ग्रामीण महिलाओं को सेहत का तोहफ़ा

- Author, विवेकी विनेम्मा
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
दक्षिण भारत के एक ग़रीब और पढ़ाई बीच में ही छोड़ देने वाले युवक अरुणानाचलम मुरुगुनाथनम ने सिनेटरी पैड बनाने की सस्ती तकनीक विकसित कर ग्रामीण क्षेत्र के महिलाओं के स्वास्थ्य में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया है.
इसके लिए मुरुगुनाथनम को क़ीमत भी चुकानी पड़ी, उन्होंने अपना परिवार, पैसा और सामाजिक हैसियत क़रीब-क़रीब खो दिया था. लेकिन उन्होंने अपनी ललक को ज़िंदा रखा. वो कहते हैं, '' यह सब मेरी पत्नी की के साथ शुरू हुआ.''
उनकी शादी 1998 में हुई और उनकी दुनिया पत्नी शांति के ईर्द-गिर्द ही घूमनी लगी. एक दिन उन्होंने देखा कि उनकी पत्नी उनसे कुछ छिपा रही है. वह यह देख कर आश्चर्यचकित रह गए कि वह गंदे कपड़ों के टुकड़े थे, जिन्हें वह अपने मासिक धर्म के दौरान उपयोग करती थी.
मुरुगुनाथनम कहते हैं कि मैंने अपनी पत्नी से पूछा कि वह सैनेटरी पैड का इस्तेमाल क्यों नहीं करती. इस पर उसने कहा कि अगर वह सैनेटरी पैड खरीदेगी तो घर का खर्च कैसे चलेगा.
महंगाई की मार
इस पर पत्नी को प्रभावित करने के लिए वो शहर गए और सैनेटरी पैड खरीद लाए और अपनी पत्नी को दिया. उन्होंने उसे तौला और यह जानकर आश्चर्यचकित रह गए 10 ग्राम से कम भी वजन वाली रूई, जो 10 पैसे की होगी. वह चार रुपए में बिक रही हैं. यह देखकर उन्होंने उसे सस्ता बनाने का फ़ैसला कर लिया.
उन्होंने एक सैनेटरी पैड बनाकर शांति को दिया और उनसे तुरंत उस पर प्रतिक्रिया देने को कहा. लेकिन उन्होंने कहा कि इसके लिए उन्हें कुछ दिन इंतज़ार करना होगा.
इसके बाद उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि औरतों का मासिकधर्म महीने में केवल एक बार होता है. इस पर उन्हें लगा कि प्रतिक्रिया के लिए एक महीना इंतज़ार नहीं कर सकते. इसके लिए उन्हें स्वयंसेवकों की ज़रूरत होगी.
मुरुगुनाथनम को पता चला कि 10 में से केवल एक महिला ही सैनेटरी पैड का इस्तेमाल करती है. यही बात एसी निल्सन के सर्वेक्षण में भी उभर कर सामने आई की केवल 12 फ़ीसदी महिलाएं ही सैनेटरी पैड का इस्तेमाल करती हैं.
वो कहते हैं कि गांवों में महिलाएं मासिक धर्म के दौरान कपड़ों का इस्तेमाल करती हैं, जो कि गंदा भी होता है. इससे बीमारियां भी फैलती हैं.
उन्होंने मेडिकल कॉलेज़ की छात्राओं से संपर्क कर 20 छात्राओं को सैनेटरी पैड के परीक्षण के लिए राजी किया. जब उन्होंने उन छात्राओं से उनका फीडबैक फार्म लिया तो पाया कि केवल तीन छात्राओं ने ही उसे ठीक से भरा है. ऐसे में उनके नतीजों पर विश्वास करने का कोई कारण नहीं था.
ख़ुद पर प्रयोग
इसके बाद उन्होंने उस उत्पाद को ख़ुद पर ही आजमाने का फ़ैसला किया. एक फ़ुटबाल के ब्लैडर से उन्होंने गर्भाशय बनाया और उसने बकरे का ख़ून भरा, जो कि उनके एक सहपाठी कसाई ने दिया था. ब्लड बैंक में काम करने वाला एक उनका एक मित्र एक रसायन देता था, जो कि उस खून को जमने से रोकता था.

