सागरनामा-15: जगनमोहन को कौन देगा चुनौती?

- Author, मधुकर उपाध्याय
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
आंध्र प्रदेश का विभाजन अभी-अभी हुआ है. अजीब अफ़रा-तफ़री है. एक ओर बँटवारा और दूसरी ओर चुनाव.
हाल के वर्षों में ये संभवतः देश में अपनी क़िस्म का पहला मामला है, जहाँ राज्य बनने की प्रक्रिया पूरी होने से पहले चुनाव हो रहे हैं. वह भी लोकसभा और विधानसभा के लिए एक साथ.
<italic><link type="page"><caption> ('दक्षिण भारत में लहर नहीं')</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/03/140321_modi_wave_south_india_rd.shtml" platform="highweb"/></link></italic>
हैदराबाद में मुख्य सचिव पीके मोहंती बैठक-दर-बैठक कर रहे हैं कि किसी तरह विभाजन की प्रक्रिया 30 अप्रैल तक पूरी कर ली जाए. 19 समितियाँ बना दी गई हैं और दस्तावेज़ों की फ़ोटोकॉपी तैयार की जा रही है.
सिंचाई, राजस्व, जल-संसाधन, शिक्षा और स्वास्थ्य की समितियाँ परेशान हैं क्योंकि उनसे संबंधित दस्तावेज़ इतने हैं कि एक पखवाड़े में सबकी फ़ोटोकॉपी तैयार करना संभव नहीं है.
आंध्र प्रदेश के सीमांध्र इलाक़े में कुल 25 संसदीय सीटें हैं और विधानसभा सदस्यों की संख्या 175 है. बँटवारे में तो एक बार देरी हो सकती है लेकिन चुनाव आयोग ने तारीखें घोषित कर दी हैं और मतदान सात मई को होना है. ये तारीख नहीं टल सकती. विधानसभा गठित करने की प्रक्रिया भी 29 मई तक पूरी होनी है.
नए राज्य के तीन मुद्दे

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इसी भागमभाग में चुनाव अभियान भी चल रहा है. राजनीतिक दलों के लिए समझ पाना मुश्किल है कि आंध्र प्रदेश के बँटवारे के बाद उनका मतदाता राजनीतिक दलों और उनके प्रत्याशियों को किस तरह देखेगा, किधर वोट डालेगा.
<italic><link type="page"><caption> (क्या कायम रहेगी यह रफ्तार?)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/03/140308_zubair_ahmed_hyderabad_challeges_rd.shtml" platform="highweb"/></link></italic>
तटवर्ती सीमांध्र में लोगों से बात करने से स्पष्ट होता है कि उनके लिए इस चुनाव में तीन ही प्रमुख मुद्दे हैं, जिन्हें वे क्रमबद्ध तरीके से रखते हैं- विश्वसनीयता, प्रतिबद्धता और तेलंगाना.
सीमांध्र के लोग तेलंगाना राज्य बनने को लेकर बहुत चिंतित नहीं है, उनकी चिंता अपनी समस्याओं के सिलसिले में ये देखने की है कि समाधान के लिए वे किस पर भरोसा करें.
राजनीति को भावनात्मक ढंग से देखने वाले रायलसीमा इलाक़े में लोग अपनी राय आसानी से क़ायम कर पा रहे हैं तो इसलिए कि वह संयुक्त आंध्र प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी का गृह क्षेत्र है.
रायलसीमा इस क़दर राजशेखर रेड्डी के प्रभाव में है कि कडपा, करनूल, अनंतपुर और चित्तूर ज़िले क़रीब-क़रीब आँख मूँदकर वाईएसआर कांग्रेस को वोट दे देंगे, ख़ासतौर पर कडपा जहाँ राजशेखर रेड्डी के नाम की मुख़ालफ़त करने वाला कोई नहीं है.
तेदेपा और भाजपा
पिछले चुनाव में सीमांध्र के संसदीय क्षेत्रों में कांग्रेस को 42 फ़ीसदी वोट मिले थे. ये प्रतिशत इस बार वाईएसआर कांग्रेस के लिए बढ़ भी सकता है. रायलसीमा में कुल 54 विधानसभा सीटें हैं और राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि इसमें 35 से 40 सीटें जगन मोहन रेड्डी की पार्टी के हाथ आ सकती हैं.
<italic><link type="page"><caption> ('तेलगु हितों' के लिए अलग पार्टी)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/03/140306_kiran_reddy_new_party_ap.shtml" platform="highweb"/></link></italic>
विजयवाड़ा से प्रकाशित 'द हंस इंडिया' के प्रधान संपादक के रामचंद्रमूर्ति का मानना है कि राजशेखर रेड्डी का वोट आधार मुख्यतः मुस्लिम और ईसाई अल्पसंख्यक, रेड्डी और दलित थे जिनके वोट 32 प्रतिशत होते हैं. पारंपरिक तौर पर 30 प्रतिशत से अधिक मत पाने वाला अक़्सर चुनाव जीत जाता है.
ये देखना अभी बाक़ी है कि राजशेखर रेड्डी का पूरा वोट समीकरण जस का तस उनके पुत्र जगनमोहन रेड्डी को मिल पाता है या नहीं. उनका ये भी कहना है कि सीमांध्र में असली टक्कर ईस्ट गोदावरी, गुंटूर और कृष्णा ज़िलों में होगी, जो राजशेखर रेड्डी के लिए भी कमज़ोर इलाक़े थे.
पिछले पंद्रह दिन में ऐसी ख़बरें मीडिया में लगातार आईं कि तेलगु देशम पार्टी की स्थिति सीमांध्र में बेहतर हो रही है और भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन की स्थिति में जगनमोहन रेड्डी के लिए मुक़ाबला कठिन हो जाएगा.
जगन की जनसभाएँ

