टी की सबसे पहली ज़रूरत है कि वो नेता का चुनाव करे. कांग्रेस उपाध्यक्ष और गांधी परिवार के वारिस राहुल गांधी को या तो खुलकर सामने आगे आना होगा या फिर भद्र तरीके से किनारे हो जाना होगा.
राहुल गांधी की स्थिति ऐसी रही है कि 'न वो अंदर हैं, न वो बाहर हैं.' उनकी इस स्थिति से पार्टी की विश्वसनीयता को भारी नुक़सान पहुँचा है.
क्षेत्रीय क्षत्रपों की ज़रूरत
कांग्रेस को भाजपा से सबक़ लेते हुए अपने प्रभावशाली क्षेत्रीय नेताओं को और मज़बूत बनाना होगा. कुछ साल पहले तक भाजपा को एक एकीकृत राष्ट्रीय पार्टी मानने के बजाय असंबद्ध क्षेत्रीय राजनीतिक शक्तियों का समूह कहा जाता था.

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उस समय इसे भाजपा की कमज़ोरी माना जाता था लेकिन ज़मीन से जुड़े क्षेत्रीय नेताओं की वजह से भाजपा ने राज्यों में अपनी संभावनाओं में नाटकीय सुधार किया है. जिनका सीधा सकारात्मक प्रभाव आम चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन पर पड़ा है.
कांग्रेस को अपनी धर्मनिरपेक्षता और समाजिक कल्याण की साझा राजनीति से आगे बढ़ना होगा. पार्टी अपनी इन बुनियादी विचारधाराओं को शायद न छोड़े लेकिन उसे इनके साथ देश के आर्थिक भविष्य से जुड़े विचारों के बारे में सोचना होगा, जो कि नरेंद्र मोदी का मुख्य मुद्दा रहा है.
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फ़िलहाल दो तथ्यों पर ध्यान देने की ज़रूरत है. कम से कम अगले 15 सालों तक भारतीय कामगारों की संख्या में हर महीने तक़रीबन 10 लाख नए लोग जुड़ेंगे.
वहीं साल 2010 से 2050 के बीच तक़रीबन 50 करोड़ लोग गांवों से शहरों में आएंगे. आम भारतीय रोज़गार और विकास से जुड़ी इन भावी स्थितियों के मद्देनज़र एक अति महत्वाकांक्षी सपना देख रहे हैं. इन लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा भी ज़्यादा बड़ा मुद्दा नहीं प्रतीत होती.
कांग्रेस हारी तो है, लेकिन ख़त्म नहीं हुई है.
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