'नरेंद्र मोदी हैं नेपाली हिंदुत्ववादी राजनीति की उम्मीद'

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- Author, फणींद्र दहल
- पदनाम, संवाददाता, बीबीसी नेपाली सर्विस
नेपाल में बहुत लोग भारत में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के बारे में ज्यादा नहीं जानते लेकिन लोग-बाग उनकी पार्टी भारतीय जनता पार्टी के बारे में बख़ूबी जानते हैं.
विश्लेषकों का मानना है कि भारत में मोदी के सत्ता में आते ही नेपाल भी उनके हिंदुत्ववादी नजरिए से प्रभावित होगा.
नेपाल पहले एक हिंदू राष्ट्र ही था. 2006 में करीब एक दशक तक चले गृह युद्ध के बाद इसे एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया गया था.
भारत में मोदी की पहचान हिंदुत्व की बात आक्रामक ढंग से करने वाले नेता की है. लगभग पौने तीन करोड़ की आबादी वाले नेपाल की 80 फीसदी आबादी हिंदुओं की है.
भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह कई बार सार्वजनिक तौर पर यह कह चुके हैं कि नेपाल को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित करना ग़लत फ़ैसला था.
80 फ़ीसदी हिंदू
नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार युबराज घिमिरे ने बताया, "राजनाथ सिंह कह चुके हैं कि नेपाल के प्रति भारत की विदेश नीति नाकाम रही है. मेरे ख़्याल से मोदी और सिंह के समीकरण का असर नेपाल संबंधी नीतियों पर पड़ेगा और वे इसकी गंभीर समीक्षा कर सकते हैं."

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हालांकि भारत की विदेश नीति की मूल बातों पर सरकारों के बदल जाने का ख़ास असर नहीं पड़ता.
कांग्रेस नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने 2005 में नेपाल की तत्कालीन सीपीएन-माओवादी और नेपाल की मुख्यधारा की राजनीतिक अन्य पार्टियों के साथ 12 मुद्दों पर सहमति जताई थी जिसके बाद नेपाल में राजनीतिक बदलाव हुआ है. इसके बाद राजतंत्र खत्म हुआ और नेपाल ने खुद को एक लोकतांत्रिक गणराज्य के तौर पर घोषित किया.
हालांकि राजनीतिक गलियारे में कई लोग मानते हैं कि मोदी के सत्ता में आने के बाद भी नेपाल के प्रति भारत की नीतियों में कोई बहुत महत्वपूर्ण बदलाव नहीं आएगा.
बदलेगी नीति?
नेपाल की माओवादी पार्टी के विदेश मामलों के विभाग के पूर्व प्रमुख राम कारकी ने बताया, "भारत की नौकरशाही नेपाल संबंधी नीतियों को तैयार करती है. ऐसे में अगर मोदी प्रधानमंत्री बन भी जाते हैं तो उनकी भी एक सीमा होगी और कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं होगा."
नेपाल की राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के नेता कमल थापा देश में संवैधानिक राजतंत्र की स्थापना और नेपाल को हिंदू राष्ट्र के तौर पर देखना चाहते हैं. पिछले अक्टूबर में अपनी भारत यात्रा के दौरान वे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मिले थे.
स्वदेश लौटने के बाद मोदी पर दिए अपने बयान के चलते वे नेपाली मीडिया की सुर्खियों में छा गए थे. उनके मुताबिक भारत के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नेपाल को हिंदू राष्ट्र के तौर पर देखना चाहते हैं.

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उन्होंने कहा, "नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह दोनों अतीत में कह चुके हैं कि वे नेपाल को हिंदू राष्ट्र के तौर पर देखना चाहते हैं. लेकिन नेपाल के हिंदू राष्ट्र होने का फ़ैसला नेपाली जनता ही करेगी."
नेपाली राजतंत्र परंपरागत तौर पर हिंदुत्व से जुड़ा हुआ है क्योंकि मान्यताओं के मुताबिक नेपाल के राजा भगवान विष्णु के ही रूप होते हैं. मीडिया की रिपोर्टों के मुताबिक नेपाल में राजतंत्र के खत्म होने के बाद मोदी और राजनाथ सिंह अलग-अलग तौर पर पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र शाह देव से मिले थे.
मोदी से उम्मीद
ज्ञानेंद्र अब एक आम आदमी की तरह राजधानी की नागार्जुन पहाड़ियों पर बने बंगले में रहते हैं. वे नेपाल में राजशाही को कोई औपचारिक मान्यता दिलाने की कोशिश में जुटे हैं.
वरिष्ठ पत्रकार घिमिरे कहते हैं कि भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के विशेष दूत कर्ण सिंह ने 2006 में अप्रैल के मध्य में काठमांडू का दौरा किया था. उन्होंने वहां पढ़े संदेश में कहा था कि भारत सरकार चाहती है कि नेपाल में औपचारिक रूप में राजशाही चलती रहे.
घिमिरे ने कहा, "भारत सरकार की 2006 के सत्ता परिवर्तन में अहम भूमिका रही थी. ऐसे में भारतीय जनता पार्टी के अंदर भी इस बात की चर्चा होगी कि भारत के दिए भरोसे में किसी तरह का बदलाव नेपाल में भारत की छवि को ख़राब कर देगा."
वहीं माओवादी नेताओं का मानना है कि भारत में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद भी नेपाल में राजशाही के लौटने या हिंदू राष्ट्र बनने की कोई संभावना नहीं है.
कारकी कहते हैं, "बीजेपी के कई नेता नेपाल की धार्मिक विविधता के बारे में नहीं जानते होंगे. नेपाल में लंबे समय तक राजशाही रही है तो उनके पास नेपाल के हिंदू साम्राज्य की छवि होगी."
मोदी का असर
हालांकि यहाँ नेपाल में शाही शासन के समर्थकों और हिंदुत्ववादियों के बीच इस बात को लेकर ख़ासा उत्साह नज़र आ रहा है कि मोदी भारत के अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं.

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काठमांडू में कई लोगों को उम्मीद है कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद नेपाल के साथ संबंधों की रूपरेखा राजनीतिक स्तर पर तय होगी ना कि नौकरशाही के स्तर पर. इन लोगों का मानना है कि नेपाल के प्रति भारत में राजनीतिक तौर पर कम दिलचस्पी के चलते ही नेपाल में अस्थिरता को बढ़ावा मिलता है.
नेपाल के पूर्व गृह एवं विदेश मामलों के मंत्री थापा कहते हैं, "नेपाल के प्रति भारत के राजनीतिक नेतृत्व की ज्यादा दिलचस्पी नज़र नहीं आती. अधिकारी लोग नेपाल संबंधी नीतियाँ तैयार करते हैं. नेतृत्व में परिवर्तन के बाद दोनों देशों में राजनीतिक नेतृत्व में ज्यादा बातचीत हो सकती है."
नेपाल के सभी प्रधानमंत्री अपने कार्यकाल के दौरान नई दिल्ली का दौरा कर चुके हैं, लेकिन एक दशक से भी ज्यादा समय से किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने काठमांडू का दौरा नहीं किया है.
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