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इन ख़बरों के विपरीत जगन, विजयम्मा और शर्मिला की जनसभाओं में भारी भीड़ उमड़ती रही. ऐसी भीड़ तेलगु देशम पार्टी के मुखिया चंद्रबाबू नायडू को भी नहीं मिल रही थी.
<italic><link type="page"><caption> (तेलंगाना का विरोध तेज)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/02/140219_andhra_protest_sm.shtml" platform="highweb"/></link></italic>
विश्लेषक मानते हैं कि दरअसल, भाजपा और तेलगुदेशम के गठबंधन का लाभ संसदीय सीटों पर तो हो सकता है लेकिन विधानसभा चुनाव में उसका प्रभाव नहीं होगा. विधानसभा के मुद्दे अलग होते हैं और लोग अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए वही आधार नहीं रखते जिससे लोकसभा के प्रत्याशी चुने जाते हैं.
विधानसभा चुनावों के नतीजे आने में अभी वक़्त है लेकिन क़यास लगाए जा रहे हैं कि वाईएसआर कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिल जाएगा. उसे 80 से 100 सीटें मिल सकती हैं. जबकि तेलगु देशम के नेतृत्व वाले गठबंधन को 70 से 80 के आँकड़े पर संतोष करना पड़ सकता है.
कुछ निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव जीत सकते हैं, एक सीट पूर्व मुख्यमंत्री किरण रेड्डी की पार्टी को मिल सकती है और हो सकता है दो या तीन सीटें कांग्रेस को भी मिल जाएं.
बिजली की समस्या

