राहुल हों या मोदी, क्यों नहीं उठाते दंगों का मुद्दा?

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- Author, मनोज मित्ता
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
आम चुनावों के लिए प्रचार के अंतिम दौर में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने अपनी एक रैली में 1982 में आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री टी अजैया की राजीव गांधी द्वारा की गई कथित बेइज़्ज़ती का मामला उठाया.
नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस में एक परिवार विशेष की चापलूसी की परंपरा की याद दिलाई. अजैया उस समय आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री थे और राजीव गांधी पार्टी के महासचिव मात्र थे फिर भी वो राजीव को लेने के लिए हैदराबाद हवाईअड्डे पर ख़ुद पहुंचे.
<link type="page"><caption> सियासत पर दंगों के दाग़</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/02/140210_india_riots_politics_aa.shtml" platform="highweb"/></link>
उस घटना से जनता में भारी रोष फैला था. उस घटना के बाद हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को आंध्र प्रदेश में तेलुगु देशम पार्टी के हाथों हार का सामना करना पड़ा.
मोदी ने जब इस घटना का ज़िक्र किया तो कांग्रेस ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया की लेकिन मोदी ने उसका जवाब यह कहकर दिया कि वो तो केवल एक तथ्य का बयान कर रहे थे.
लेकिन इससे भी ख़तरनाक नज़ीर राजीव गांधी ने अपनी मां की हत्या के बाद 1984 में रखी थी. चूंकि यह मामला सांप्रदायिक हिंसा से जुड़ा हुआ है और मोदी के गले में भी ऐसी ही हिंसा का एक मामला अटका हुआ है, इसलिए प्रधानमंत्री पद की दावेदारी पेश करने के लिए राजीव की यह नज़ीर मोदी के लिए ज़्यादा प्रासंगिक है.
ख़ौफ़नाक दंगे

भारत की राजधानी में सिखों के ख़िलाफ़ जो बदले की कार्रवाई की गई थी उसमें सबसे ज़्यादा ख़ौफ़नाक नरसंहार त्रिलोकपुरी के ब्लॉक 32 में हुआ था. यह इलाक़ा पुलिस मुख्यालय से महज़ 10 किलोमीटर दूर था.
उस समय राजीव गांधी प्रशासन पर अपनी आंखें इस कदर मूंद लेने का आरोप लगता है कि त्रिलोकपुरी में हुए जनसंहार के 36 घंटे बाद पुलिस ने उसका संज्ञान लिया. वो भी तब जब कुछ पत्रकारों ने इस मामले को लेकर आवाज़ उठाई.
<link type="page"><caption> सिख दंगों की आँखों-देखी पर 'हीलियम'</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/11/131121_int_jaspreet_singh_nn.shtml" platform="highweb"/></link>
केवल त्रिलोकपुरी के ब्लॉक 32 में उस दिन 400 लोगों की जान गई थी. 1984 में हुई सिख विरोधी हिंसा में किसी एक स्थान पर मारे गए लोगों की यह सबसे अधिक संख्या थी. यहां मरने वालों की संख्या जलियांवाला बाग में मरने वालों से भी ज़्यादा थी.
भारत में कभी भी इस स्तर की सांप्रदायिक हिंसा नहीं हुई है, यहां तक कि गुजरात में भी नहीं. कई बार जांच करने के बाद भी अभी तक यह नहीं पता चल सका है कि ब्लॉक 32 में हुए क़त्लेआम के बारे में पुलिस को इतनी देर तक क्यों नहीं पता चला.
16वीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनावों में तमाम तरह के आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर चलने के बावजूद नरेंद्र मोदी ने त्रिलोकपुरी का एक बार भी ज़िक्र नहीं किया.
अंतर्विरोध बरक़रार

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अगर मोदी ने ऐसा किया होता तो सोनिया गांधी और उनकी पार्टी के लिए ख़ुद को धर्मनिरपेक्ष पार्टी के रूप में पेश करने में मुश्किल होती. लेकिन संभव है कि मोदी के लिए यह दांव उलटा भी पड़ सकता था.
'एसआईटी' से क्लीन चिट मिलने के बावजूद कई ऐसे अंतर्विरोध और आरोप हैं जिनका जवाब मोदी ने अब तक नहीं दिया है.
जैसे, गोधरा में हुई मौतों के बाद अहमदाबाद के गुलबर्ग सोसाइटी में 28 फ़रवरी 2002 को दोपहर तीन बजे से पौने चार बजे के बीच हुई सामूहिक हत्याओं को रोक पाने में उनकी अक्षमता की सफ़ाई वो अब तक नहीं दे सके हैं.
<link type="page"><caption> गोधराः क्या यही वो जगह है...</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/02/140227_godhara_train_revisit_sr.shtml" platform="highweb"/></link>
मोदी उस दिन पूरे दिन पुलिस वालों के साथ बैठक करते रहे, वे गुलबर्ग सोसाइटी के पास तैनात पुलिस दल से संपर्क में थे इसके बावजूद मोदी सुप्रीम कोर्ट के निगरानी में काम कर रही एसआईटी में असंगत जवाब देकर बच निकले.
उन्होंने एसआईटी से कहा कि गुलबर्ग सोसाइटी में हुई घटना के बारे में उन्हें पहली बार तब पता चला जब रात के साढ़े आठ बजे अपने घर पर एक बैठक की. यानी कांग्रेस के पूर्व सासंद एहसान जाफरी समेत 69 लोगों के मारे जाने के पाँच घंटे बाद मोदी ने यह बैठक की.
क्या यह अकेली घटना मोदी के ख़िलाफ़ षडयंत्र करने के आरोप के लिए पर्याप्त सबूत नहीं है ?
दावों की पोल

