शेयर बाज़ार में आया उछाल वाकई बुलबुला है?

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विभिन्न एक्ज़िट पोल में भारत की अगली सरकार भारतीय जनता पार्टी की अगुआई में बनने के पूर्वानुमानों के बाद से शेयर बाज़ार में ऐतिहासिक उछाल देखा गया. लेकिन क्या ये एक स्थिर बढ़ोतरी है या सिर्फ एक बुलबुला.
आइए जानते हैं इस बारे में क्या कहना है शेयर बाज़ार के जानकार और 'वैल्यू रिसर्च' के सीईओ धीरेंद्र कुमार का.
क्या मौजूदा उछाल सिर्फ़ एक बुलबुला है?
शेयर बाज़ार में बीते दिनों आए उछाल को बुलबुला नहीं कहा जा सकता है. बाज़ार बीते कई महीनों से सकारात्मकता का इंतज़ार कर रहा था और एक नई सरकार की उम्मीद के चलते ये उछाल देखने को मिला है.
बीते 3-4 साल में बाज़ार आगे बढ़ा ही नहीं इसलिए, ये एक नई शुरुआत का सूचक भी हो सकता है.
शेयर बाज़ार कैसे पहुंचा 24,000 के स्तर तक?
शेयर बाज़ार में निवेश बढ़ा है और ये कहना ज्यादा बेहतर होगा कि बिकवाली कम हुई है. पिछले चार-पांच साल से देसी निवेशक बाज़ार से गायब थे और बीते दो-तीन महीनों में वो एक बार फिर सक्रिय हुए हैं.
पिछले दो सप्ताह में देसी निवेशकों ने काफ़ी ख़रीदारी की है. निवेशक म्यूचुअल फंड में लगा पैसा निकाल रहे थे, जो अब कम होता दिख रहा है.
कितना नया निवेश हुआ?

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हमारे बाज़ार में विदेशी निवेश एक महत्वपूर्ण अनुपात में है और काफ़ी हद तक ये भी कारण रहा कि भारत की अर्थव्यवस्था में आई कमज़ोरी का बहुत ज़्यादा दुष्प्रभाव शेयर बाज़ार पर नहीं पड़ा.
पिछले ढाई-तीन महीने में पहली बार म्यूचुअल फंड से बाज़ार में लगभग सात हज़ार करोड़ रुपए का निवेश हुआ है.
कौन कर रहा है निवेश?
पिछले चार-पांच दिनों में शेयर बाज़ार में जो उछाल आया है उसके पीछे बड़े स्टॉक ब्रोकर्स हो सकते हैं, जो केवल उम्मीद के बल पर छोटी अवधि के मुनाफ़े के लिए निवेश कर रहे हैं.
बैंकिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में निवेश हो रहा है जो पिछले कई सालों से ठंडे पड़े हुए थे. वहां से लोगों को बड़ी उम्मीद है कि कोई बड़ा बदलाव आ सकता है.
इससे पहले के लोकसभा चुनावों के वक़्त भी आया था उछाल

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लोकसभा चुनावों के आगे-पीछे उछाल और गिरावट का उदाहरण मौजूद है. साल 2004 के चुनावों में निवेशक उम्मीद कर रहे थे कि भाजपा गठबंधन की सरकार वापस आएगी एक्ज़िट पोल भी यही कह रहे थे, लेकिन सरकार नहीं आई और शेयर बाज़ार 13-14 प्रतिशत तक गिर गया था.
जबकि 2009 में किसी को उम्मीद नहीं थी कि यूपीए की सरकार वापस आएगी, लेकिन यूपीए वापस आई और वो भी बिना लेफ्ट के समर्थन के, जिसके फलस्वरूप बाज़ार में 14-15 फ़ीसदी तक का उछाल आया था.
क्या इस स्तर पर स्थिर रहेगा सूचकांक?
16 मई को अगर देश को एक स्थिर सरकार मिल जाती है तो, नई सरकार की नीतियों और नेताओं को दिए गए पोर्टफोलियों के आधार पर शेयर बाज़ार प्रतिक्रिया देगा.
मुझे लगता है कि ये एक अच्छी, तेज़ शुरुआत भी हो सकती है. वहीं अगर सरकार बनने में देरी लगी या त्रिशंकु जैसी कोई स्थिति बनी तो मौजूदा स्तर से दस प्रतिशत तक की गिरावट भी हो सकती है क्योंकि, लगभग इतनी ही बढ़ोतरी पिछले चार-पांच महीने में हुई है.
क्या करना चाहिए छोटे निवेशकों को?

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छोटे निवेशकों को रोज़ाना के स्टॉक टिप्स पर तुरंत भरोसा नहीं करना चाहिए और इस चुनावी उछाल से फ़ायदा उठाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. उन्हें लंबे दौर के लिए निवेश पर ध्यान देना चाहिए.
सूचकांक के क्रैश होने के ख़तरों से बचने के लिए क्या क़दम उठा रही है सरकार?
रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि बीते कुछ सप्ताह से बाज़ार की वित्तीय व्यवस्था पर उनकी नज़र बनी हुई है और अगले कुछ दिनों में होने वाली किसी भी अनिश्चितता के लिए वो पूरी तरह से तैयार हैं.
बाज़ार के जानकारों का मानना है कि नियंत्रक और सरकारी एजेसियां शेयर बाज़ार में गिरावट या उछाल को पूरी तरह से नियंत्रित नहीं कर सकती, लिहाज़ा ऐसे समय में किसी भी तरह का निवेश करने से पहले ठीक से सोच-समझ लेना चाहिए.
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