बीबीसी के साथ 4,273 किलोमीटर का सफ़र

- Author, अनुराग शर्मा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ट्रेन यात्रा में सब कुछ संभव है. मशहूर यात्रा लेखक पॉल थरयू ने कुछ ऐसा ही कहा था.
ऐसे वक़्त में जब भारत असीमित संभावनाओं से उमड़ रहा है, कुछ लोग आशंकित हैं और कुछ लोग ज़बरदस्त उम्मीद पाले हुए हैं, जब अर्थव्यवस्था, विकास और सांप्रदायिकता जैसे शब्द फ़िज़ा में तैर रहे हैं, चुनाव के वक़्त किसी ट्रेन की यात्रा करना लोगों के दिमाग़ की एक झलक दिखा सकता है.
वो किसी एक पार्टी को कोस रहे होंगे और दूसरी पार्टी से उम्मीदें पाले होंगे. क्या जिस लहर की बात की जा रही है वो भारत के पूर्वी तट के राज्यों से भी टकरा रही है या वाराणसी में अस्सी घाट पर ही दम तोड़ जाएगी.
मेरे साथ चलें विवेक एक्सप्रेस में 4273 किलोमीटर के सफ़र पर, जो हम 85 घंटे में तय करेंगे. कुछ लोगों के मुताबिक ये दुनिया की नौवीं सबसे लंबी ट्रेन यात्रा है.
आठ राज्यों की झलक
हो सकता है कि इतनी लंबी यात्रा थका देने वाली हो, ये भी संभव है कि इस यात्रा में वो अनुभव मिले जिसे दिल्ली और मुंबई के गुलाबी अख़बारों में लिखने वाले जानकार इंडिया से निकलकर भारत में जाना बताते हैं.
विवेक एक्सप्रेस से यात्रा करना इसलिए भी अहम है क्योंकि ये ट्रेन भारत के पूर्वी तट के आठ राज्यों की झलक दिखाती है.
जिन राज्यों को ये छूकर निकलती है उनकी कुल जनसंख्या (करीब 46 करोड़), अमरीका और रूस की कुल जनसंख्या से थोड़ी ही कम बैठती है. भारत की एक तिहाई से ज़्यादा आबादी इन राज्यों में रहती है.
कहते हैं कि ट्रेन की यात्रा भी ज़िंदगी की तरह होती है, लोग आते हैं, जाते हैं, चढ़ते हैं उतरते हैं. विवेक एक्सप्रेस के लिए ये और सटीक है क्योंकि एक बार इस ट्रेन को छोड़ देने के बाद इस पर सात दिन बाद ही चढ़ा जा सकता है.
12 भाषाएं, 57 स्टेशन
जिन 57 स्टेशनों से हो कर ये ट्रेन गुज़रेगी वहां जनता क्या सोचती है ये जानना तब और भी दिलचस्प हो जाता है जब ये पता हो कि इस ट्रेन में चढ़ने और उतरने वाले लोग कम से कम 12 भाषाएं बोलते हैं.
सीमावर्ती चौकियों से लौट रहे सैनिकों, बेहतर इलाज, बेहतर शिक्षा और बेहतर ज़िंदगी की उम्मीदें पाले लोगों से भी इस यात्रा में मुलाकात होने की उम्मीद है. शायद जिनके लिए आर्थिक उदारीकरण के बाद ज़िंदगी आसान हुई है लेकिन अपने नए घर से खदेड़े जाने का डर भी उन्हें सताता होगा. सवाल ये भी होगा कि क्या उन्हें ये नहीं खलता कि इन चीज़ों के लिए उन्हें अपना गांव-शहर छोड़कर जाना पड़ रहा है.
उम्मीद यह भी है कि अब तक जिस पूर्वोत्तर भारत को एक बंधी बंधाई सोच से देखा, उसके बारे में सोच बदलेगी, बेहतर के लिए.
साथ ही इंतज़ार रहेगा आपसे, बीबीसी हिंदी के पाठकों और श्रोताओं से, मिलने का.
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