इमेज स्रोत, BBC World Service
इस नकली गर्भाशय को अपने कपड़ों के नीचे छिपाकर वो साइकिल चलाते थे और दौड़ते थे. यह देखकर लोगों को लगा कि मुरुगुनाथनम पागल हो गया है. वो कहते हैं कि लोग उन्हें बिगड़ा हुआ मानने लगे. इसी समय उनकी पत्नी को कोई संदेह हुआ और वह उन्हें छोड़कर चली गई.
इसके बाद उन्होंने प्रयोग किए गए सैनेटरी पैड का अध्ययन करने का फ़ैसला किया और मेडिकल छात्राओं के समूह को अपने सैनेटरी पैड प्रयोग के लिए दिए और प्रयोग के बाद उसे वापस लिया. उसे वो अपने घर के पिछवाड़े ले गए और अध्ययन करने लगे. ऐसा करते हुए एक दिन उन्हें उनकी माँ ने देख लिया और वो भी घर छोड़कर चली गईं.
मुरुगुनाथनम के लिए अभी सबसे बड़ा रहस्य यह था कि सफल सैनेटरी पैड बनता किससे है. उन्होंने कुछ सैनेटरी पैड को परीक्षण के लिए प्रयोगशाला भेजा, परिणाम में बताया गया कि वह रूई था. लेकिन उनकी अपनी रूई ने काम नहीं किया.
यही बात वो बहुराष्ट्रीय कंपनियों से पूछना चाहते थे. लेकिन यह कुछ ऐसा ही था जैसे कि कोक बनाने वाली कंपनी से पूछा जाए कि कोक कैसे बनता है.
कंपनियों की दिलचस्पी
उन्होंने एक कॉलेज के प्राध्यपक के जरिए कुछ कंपनियों को अंग्रेजी में चिट्ठी लिखी. इस पर कंपनियों ने उनसे पूछा कि उनके पास किसकी कंपनी है. उन्होंने कहा कि कोयंबटूर में उनकी कपड़े के कारखाने हैं और वो इस धंधे में उतरना चाहते हैं.
कुछ हफ़्ते बाद उन्हें डाक से उन्हें एक रहस्यमय बोर्ड मिला, जो पेड़ की छाल से निकला सेलुलोज था. उन्हें यह जानने में कि सैनेटरी पैड किससे बना होता है, दो साल, तीन महीने लगे. लेकिन अभी भी एक बाधा थी. एक पदार्थ को तोड़कर सैनेटरी पैड में बनाने वाली मशीनों की क़ीमत लाखों डॉलर थी. इसलिए उन्हें अपनी मशीन ख़ुद बनानी पड़ेगी.
साढ़े चार साल बाद वो सैनेटरी पैड बनाने की सस्ती तकनीक विकसित करने में सफल हो पाए. इसमें चार साधारण चरण थे.
मुरुगुनाथनम ने मशीन को जानबूझकर साधारण और लकड़ी के ढांचे से बनाया. उन्होंने अपनी मशीन मद्रास आईआईटी को दिखाई.
वहाँ के वैज्ञानिकों को यह विश्वास नहीं हो रहा था कि इस आदमी ने इसे कैसे बनाया है और यह बहुराष्ट्रीय कंपनियों का मुकाबला कैसे करेगी. लेकिन उन्हें ख़ुद पर भरोसा था.
आईआईटी ने उनकी मशीन को राष्ट्रीय आविष्कार पुरस्कार के लिए भेजा. वहाँ वह 943 प्रतिभागियों में पहले स्थान पर रही. इसके लिए उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील ने सम्मानित किया. इसके बाद वो सुर्खियों में आ गए.
फिर बसा परिवार
उन्होंने बताया कि साढ़े पांच साल बाद उनकी पत्नी ने उन्हें फ़ोन किया, जो उन्हें छोड़ गई थी. इसके बाद उनकी माँ लौट आई और गांव वाले उनकी सराहना करने लगे.
मुरुगुनाथनम ने डेढ़ साल में 250 मशीनें बनाईं, जिन्हें लेकर वो उत्तर भारत के ग़रिब और अविकसित राज्यों में गए. इसके लिए ग्रामीण औरतों से बात करनी पड़ती थी, जो सबसे कठिन काम था.

इमेज स्रोत, BBC World Service
इसके लिए उनके पिता और पति से इजाज़त लेनी पड़ती थी और कपड़े की आड़ में बात करनी पड़ती थी. लेकिन वो अब तक 23 राज्यों के 13 सौ गांवों में यह मशीन लगा चुके हैं.
इस मशीन से सैनेटरी पैड बनाने वाली महिला उसे किसी महिला को ही बेचने को देती है किसी दुकान को नहीं, क्योंकि महिलाएं आराम से उससे पूछ सकती हैं कि इसे प्रयोग कैसे किया जाए.
मुरुगुनाथनम के ग्राहकों में अधिकांश ग़ैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) और महिलाओं के स्वयं सहायता समूह हैं.
हाथ से चलने वाली एक मशीन की क़ीमत क़रीब 75 हज़ार रुपए है. इससे 10 महिलाओं को रोजगार मिलता है और हर महिला इससे एक दिन में क़रीब 300 पैड तक बना सकती है, जो कि ढाई रुपए प्रति पैड की दर से बिक सकता है.
विकासशील देशों पर नज़र
मुरुगुनाथनम की नज़रें अब विकासशील देशों पर है. वो कहते हैं कि उनका इरादा 10 लाख ग़रीब महिलाओं को रोजगार देने का है.
अब वो कीनिया, नाइज़ीरिया, मारिशस, फिलिपीन्स और बांग्लादेश जैसे 106 देशों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं.
मुरुगुनाथनम अब एक फ्लैट में रहते हैं. उनके पास अब एक जीप भी है. वो कहते हैं कि मैंने पैसा नहीं बल्कि बहुत सी ख़ुशिया कमाई हैं.
उनसे एक बार पूछा गया कि क्या राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कार ग्रहण करना उनके लिए सबसे गौरवशाली क्षण था तो, उन्होंने कहा नहीं, सबसे गौरवशाली समय वह था जह उत्तराखंड के एक पहाड़ी गांव में मशीन लगाई.
वहां के लोग इतना पैसा नहीं कमाते थे कि वो अपने बच्चों को स्कूल भेज सकें. मशीन लगाने के बाद एक साल बाद एक महिला ने उन्हें फ़ोन कर कहा कि उनकी बेटी अब स्कूल जाने लगी है.
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