'नोटा' पर भरोसा

बस्तर के गांवों का भरोसा लोकतंत्र से नहीं टूटा है. लेकिन हज़ारों लोगों ने इस चुनाव में नोटा पर निशान लगाने का फ़ैसला किया है. आख़िर क्यों, देखिए तस्वीरों में.

क़तार का आख़िरी, नोटा, बस्तर
इमेज कैप्शन, छत्तीसगढ़ के बस्तर ज़िले की चित्रकोट सीट ऐसी है, जहां नवंबर 2013 में हुए विधानसभा चुनाव में सबसे ज़्यादा वोट 'इनमें से कोई नहीं' यानी 'नोटा' में पड़े.
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इमेज कैप्शन, उम्मीदवारों से नाराज़गी नोटा के रूप में तब्दील हो गई. गांव वालों का कहना है कि उनके हिस्से में न तो सड़क है, न बिजली और न ही कोई दूसरी सहूलियत.
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इमेज कैप्शन, कुम्बली में 10 अप्रैल को मतदान होना है. हालांकि गांव वालों का कहना है कि 26 मार्च से यहां नेताओं का आना जाना लगा है पर उन्हें यक़ीन है कि 10 अप्रैल के बाद उनसे मिलने कोई नहीं आएगा.
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इमेज कैप्शन, कुम्बली के लोग इस बात को निराधार बताते हैं कि माओवादियों के कहने पर उन्होंने नोटा का इस्तेमाल किया. उनका कहना है कि असल में वे लोकतंत्र की इस शक्ल से दुखी हैं.
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इमेज कैप्शन, कमल गजभिए कहते हैं, यहां "मैं-मैं और तू-तू ही है. लोकतंत्र में आज सिर्फ़ पैसा ही मायने रखता है. जिसके पास बाहुबल है और पैसा है, वही यहां का नेता है."
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इमेज कैप्शन, गांव वाले इस बात से ताज्जुब में हैं कि आख़िर नोटा का इस्तेमाल करने के बावजूद न तो हुक्मरानों ने उनकी सुध ली और न उन्हें तवज्जो मिली.
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इमेज कैप्शन, लोगों का कहना है कि इस बार भी वो अपने ग़ुस्से का इज़हार उसी हथियार का इस्तेमाल करते हुए करेंगे जो उन्हें लोकतंत्र ने मुहैया कराया है.
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इमेज कैप्शन, सड़क और बुनियादी चीज़ों के लिए लंबा संघर्ष करते हुए लोगों को एक बात समझ आ गई है कि उनकी मुसीबतों की सुनवाई मौजूदा तंत्र के तहत मुमकिन नहीं.
क़तार का आख़िरी, नोटा, बस्तर
इमेज कैप्शन, जो हाल सड़क का, वही हाल बिजली का और दूसरी योजनाओं का. ग्रामीणों का कहना है कि अधिकारियों और नेताओं के चक्कर काटते-काटते वे अब थक चुके हैं.
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इमेज कैप्शन, जगदलपुर से चित्रकोट को जोड़ने वाली मुख्य सड़क पर बड़ांजी चौक से कुम्बली गांव दस किलोमीटर की दूरी पर है. और, इस दस किलोमीटर का रास्ता अगर ज़मीनी हक़ीक़त है, तो काफ़ी ऊबड़-खाबड़ और तकलीफ़देह.
क़तार का आख़िरी, नोटा, बस्तर
इमेज कैप्शन, मामूली खेती और पशु ही इस इलाक़े के लोगों की ज़िंदगी बसर करने का साधन हैं. गांव को देखने से लगता है मानो आप 19वीं सदी के किसी इलाक़े में पहुंच गए हों.
क़तार का आख़िरी, नोटा, बस्तर
इमेज कैप्शन, इलाक़े के गंजे होते पहाड़ और बदहाल सड़क के बीच की कड़ी वे डम्पर हैं, जो बेसाख्ता इन जंगलों में आते-जाते हैं. इसकी वजह है पत्थरों का खनन.
क़तार का आख़िरी, नोटा, बस्तर
इमेज कैप्शन, कुम्बली गांव के बाशिंदे कमल गजभिए और दूसरे ग्रामीणों का कहना है, "सबकुछ अवैध है और सरकारी कारिंदों की मिलीभगत से ही चल रहा है.’’
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इमेज कैप्शन, कुम्बली बस्तर संभाग के मुख्यालय से है तो बमुश्किल 30 किलोमीटर, पर न तरक़्क़ी की सड़क वहां तक पंहुची, न सहूलियतों की सौगात. हालांकि वादे करने में नेताओं ने कोताही नहीं की. (सभी तस्वीरें: बीबीसी संवाददाता सलमान रावी)