बस्तर के बेनाम और बेदखल

- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, खम्मम से लौटकर
वे बेदख़ल हैं अपनी ज़मीन से, जंगल से, काग़ज़ों से, राशन कार्ड की फ़ेहरिस्त से. वे वोट नहीं दे पाएंगे. उनकी गिनती नहीं है. किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ता उनके होने और हालात को लेकर.
नाम पूछो तो कहेंगे कि 'हमें जान प्यारी है.. सिर्फ़ वही है जो बची है.' वे बस्तर इलाक़े के आदिवासी हैं, जो छत्तीसगढ़ से जान बचाकर भागे हैं. जहां माओवादिओं और सुरक्षा बलों और कुछ वक़्त पहले तक सलवा जुडूम की बंदूक़ें आपस में बातें कर रही थीं.
मेरी मजबूरी है कि मैं इनमें से किसी का भी नाम नहीं ले सकता क्योंकि ये उन इलाक़ों से हैं, जहाँ आदिवासी लोग माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच चल रहे संघर्ष में आम लोग पिस रहे हैं.
इनका नाम लेने से बस्तर में रह रहे इनके दूर के रिश्तेदारों की जान को भी ख़तरा हो सकता है.
सुकमा ज़िले के ताड़मेटला इलाक़े से आए एक नौजवान ने बताया कि वह अपने पूरे परिवार के साथ भागकर आ गया है.
उसने बताया, "जीना मुश्किल हो गया था. पुलिस वाले और सलवा जुडूम के लोग आते थे, वो मारते थे. उनके जाने के बाद माओवादी आते थे, फिर वो मारते थे. डर और दहशत की ज़िन्दगी को हमने पीछे छोड़ दिया है."
दहशत की ज़िंदगी
घने सागौन के जंगलों में सैकड़ों किलोमीटर पार करते हुए वो इन इलाक़ों में आ तो गए हैं, पर ज़िंदगी अभी भी सवालों से जूझ रही है.
एक दूसरा नौजवान कहता है. "चूँकि हम बाहर से आकर बसे हैं, इसलिए हमें राशन कार्ड नहीं दिए जाते. कई साल से हम कोशिश कर रहे हैं कि हमारे नाम मतदाता सूची में शामिल हों. वो भी नहीं होता. अधिकारी कहते हैं कि यह हमारी जगह नहीं है. इसलिए हमें कुछ नहीं मिल सकता."
छत्तीसगढ़ के सुकमा, बीजापुर और दंतेवाड़ा के सुदूर जंगल के इलाक़ों से जहाँ गाँव के गाँव वीरान होने लगे हैं, वहीं आन्ध्र प्रदेश के कई इलाक़ों जैसे पश्चिमी गोदावरी, वारंगल और खम्मम में इन आदिवासियों की छोटी-छोटी बस्तियां बसने लगी हैं.
सरकार की तरफ़ से किए गए सर्वेक्षण के अनुसार छत्तीसगढ़ में चल रहे संघर्ष की वजह से पलायन कर आ बसने वाले आदिवासियों की कम से कम 250 बस्तियां सिर्फ़ खम्मम ज़िले में ही हैं. हर बस्ती में रहने वालों की संख्या 150 से ज़्यादा है.
इस बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कितनी बड़ी आबादी बस्तर के जंगलों से आकर इन इलाक़ों में बस चुकी है.
जुगाड़ की ज़िंदगी
यह सिलसिला एक दशक से भी ज़्यादा समय से चल रहा है. सलवा जुडूम के शुरू होने के बाद पलायन शुरू हुआ था. अब हालात और भी ख़राब हो चुके हैं क्योंकि बस्तर के एक बड़े हिस्से में जो चल रहा है, कई लोग उसे सिविल वॉर भी कहते हैं.
मैं एक पगडंडी पर खड़ा हूं. यह खम्मम ज़िले के भद्राचलम-पाल्वांचा रोड से श्रीरामापुरम कोट्टा कॉलोनी की तरफ जाती है. एक छोटा सा गांव, जो संरक्षित वन के अंदर आता है.