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लोकसभा की 25 सीटों पर भी वाईएसआर कांग्रेस न केवल कड़े मुक़ाबले में है बल्कि दो तिहाई सीटों पर अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे है. माना जा रहा है कि उसे 15 से 17 लोकसभा सीटें मिल सकती हैं जबकि तेलगु देशम को छह, भाजपा को दो और एक-एक सीट कांग्रेस और निर्दलीय प्रत्याशी की झोली में जा सकती है.
<italic><link type="page"><caption> (सियासी नफा नुकसान का गणित)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131006_telangana_seemandhra_protest_sp.shtml" platform="highweb"/></link></italic>
एक तरह से कहें तो राज्य में राजनीतिक तौर पर सबसे ख़राब स्थिति कांग्रेस पार्टी की ही है, जो वाईएस राजशेखर रेड्डी के पार्टी में रहने के समय उफ़ान पर थी. कम्मा समुदाय एक-एक कर के कांग्रेस छोड़ रहा है और उनमें से कुछ वाईएसआर कांग्रेस के साथ चले गए हैं तो कुछ अन्य तेलगु देशम के साथ.
सीमांध्र में बिजली की समस्या है और किसान धान बोना बंद कर रहे हैं क्योंकि इसमें पानी बहुत लगता है. पानी बड़ा मुद्दा है और सीमांध्र चाहता है कि पोलावरम बाँध का डिज़ाइन बदला जाए, जिसके बिना उसे पानी नहीं मिलेगा.
युवा मतदाता

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तेलगु देशम और भारतीय जनता पार्टी गठबंधन होने से पहले ही दोनों पार्टियों के समर्थकों के बीच झड़पों की ख़बरें स्थानीय अख़बारों में छप रही हैं. भाजपा संतनगर और मुशीराबाद की सीटें चाहती है जबकि तेलगु देशम पार्टी इस पर राज़ी नहीं है.
<italic><link type="page"><caption> (जगन अनशन पर...)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131005_jagan_fast_against_telangana_dil.shtml" platform="highweb"/></link></italic>
पार्टी समर्थकों का एक बयान अख़बारों में छपा है कि अगर ये सीटें भाजपा को दी गईं तो वे गठबंधन के उम्मीदवार को हराने का प्रयास करेंगे. सीमांध्र को शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में बाँटा जाए तो वाईएसआर कांग्रेस अपेक्षाकृत अधिक भावनात्मक गाँवों में ज़्यादा लोकप्रिय है.
इसके अलावा लोगों के बीच ये चर्चा भी आम है कि भाजपा और तेलगु देशम पार्टियाँ हिंदू भावनाओं का फ़ायदा उठाने की कोशिश में एक साथ आ रही हैं. जगनमोहन रेड्डी की असली ताक़त युवा मतदाता हैं और ये बात क़रीब-क़रीब हर जगह महसूस की जा सकती है, उन इलाक़ों में भी जहाँ तेलगु देशम के समर्थक अधिक हैं.
सामूहिक वोट

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युवा वर्ग अपने क़िस्म का सामूहिक वोट है, जिस पर दूसरी पार्टियों की पकड़ दिखाई नहीं देती. एलुरु से राजमुंदरी के बीच एक गाँव भीमाडोलू में अपने पिता की चाय की दुकान पर काम में हाथ बँटाने वाली एक लड़की का कहना था कि वाईएस राजशेखर रेड्डी ने लड़कियों के लिए बहुत काम किया.
<italic><link type="page"><caption> (जगनमोहन को मिली ज़मानत)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/09/130923_jaganmohan_reddy_bail_ar.shtml" platform="highweb"/></link></italic>
वो बताती हैं कि राजशेखर रेड्डी ने मुफ़्त पढ़ाई की व्यवस्था और स्कॉलरशिप की शुरुआत की. लड़कियाँ पहली कक्षा से लेकर पोस्ट ग्रेजुएट तक बिना पैसे दिए पढ़ सकती हैं. लड़की के पिता तेलगु देशम पार्टी के समर्थक हैं.
सीमांध्र की ज़मीन, लोगों की आकाँक्षाएं और राजनीतिक परिदृश्य सब एक साथ परिवर्तन के मुहाने पर खड़े दिखाई देते हैं. युवा वर्ग का झुकाव वाईएसआर कांग्रेस की ओर है. और ये वर्ग बदलाव के लिए ज़्यादा प्रतीक्षा करने वाला नहीं है.
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