कितना झूठ तैर रहा है इंटरनेट पर?

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- Author, तुषार बनर्जी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
भारत में क़रीब 24 करोड़ इंटरनेट यूज़र्स हैं जो अपनी रोज़मर्रा की जानकारी के लिए इंटरनेट पर गूगल सर्च का प्रयोग करते हैं. सोशल मीडिया वेबसाइटों और ब्लॉग्स से भी ‘ज्ञान’ अर्जित किया जाता है.
लेकिन क्या इन पर मिलने वाली जानकारियां शत-प्रतिशत सही होती हैं?
इंटरनेट पर विभिन्न विषयों पर आम जानकारी देने वाली शायद सबसे बड़ी वेबसाइट, ‘विकीपीडिया’ भी अपने डिस्क्लेमर में कहता है कि वो अपनी साइट पर दर्ज़ जानकारियों की पूरी प्रामाणिकता का दावा नहीं कर सकता.
इसके अलावा जनसंपर्क एजेंसियों के प्रभाव में निजी या राजनीतिक फ़ायदे के लिए तैयार की जा रही सामग्रियां सोशल मीडिया वेबसाइटों, ब्लॉग्स और अन्य वेबसाइटों में भी जारी की जाती हैं, जो सच, झूठ या आधा सच साबित हो सकती हैं.
कई यूज़र्स इंटरनेट पर मिली जानकारियों को बिना परखे उन्हें सच भी मान लेते हैं.
अफ़वाहों से खतरा
लेकिन यही समस्या तब बेहद खतरनाक हो जाती है जब सांप्रदायिक तनाव फैलाने के लिए इंटरनेट और मोबाइल तकनीक का प्रयोग किया जाने लगे.

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उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर में बीते साल हुए दंगों में मोबाइल इंटरनेट तकनीक का भी जमकर प्रयोग किया गया था.
राज्य की पुलिस के तत्कालीन मुखिया देवराज नागर ने दंगों के दौरान पत्रकारों से कहा था कि गांवों में अफ़वाहें फैलाने के लिए मोबाइलों पर मैसेजिंग ऐप ‘वॉट्स ऐप’ के ज़रिए कथित तौर पर पाकिस्तान में हुई हिंसा का वीडियो मुज़फ़्फ़रनगर का बताकर प्रसारित किया गया.
फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी ये वीडियो शेयर किया गया.
'झूठ' इंटरनेट तक सीमित नहीं

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हालांकि कूटनीतिक मामलों के जानकार पुष्पेश पंत का मानना है कि झूठ फैलाने के लिए इस्तेमाल किया जाना सिर्फ़ इंटरनेट तक सीमित नहीं है.
पुष्पेश पंत बताते हैं, “बड़ी पुरानी कहावत है कि अफ़वाह के ना पैर होते हैं ना ही इसकी कोई ज़ुबान होती है. अफ़वाहों को फैलाने के लिए अन्य लोग अपने पैरों का इस्तेमाल करते हैं और अपनी ज़ुबान हिलाते हैं. इसकी शुरुआत करने वाले लोग वे होते हैं जिन्हें लगता है कि किसी शांतिपूर्ण संवाद से वे अपनी बात नहीं मनवा सकते हैं. तो ज़ाहिर है ये वे लोग होते हैं, जो अल्पमत में होते हैं और असामाजिक तत्व होते हैं.”
उनका मानना है कि प्रिंट और टीवी भी अफ़वाहों को बल देते हैं.
पुष्पेश पंत के अनुसार, “ये कहा जा सकता है कि चुनाव के समय ध्रुवीकरण के लिए भी अफ़वाह का सहारा लिया जाता है. किसी सूचना के बाद अगर हिंसा भड़कती है तो क्रिया-प्रतिक्रिया में काफ़ी कुछ होता है और इस दौरान ये पता लगाना बहुत कठिन होता है कि पहले किसकी वजह से हिंसा भड़की थी.”
'मुज़फ़्फ़रनगर' पहला नहीं
मुज़फ़्फ़रनगर दंगा पहला मामला नहीं था जब सूचना और प्रौद्योगिकी तकनीक का प्रयोग सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के लिए किया गया.
इससे पहले साल 2012 में दक्षिण भारत के राज्यों में पूर्वोत्तर के लोगों को निशाने पर लेकर भेजे गए संवेदनशील एसएमएस संदेशों से काफ़ी अफ़रा-तफ़री मची थी.

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स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने एसएमएस संदेशों और इंटरनेट पर लगाम लगा दी थी.
हालांकि ‘सेंटर फ़ॉर इंटरनेट एंड सोसाइटी’ के कार्यकारी निदेशक सुनील अब्राहम का मानना है कि सरकार चाहती तो अफ़वाहों को फैलने से रोकने के लिए और बेहतर क़दम उठा सकती है, बजाय संपर्क माध्यम को बंद करने के.
बीबीसी से विशेष बातचीत में सुनील अब्राहम ने बताया, “जिन संदेशों को बार-बार भेजा जा रहा हो उन्हें पहचानकर उसे आगे प्रसारित किए जाने से रोका जा सकता था. इसके अलावा मोबाइल और इंटरनेट तकनीक इतनी आगे जा चुकी है कि अफ़वाहों के स्रोत का पता लगाया जा सकता है.”
उन्होंने कहा, “पूरी इंटरनेट आबादी पर प्रतिबंध लगाने से बेहतर होता कि ऐसी कार्रवाइयों में लिप्त लोगों की पहचान कर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाती. पूर्ण प्रतिबंध की घटनाओं से लंबी अवधि में सरकार और जनता का ही नुक़सान होता है. क्योंकि यूज़र्स इससे बचने के लिए नए-नए तरीके ढूंढने लगते हैं और सरकार का सर्विलेंस का ख़र्च बढ़ता जाता है.”
क्या कहता है क़ानूनी पहलू?
साइबर क़ानून विशेषज्ञ पवन दुग्गल बताते हैं, “क़ानून अफ़वाह शब्द को मान्यता नहीं देता. अभिव्यक्ति की आज़ादी सभी को है लेकिन इसकी आड़ में नफ़रत फैलाने या अशांति फैलाने की गतिविधियों में लिप्त पाए जाने पर कड़ी कार्रवाई की जा सकती है.”

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आईटी क़ानून के अंतर्गत दोषी पाए जाने पर तीन साल तक की सज़ा हो सकती है.
पवन दुग्गल बताते हैं, “भारतीय आईटी क़ानून कहता है कि अगर कोई अपने मोबाइल या कंप्यूटर से ऐसी जानकारी भेजता है, जो ग़लत है और उसका उद्देश्य किसी व्यक्ति या समुदाय के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाना हो तो, इसे अपराध माना जाता है और इसके लिए तीन साल तक की क़ैद और जुर्माने का प्रावधान है. इसके अलावा पुलिस अन्य धाराओं के तहत भी कार्रवाई कर सकती है.”
लिहाज़ा अगली बार जब आपके मोबाइल या सोशल मीडिया अकाउंट पर कोई संवेदनशील जानकारी भेजी जाए तो उसे संदेह की दृष्टि से देखें. ये भी सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि अफवाहें फैलाने में कहीं आप भी श्रृंखला का हिस्सा तो नहीं?
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