क्या एनजीओ तय करेंगे बस्तर के चुनावी नतीजे?

- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
क्या अब ग़ैर सरकारी संगठन (एनजीओ) आम चुनाव की दिशा और दशा तय करने की स्थिति में आ गए हैं?
कम से कम छत्तीसगढ़ के बस्तर में चुनाव लड़ रही सोनी सोरी और उनकी आम आदमी पार्टी का तो यही दावा है. सोनी सोरी के पक्ष में जो बात सबसे दमखम के साथ कही जा रही है, वह यह है कि सोनी के पक्ष में दुनिया भर के डेढ़ सौ एनजीओ चुनाव प्रचार का काम कर रहे हैं.
नक्सल प्रभावित बस्तर के एक प्राइमरी स्कूल में अध्यापिका सोनी सोरी को पांच अक्तूबर 2011 को क्राइम ब्रांच और छत्तीसगढ़ पुलिस के संयुक्त अभियान में दिल्ली से गिरफ़्तार किया गया था.
<italic><link type="page"><caption> ('माओवादियों का साथी')</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/03/140325_soni_sori_naxal_allegations_pk.shtml" platform="highweb"/></link></italic>
सोनी सोरी के ख़िलाफ़ राज्य सरकार ने नक्सल गतिविधियों में शामिल होने के आरोप लगाए थे और उनके ख़िलाफ़ कई मुक़दमे दर्ज किए गए थे. अभी वे जमानत पर हैं. दूसरी ओर माओवादी अपने बयानों में सोनी सोरी को सरकार समर्थक बताते हैं.
जेल में रहने के दौरान देश के कई एनजीओ उन्हें बेकसूर बताते हुए उनकी क़ानूनी और आर्थिक मदद करते रहे हैं. उनके सामने चुनाव मैदान में माओवादियों के ख़िलाफ़ सलवा जुड़ूम चलाने वाले महेंद्र कर्मा के बेटे दीपक कर्मा कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार हैं.
चुनावी राजनीति

महेंद्र कर्मा की पिछले साल मई में माओवादियों ने हत्या कर दी थी. भारतीय जनता पार्टी ने सांसद दिनेश कश्यप को फिर से अपना उम्मीदवार बनाया है. दिनेश कश्यप के भाई की 2009 में माओवादियों ने हत्या कर दी थी.
<italic><link type="page"><caption> (आप की छठी सूची में सोनी सोरी)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/03/140315_aap_loksabha_sixth_list_vt.shtml" platform="highweb"/></link></italic>
राजनीतिक रूप से बेहद सक्रिय इन दोनों पार्टियों के उम्मीदवारों की तुलना में सोनी सोरी पहली बार राजनीतिक मैदान में हैं. सोनी सोरी का कहना है कि सरकार और समाज के बीच की कड़ी के रुप में काम करने वाले एनजीओ ही उनकी मदद के लिए सबसे आगे आए हैं. चुनावी राजनीति में अब तक सक्रिय रहे लोग उनके साथ नहीं हैं.
छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी के चुनाव संयोजक डॉक्टर संकेत ठाकुर मानते हैं कि एनजीओ शुरू से समाज की नीति निर्धारित करने में एक बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं. ऐसे में अगर वो सीधे-सीधे राजनीति और ख़ास तौर पर चुनावी राजनीति का हिस्सा बन रहे हैं तो इसे एक शुभ संकेत के तौर पर देखा जाना चाहिए.
355 लोगों पर एक

लेकिन राज्य में जनांदोलन चलाने वाले संगठन और राजनीतिक दल इससे सहमत नहीं हैं. उनका आरोप है कि एनजीओ वाले जिसे राजनीति कह रहे हैं और जिस तरीके से राजनीति कर रहे हैं, वह असल में जनता के अराजनीतिकरण की प्रक्रिया है.
<italic><link type="page"><caption> ('बिजली के झटके दिए गए थे')</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/11/131114_soni_sori_interview_torture_an.shtml" platform="highweb"/></link></italic>
रजिस्ट्रार फ़र्म और सोसायटी की मानें तो 2.56 करोड़ की आबादी वाले छत्तीसगढ़ राज्य में सोसायटी की श्रेणी में लगभग 72 हज़ार संस्थाएं पंजीकृत हैं यानी प्रत्येक 355 लोगों की संख्या पर एक पंजीकृत संस्था है.
आंकड़ों के रेशों को थोड़ा और सुलझाएं तो हरेक पंजीकृत संस्था में न्यूनतम सात लोगों का होना ज़रूरी है. छत्तीसगढ़ में पंजीकृत संस्थाओं में औसतन 15 सदस्य हैं. मतलब ये कि हरेक 355 लोगों में से 15 लोग किसी न किसी पंजीकृत संस्था से जुड़े हुए हैं.
साल 2000 में जब छत्तीसगढ़ राज्य बना था, तब राज्य में कुल 16,300 पंजीकृत संस्थाएं थीं. राज्य में फ़र्म व सोसायटी के अतिरिक्त रजिस्ट्रार डीडी महंत कहते हैं, "राज्य में हर साल औसतन 5,000 संस्थाएं पंजीकृत हो रही हैं और इन संस्थाओं की सक्रियता हर क्षेत्र में है."
अरविंद की कोशिश

