बाड़मेर की चुनावी सभाओं में डोडा पोस्त की मांग

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- Author, आभा शर्मा
- पदनाम, बाड़मेर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
जिण घर चौखट जूता घणेरा, वठे बैठ्या देखो अमलदार घणेरा...
फ़ोन के चलन से पूर्व अमल (अफ़ीम) के शौक़ीन कहाँ जमा हुए हैं और कहाँ 'रियाण' हो रही है, इसका पता घर के बाहर उतरी हुईं जूतियों से लगाया जाता था.
थार के मरुस्थल में चाहे ख़ुशी हो या ग़म या कोई त्यौहार, वो 'रियाण' के बिना अधूरा है, फ़ीका है. 'रियाण' का अर्थ है एक प्रकार की बैठक या सभा.
जब मौसम चुनाव का हो तो 'रियाण' में ही यह भी तय हो जाता है कि वोट किस पार्टी या उम्मीदवार को डाले जाएंगे.
बाड़मेर के ग्रामीण अंचल के निवासियों के लिए अमल एक दवा है, सुरूर है, रिवाज़ है और कभी कभी इसके निमंत्रण को ठुकरा देने पर मामला कुछ ग़ुरूर का भी हो जाता है.
चुनाव और डोडा पोस्त
ऐसा नहीं है कि बाड़मेर की जनता या अफीम के तलबगारों को देश से भ्रष्टाचार हटने या अपने क्षेत्र के विकास की चिंता नहीं है. पर हर चुनाव के मौसम में उनकी एक मांग बदस्तूर रहती है और वह है डोडा पोस्त के कोटे की.
नियम के अनुसार एक परमिटधारी को एक बार में दो किलो से अधिक डोडा पोस्त नहीं मिल सकता और अधिकतम सीमा है दस किलो. सरकारी दुकान पर इसकी कीमत 500 रुपये प्रति किलो है और महीने में करीब 17,700 किलो डोडा पोस्त का वितरण होता है.
जिला आबकारी अधिकारी मोहन लाल पूनिया के अनुसार अभी 2,817 लोगों के पास परमिट हैं पर करीब 25,000 ऐसे लोग भी है जिन्होंने अपने परमिट का नवीनीकरण नहीं करवाया है.
यह भी विचित्र संयोग ही है कि कुछ वर्ष पूर्व तत्कालीन भाजपा नेता जसवंत सिंह के परिवार में 'रियाण' आयोजन को लेकर काफी बवाल मचा था. तब राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे थीं और अब भी जब जसवंत सिंह स्वतंत्र रूप से बाड़मेर से चुनाव मैदान में हैं. उनके विपक्ष में खड़े भाजपा के प्रत्याशी कर्नल सोना राम अपनी कुछ सभाओं में मुख्यमंत्री से डोडा पोस्त की समस्या हल करने की गुहार भी कर रहे हैं.
रियाण
रियाण सिर्फ पुरुषों की बैठक ही होती है, वैसे स्त्रियों के लिए अमल के सेवन पर कोई पाबंदी नहीं है.
ऐसा भी कहा जाता है कि पुराने ज़माने में दिहाड़ी करने वाली और मेहनतकश महिलाएं अपनी बच्चों को थोड़ी सी अफ़ीम चटा दिया करती थीं ताकि बच्चा आराम से सोता रहे.

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जो अमल के शौक़ीन हैं उन्हें रोज़ अमल लिए बिना चैन नहीं पड़ता.
अमल बाड़मेर की संस्कृति में यूँ रच बस गया है कि लोक साहित्य में इसका खूब ज़िक्र आता है:
"अमलिया, तू उधमदियो, तेन बिना घड़ी ना आवडे, बिलखण लागे नैण."
उत्पादन नहीं, खपत
राजस्थान में अफ़ीम (जिसे काला सोना भी कहा जाता है) का उत्पादन चित्तौड़गढ़ और भवानी मंडी में होता है पर शायद खपत सबसे अधिक बाड़मेर में.
पश्चिमी राजस्थान के इस अंचल में अमल आमजन की ज़िन्दगी का हिस्सा क्यों बनी, इस पर माधव सिंह राजपुरोहित का कहना था,"पहले कभी युद्ध के रक्तपात के मंज़र और दर्द को भूलने के लिए इसकी शुरुआत हुई होगी."
अब उन्हें कोई 'जंग' नहीं लड़नी पर जोधपुर जिले के निवासी नाथराज के अनुसार, "यह शूरवीर का काम है, नहीं लें तो काम नहीं चलता. और हमारा काम ही 'जंग' है. इसे लेकर हम हर चिंता भूल जाते हैं, मगन हो जाते हैं."
रेगिस्तान में छितरी हुई आबादी है और दूर-दूर बसी गाँव और ढाणियां हैं और आठ महीने खेती-बाड़ी का कोई काम नहीं रहता. ऐसे में लोग मन बहलाव के लिए अमल का सेवन करते हैं.
जैसा कि चौहटन रोड स्थित एक गाँव में भक्ताराम स्वीकार करते हैं कि वह "चार महीने काम और आठ महीने रियाण करते हैं."
वैसे अमल की मनुहार पर बने हुए पारंपरिक गीतों में रियाण सिर्फ "शादी, सगपण और त्यौहार" पर ही करने सलाह दी गई है पर एक बार आदत पड़ जाने पर फिर छूटती कहां है?
रस्म

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'रियाण' का पूरा क़ायदा है और इसका सेवन करने से पहले सभी देवों का स्मरण किया जाता है. खास तौर पर 'भोले बम लहरी का'. राजपुरोहित का कहना है कि पहले एक दूसरे को अपने हथेली में अमल लेकर पिलाते हैं. बाद में खुद प्याला उठाते हैं.
'रियाण' के दौरान लोग पुरानी कड़वाहट भुला देते हैं और अफीम के नशे की तासीर में पुराने गिले-शिकवे भी फुर्र हो जाते हैं. अमलदारों को यह विश्वास है कि अफ़ीम उन्हें ताकत देती है. जब डोडा पोस्त की किल्लत हो जाती है तो इस क्षेत्र के लोग बैचैन हो जाते हैं. शायद यही वजह ही कि हर चुनाव में मुद्दा चाहे कुछ भी हो, बाड़मेर में अफ़ीम की प्यास बढ़ती ही जाती है.
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