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गुलबर्ग की घटना की जानकारी न होने का बहाना बनाने के पीछे उनकी एक मजबूरी और भी थी.
गुलबर्ग सोसाइटी में हुए दंगों के तक़रीबन दो घंटे बाद दूरदर्शन पर दिए गए उनके भाषण में उन्होंने गोधरा में हुई मौतों की निंदा तो की थी लेकिन गुलबर्ग सोसाइटी और नरौदा पटिया में गोधरा से कहीं ज़्यादा संख्या में लोगों के मारे जाने के बावजूद उनका ज़िक्र तक नहीं किया.
क्या यह तथ्य अपने आप में नरेंद्र मोदी के निर्णायक और निष्पक्ष प्रशासक होने के दावे की पोल नहीं खोलता?
यानी अगर मोदी अपने चुनाव प्रचार में त्रिलोकपुरी जैसे उदाहरणों का ज़िक्र करते तो ख़ुद उनकी पोल खुल जाती क्योंकि उन्होंने भी राजीव गांधी की रणनीति पर अमल करते हुए सांप्रदायिक हिंसा की खेती करके चुनावी फ़सल काटी है.
इससे यह भी साफ़ हो जाता कि इन नेताओं को मिली क्लीन चिट 1984 और 2002 में हए दंगों में अल्पसंख्यकों की हत्या में इनकी बेगुनाही से ज्यादा हमारी जांच संस्थाओं की पोपलेपन के बारे में बताती है.
आपस में तमाम तरह के दोषारोपण के बावजूद कांग्रेस और भाजपा को जिन जनसंहारों के लिए ज़िम्मेदार माना जाता है उसे लेकर दोनों के बीच एक मौन सहमति दिखती है.
क्लीन चिट पर सवाल

इस मौन सहमति को राहुल गांधी ने तोड़ने की थोड़ी कोशिश तब कि जब उन्होंने 'विश्वसनीय विशेषज्ञों' के हवाले से मोदी को मिली 'क्लीन चिट' पर सवाल उठाया. लेकिन राहुल ने एसआईटी की लीपापोती को बारे में खुलकर बात करने की कभी हिम्मत नहीं की.
राहुल ने ऐसा शायद इसलिए नहीं किया क्योंकि तब उनके पिता राजीव गांधी को सुप्रीम कोर्ट के कार्यरत न्यायाधीश रंगनाथ मिश्रा से मिली ऐसी ही क्लीन चिट पर भी सवाल उठने लगते.
रंगनाथ मिश्रा बाद में भारत के मुख्य न्यायाधीश बने. फिर वो राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पहले अध्यक्ष भी बने और राज्यसभा सांसद भी.
<link type="page"><caption> 'नीच राजनीति' वाले बयान पर वाकयुद्ध तेज़</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/05/140506_modi_tweet_sr.shtml" platform="highweb"/></link>
देश की दो प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने जिस कपटपूर्ण तरीके से अपनी-अपनी पार्टियों की तरफ़ से किए मानवाधिकार हनन के मामलों को छिपाने के लिए देश की विभिन्न संस्थाओं का मनमाफिक इस्तेमाल किया है उसके बारे में कभी चर्चा नहीं होती.
चुनावी माहौल में होने वाली चर्चाओं के दौरान भी नहीं, तब भी नहीं जब दोनों पार्टियाँ एक-दूसरे के ऊपर 'घटिया दर्जे की राजनीति' करने का आरोप लगा रही होती हैं.
केजरीवाली भी सावधान

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बनारस में चल रहे चुनावी नाटक में भी यह बात साफ़ दिख रही है. आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल भी कांग्रेस और भाजपा के बीच के इस गुप्त समझौते के प्रति सतर्क रहते हैं.
केजरीवाल भी 2002 के दंगो के लेकर मोदी पर तीखा हमला करने से बचते प्रतीत होते हैं क्योंकि इससे हिन्दू वोटरों के मोदी के पक्ष में एकजुट होने की आशंका रहती है.
चुनाव का परिणाम चाहे जो भी हो भारतीय लोकतंत्र में सांप्रदायिकता की राजनीति की भूमिका एक बार फिर पुख्ता हो गई है.
और इसी वजह से गुलबर्ग और त्रिलोकपुरी को लेकर भारत के प्रमुख राजनीतिक पर्टियों के बीच जो चुप्पी है वो अब भी बरक़रार है.
(मनोज मित्ता 'द फिक्शन ऑफ़ फैक्ट फाइंडिंग: मोदी एंड गोधरा' के लेखक और 'व्हेन अ ट्री शुक देल्ही: द 1984 कार्नेज एंड इट्स आफ़्टरमैथ' के सह-लेखक हैं.)
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