इमेज स्रोत, PTI
हर क्षेत्र का मतलब शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, बिजली, घर से लेकर नाटक-नौटंकी तक. सेवा नामक ग़ैर सरकारी संगठन के सचिव प्रदीप शर्मा का कहना है कि राज्य में बहुत सारे गांव और समुदाय ऐसे हैं, जो अब तक कटे हुए रहे हैं. उन इलाकों में एनजीओ की सक्रिय उपस्थिति है.
<italic><link type="page"><caption> (सोनी सोरी को अंतरिम ज़मानत)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/11/131112_soni_bail_dp.shtml" platform="highweb"/></link></italic>
ऐसे में वे चुनाव को प्रभावित करने की क्षमता तो रखते ही हैं. लेकिन छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के आलोक शुक्ला का कहना है कि छत्तीसगढ़ में काग़ज़ों पर काम करने वाले एनजीओ की संख्या अधिक है.
आलोक समझाते हैं, "ऐसे एनजीओ सरकारी पैसे पर फल-फूल रहे हैं. लेकिन जब आप उनकी ज़मीनी हक़ीकत देखें तो वहां कुछ भी नज़र नहीं आता. आप कह सकते हैं कि बड़ी संख्या में एनजीओ कमाने-खाने का केंद्र बन कर रह गए हैं. इसलिए राज्य में अधिकांश एनजीओ की भूमिका पर संशय होता है."
बिलासपुर स्थित गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय के राजनीति शास्त्र विभाग की अध्यक्ष डॉक्टर अनुपमा सक्सेना कहती हैं, "यह भारतीय राजनीति में एक नई क़िस्म की शुरुआत है. एनजीओ से राजनीति में आए अरविंद केजरीवाल ने व्यापक तौर पर राजनीति का एक नया मैकेनिज़्म डेवलप करने की कोशिश की है"
पूंजी और सत्ता

वे कहती हैं, "इसका असर भी भारतीय राजनीति पर नज़र आ रहा है. लेकिन इसका भविष्य क्या होगा, इस पर कोई राय बनाने से पहले हमें आने वाले चुनावों के परिणामों की प्रतीक्षा करनी चाहिए."
<italic><link type="page"><caption> (सोनी सोरी के समर्थन में भूख हड़ताल)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/02/120229_soni_sori_hungerstrike_ar.shtml" platform="highweb"/></link></italic>
लेकिन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता नंद कश्यप अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि 80 के दशक में किस तरह एनजीओ उभरे और उन्होंने किस तरह जन-आंदोलनों को ख़त्म किया.
कश्यप कहते हैं, "80 के दशक में हजारों लोग अपने घर की बनी रोटियां ले कर जुलूस के लिए आ जाते थे. लेकिन प्रतिबद्ध विचारधारा के साथ जनांदोलन करने वालों को एनजीओ ने ख़त्म कर दिया. अधिकांश आंदोलन ख़त्म हो गए. पूंजी और सत्ता के साथ मिल कर काम कर रहे एनजीओ जब व्यवस्था के असली चेहरे को उजागर होने से रोक पाने में असफल होने लगे तो अब वो राजनीति में आ रहे हैं."
जनता के बीच

नंद कश्यप एनजीओ के क्रियाकलापों को अराजनीतिकरण की संज्ञा देते हैं. हालांकि पिछले कई सालों से एनजीओ, जनांदोलन और राजनीति में सक्रिय मैग्सेसे से सम्मानित संदीप पांडेय इसे खारिज करते हैं.
<italic><link type="page"><caption> (क्या नक्सली हिंसा को राजनीतिक माना जाए?)</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2012/09/120924_naxal_politics_vk.shtml" platform="highweb"/></link></italic>
वे अरविंद केजरीवाल के साथ अपनी असहमतियों के बाद भी उनकी पहल की प्रशंसा करते हुए कहते हैं, "यह बड़ी अजीब बात है कि जब आप जोड़-तोड़ और भ्रष्टाचार के साथ राजनीति करते हैं तो उसे राजनीति कहते हैं और जब राजनीतिक समझ के साथ ईमानदारी से राजनीति की जाती है तो उसे अराजनीतिकरण की संज्ञा दे दी जाती है."
16 मई तक प्रतीक्षा

विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) के हिंदी संपादक और वरिष्ठ पत्रकार अभय कुमार दुबे की राय है कि किसी एनजीओ में काम करने के दौरान जनता के बीच जो विशेष प्रशिक्षण उन्हें मिलता है, जिनमें जनोन्मुखता के पहलू भी होते हैं, उस प्रशिक्षण का लाभ उठाया जा रहा है, उस तर्ज़ पर राजनीति को संगठित करने की योजना है.
लेकिन अभय कुमार दुबे इसे मुख्य धारा की राजनीति नहीं मानते. वे कहते हैं, "ये एनजीओ, राजनीति का मुख्य स्वर नहीं हैं, न हो सकते हैं. ये एनजीओ, राजनीति का एक अपवाद हैं. अपवाद स्वरूप ये प्रयोग हैं और ये प्रयोग कहां तक पहुंचेगा, ये देखना पड़ेगा."
एनजीओ, जनांदोलन और चुनावी राजनीति की यह बहस लंबी हो सकती है लेकिन जिस जनता को इस पर फ़ैसला सुनाना है, उसकी राय जानने के लिए 16 मई तक प्रतीक्षा करनी होगी, जिस दिन लोकसभा चुनाव के परिणाम आने वाले हैं.
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