छत्तीसगढ़ से भागकर आए आदिवासियों ने जंगल साफ़ कर यहां अपनी झोपड़ियां बना लीं. गांव में 50 के आसपास घर हैं और इनमें 250 के क़रीब लोग रहते हैं. छत्तीसगढ़ से उजड़ने के बाद तिनका-तिनका जोड़कर एक और बार रहने का जुगाड़ किया है.
आंध्र प्रदेश की सरकार मानती है कि ये लोग उनका सिरदर्द नहीं हैं. इनका ख़्याल छत्तीसगढ़ सरकार को रखना चाहिए था. 250 की आबादी वाले श्रीरामापुरम कोट्टा गांव में एक भी नल नहीं है.
यहाँ के लोग नहाने-धोने के लिए कुछ दूर स्थित गोदावरी नदी से पानी लाते हैं जबकि शहर इस गांव से लगभग 20 किलोमीटर की दूरी पर है और इतनी दूर से पीने का पानी लाना भी काफ़ी मुश्किलों भरा काम है.
इस बस्ती में कई ऐसे हैं, जिन्होंने आज तक अपनी ज़िंदगी में अपना वोट ख़ुद कभी नहीं डाला. बस्तर में जब ये रहा करते थे, तो इनका नाम मतदाता सूची में ज़रूर था.
अस्तित्व की लड़ाई
कोंटा के पास इंजरम इलाक़े के एक युवक ने बताया, "लिस्ट में नाम था पर नक्सलियों ने बहिष्कार का एलान कर रखा था. यहां बहिष्कार की बात नहीं है, पर लिस्ट में नाम नहीं है. मैंने कभी वोट नहीं डाला. पता नहीं कभी डाल भी पाऊंगा या नहीं."
चुनावी प्रक्रिया में इनकी भागीदारी कभी नहीं रही है. इन्हें अब कोई मतलब नहीं है कि कौन सी पार्टी या कौन सा नेता कहां से चुनाव लड़ रहा है.
लड़ाई अस्तित्व की है. पेट पालना है और ज़िंदा भी रहना है.
बस्तर से विस्थापित लोगों के बीच काम कर रहे 'सितारा' नामक सामजिक संगठन के डॉक्टर हनीफ़ कहते हैं कि पिछले एक दशक से ही वे लोग स्थानीय प्रशासन पर दबाव डाल रहे हैं ताकि इन आदिवासियों को मूलभूत सुविधाएं मिल सकें.
डॉक्टर हनीफ़ का कहना है कि ज़्यादातर बस्तियों में पीने का पानी मुहैया कराने और बुनियादी चिकित्सा के लिए वे लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं.
उनका कहना है, "सरकारी अफ़सर कहते हैं कि रिज़र्व फ़ॉरेस्ट के इलाक़ों में किसी भी तरह की कोई विकास परियोजना नहीं चलाई जा सकती. इसीलिए कई बस्तियों में हैंडपंप लगाने की भी इजाज़त नहीं है."
सुविधाओं का अभाव
सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि आंध्र प्रदेश सरकार जान-बूझकर इन विस्थापित आदिवासियों को सुविधाएं नहीं देना चाहती.
सरकारी अफ़सरों को लगता है कि अगर वो सहूलियतें देंगे तो और भी ज़्यादा लोग छत्तीसगढ़ से भागकर आंध्र प्रदेश चले आएंगे. फिर इस पलायन को रोक पाना मुश्किल हो जाएगा.

एक अरसे से छत्तीसगढ़ के इन शरणार्थियों के बीच काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता डॉक्टर हनीफ़ कहते हैं, "अब हमने अपनी संस्था से इन्हें स्वास्थ्य कार्ड दिए हैं. अब यही इनके लिए एक तरह के पहचानपत्र बन गए हैं."
राज्य सरकार चाहती है कि ये आदिवासी वापस छत्तीसगढ़ चले जाएं. मगर आदिवासियों का कहना है कि अब वो अपने घरों को छोड़कर बहुत दूर चले आए हैं. इतनी दूर कि अब इनका वापस लौटना नामुमकिन है.
इस गांव के बुज़ुर्ग कहते हैं, "अब हमारा लौटना मुश्किल है. वो गलियां, वो खेत हम छोड़ आए हैं. अब वापस लौटने का मतलब है, हम मारे जाएंगे. अब तो हमारे खेतों और ज़मीनों पर भी क़ब्ज़ा हो चुका है. अब हमारी दुनिया यहीं है."
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