चुनाव के बीच असम में हिंसा के पीछे क्या है? (Dont use this file)

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
असम में हिंसा न तो पहली बार हुई है और न शायद आखिरी बार. बांग्ला बोलने वाले मुसलमान और स्थानीय बोडो समाज के बीच तनाव का इतिहास 60 साल से भी अधिक पुराना है.
यही वजह है कि वहां के लोगों को ताज़ा हिंसा पर आश्चर्य नहीं हुआ हालांकि लोगों को इस हिंसा के समय को लेकर ताज्जुब ज़रूर हो रहा है क्योंकि इस समय देश में चुनाव चल रहे हैं.
मीडिया और उत्तर भारतीय लोगों का ध्यान इस सच पर ज़्यादा नहीं है कि इस हिंसा में अब तक मरने वाले सभी 32 लोग बांग्लाभाषी मुसलमान हैं.
असम पुलिस के अनुसार इसमें बोडो चरमपंथियों का हाथ है. स्थानीय पुलिस का ये भी मानना है कि बोडो चरमपंथियों ने मुसलमानों पर इसलिए हमले किए क्योंकि उन्होंने चुनाव में उनके विरोधियों को वोट दिया.
समाज के हाशिये पर
इस हिंसा का जो भी कारण रहा हो अगर ये हमला बंगाली मुसलमान करते और मरने वाली बोडो जनता होती तो मीडिया और उत्तर भारतीय लोगों का क्या रुख क्या होता?
सच तो ये है कि बोडो बहुल इलाक़ों में बसे बंगाली मुसलमानों को अक्सर बांग्लादेशियों से अलग करके नहीं देखा जाता.
बांग्लाभाषी मुसलमान ग़रीब हैं, ज़मीन के मालिक नहीं हैं और केवल मज़दूरी करते हैं. राजनीति में उनका दखल नहीं है. वो अक्सर बहुसंख्यक आबादी से दूर धान के खेतों या पानी से घिरे टापुओं पर रहते हैं. अपने जन्म से ही यहाँ रहने वालों को भी घुसपैठिया कहा जाना आम है.

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इसमें कोई शक नहीं कि बांग्लादेश की सरहदें पड़ोस में हैं और वहां से असम आने वालों की एक समय लंबी क़तार होती थी. इनमें हिंदू और मुसलमान दोनों होते थे लेकिन बांग्लादेश से आए हिंदुओं को घुसपैठिया या ग़ैर-क़ानूनी नागरिक नहीं समझा जाता. सच ये भी है कि असम में पहले से लाखों बंगाली मुसलमान बोडो इलाक़े में रहते थे.
मैंने खुद 1994 में बोडो इलाक़ों में जाकर इस तनाव पर रिपोर्टिंग की है. मैं जब कोकराझार पहली बार पहुँचा तो उस समय बोडो विद्रोहियों ने 24 बंगाली मुसलामनों की हत्या कर दी थी. उस समय मुझे दोनों समाज के बीच फ़र्क़ साफ़ दिखाई दिया, समाज के हाशिये पर रहने वाले मुसलमान या तो आम लोगों से कटकर रहते थे या फिर उन्हें समाज ने अपनाया नहीं था
फ़ासले की लकीर
असम एक बहुजातीय समाज है जहाँ हिंदू 61 प्रतिशत हैं जबकि मुसलमान 34 प्रतिशत. बोडोलैंड के अलावा बाक़ी असम में भी बांग्ला बोलने वाले मुसलमानों और असमिया बोलने वाले हिंदुओं के बीच तनाव दशकों से चला आ रहा है.
नेली में 1983 में हुए जनसंहार को आज़ाद भारत के सबसे बड़ी हिंसक घटनाओं में गिना जाता है, जिसमें तीन हज़ार से अधिक लोग मारे गए थे जिनमें से अधिकतर मुसलमान थे. यही वजह है कि वहां के मुसलमान आतंकित रहे हैं.

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बोडो इलाक़े में रहने वाले मुसलमान आम तौर पर कांग्रेस पार्टी को वोट डालते हैं.
यहां के मुसलमानो को हमेशा इस बात का डर सताता है कि उन पर कभी भी हमला हो सकता है. ज़ाहिर है, इस समय वे मोदी को लेकर भी घबराये हुए होंगे लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि राज्य के 34 प्रतिशत मुसलमान वहां की एक हक़ीक़त हैं और जितनी जल्दी इसे स्वीकार कर लिया जाए उतना ही सब के लिए अच्छा होगा.
भारत सरकार ने इस क्षेत्र में लगातार हिंसा जारी रहने के बाद मामले की तह तक पहुँचने के लिए जाँच कराने का फ़ैसला किया है और दूसरी तरफ़ राष्ट्रीय जाँच एजेंसी की एक टीम भी बोडो इलाक़े में भेजी गई है. अब देखना है कि इस जाँच से कुछ निकलता है या नहीं.
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