भारतीय मीडिया की मुश्किल: 'लड़की' या 'महिला'?

- Author, एंड्र्यू नॉर्थ
- पदनाम, बीबीसी, दक्षिण एशिया संवाददाता
इन दिनों आप किसी भी भारतीय वेबसाइट या टीवी चैनल को देखें, आपको उन पर यौन हिंसा या उत्पीड़न का कोई-न-कोई मामला ज़रूर दिखेगा.
दिसंबर 2012 में दिल्ली के सामूहिक बलात्कार मामले पर हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद एक बात तो साफ़ है कि मीडिया अब ऐसे मामलों पर ज़्यादा ध्यान दे रहा है.
लेकिन एक और बात जो सामने आ रही है वो ये कि इन मामलों में पीड़ितों के लिए हमेशा 'लड़की' शब्द का ही इस्तेमाल किया जाता है, चाहे उनकी उम्र 18 साल से कितनी भी ज़्यादा क्यों न हो.
कुछ लोगों का मानना है कि इस तरह की सोच दिखाती है कि अब भी महिलाओं के बारे में नज़रिया बदला नहीं है.
'महिला नहीं, लड़की'
इन दिनों सुर्खियों में छाए तीन मामले इस सोच का सटीक उदाहरण हैं.
इन मामलों में आरोपी हैं एक पत्रिका के जाने-माने संपादक, एक राजनीतिक दल के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और सुप्रीम कोर्ट के एक बेनाम पूर्व जज.
जिस पत्रकार ने <itemMeta>hindi/india/2013/11/131121_tarun_tejpal_tehelka_an</itemMeta> के संपादक पर इस महीने की शुरुआत में उसके साथ दो बार यौन दुर्व्यवहार का आरोप लगाया है, अंग्रेज़ी अख़बार द टाइम्स ऑफ़ इंडिया उस महिला पत्रकार को ''<link type="page"><caption> लड़की</caption><url href="http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2013-11-25/india/44449024_1_goa-police-tehelka-tarun-tejpal" platform="highweb"/></link>'' कह रहा है जबकि कहा जा रहा है कि उसकी उम्र 26 से 30 साल के बीच है.
वहीं भारत में <itemMeta>hindi/india/2013/11/131119_gujarat_snooping_sc_sm</itemMeta> के कथित आदेश पर एक 27 वर्षीय महिला की कथित जासूसी के मामले पर एक टीवी चैनल की हेडलाइन कुछ यूं थी, "<link type="page"><caption> लड़की मोदी की बहुत क़रीबी थी.</caption><url href="http://ibnlive.in.com/news/girl-was-extremely-close-to-modi-suspended-ias-officer-on-snooping/435796-3-238.html" platform="highweb"/></link>"
फिर बात आती है उन पूर्व जज की जिन्होंने कथित तौर पर दो महिला इंटर्न का यौन शोषण किया है. इन दोनों के लिए भी लड़की शब्द का ही इस्तेमाल हो रहा है हालांकि इनकी उम्र 20 साल से कुछ ज़्यादा है.
यही हाल दिसंबर 2012 के दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामले में था जहां पीड़िता को आदतन लड़की कहा जाता रहा जबकि उसकी उम्र 23 साल की थी.
ऐसे मामलों में कभी-कभी ''महिला'' या ''युवती'' शब्द का भी इस्तेमाल होता है लेकिन ज़्यादातर पुरुष और महिला दोनों ही लड़की शब्द का इस्तेमाल करते नज़र आते हैं.
किसी विदेशी या दूसरी संस्कृति के व्यक्ति को ये भाषा असंगत या अजीब लग सकती है क्योंकि अगर इन मामलों में पीड़ित पुरुष होते तो उनके लिए कभी भी लड़का शब्द नहीं इस्तेमाल किया जाता.

रूढ़िवादी सोच का नतीजा
साधारण सी वजह सांस्कृतिक दिखती है.
हिंसा की शिकार महिलाओं के लिए एक सहायता संस्था- 'मैत्री' चला रही विनी सिंह कहती हैं, "भारत में बोलचाल की भाषा में जब तक आपकी शादी नहीं हो जाती तब तक आप लड़की ही हैं, शादी के बाद ही आप महिला बनती हैं."
दिल्ली निवासी वकील रेबेका जॉन कहती हैं कि इससे भारतीय पितृ-सत्तात्मक समाज का महिलाओं और उनकी भूमिका के बारे में नज़रिया पता चलता है. रेबेका कई बलात्कार पीड़ितों के मामले लड़ चुकी हैं.
वे कहती हैं, "ये महिलाओं के बारे में पहले से मौजूद धारणाओं का प्रतीक है."
लेकिन पुरुषों और लड़कों के लिए इस तरह का कोई भी शब्द नहीं है.
जानी-मानी मानवाधिकार वकील वृंदा ग्रोवर कहती हैं कि ये फर्क महिलाओं के प्रति असमानता के नज़रिए का प्रतीक है.
वे कहती हैं, "पीड़िताओं को 'लड़की' कहना उस सोच को भी बढ़ावा देता है कि इन्हें सुरक्षा की ज़रूरत है और ये अपनी हिफ़ाज़त ख़ुद नहीं कर सकतीं."
वहीं विनी सिंह कहती हैं, "किसी को लड़की कहने का मतलब है कि हम उसकी समझदारी और गवाही या कथन को ज़्यादा तरजीह नहीं दे रहे क्योंकि उसे एक वयस्क के तौर पर नहीं देखा जा रहा."
लेकिन विनी सिंह के मुताबिक, उनके साथ काम करने वाली बहुत सी युवतियां भी ख़ुद को महिला कहलाना पसंद नहीं करतीं क्योंकि इससे उनकी 'स्वतंत्रता' पर सवाल उठते हैं.
बदलाव की शुरुआत
लेकिन इस तरह की भाषा के इस्तेमाल पर अब सवाल उठ सकते हैं.
दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामले के बाद एक बड़ा बदलाव ये आया है कि अब ज़्यादा महिलाएं हिंसा और उत्पीड़न के खिलाफ़ खुल कर बोल रही हैं.
कई टीकाकारों के मुताबिक तहलका मामले से एक सकारात्मक बात ये हुई है कि महिला पत्रकार के अपना हादसा बताने से अब तक सामने आने से घबरानी वाली और महिलाएं भी आगे आएंगी.
पिछले दिनों मुंबई में बलात्कार की शिकार एक अन्य महिला ने मामले की शिक़ायत कर न सिर्फ़ अपने हमलावरों को चौंका दिया बल्कि ये कदम उठाने के लिए उनकी बहुत तारीफ़ भी हुई.
लेकिन रेबेका जॉन मानती हैं कि ये महज़ शुरुआत है. वे कहती हैं, "भारत अब भी इन आत्मविश्वासी और स्वतंत्र महिलाओं के लिए तैयार नहीं है. हमारा समाज अब तक ये तय नहीं कर पाया है कि महिलाओं की क्या भूमिका होनी चाहिए."
जिस देश में कई बड़े लोकतंत्रों से बहुत पहले ही पहली महिला नेता चुनी गई थी और जिस देश की सबसे ताक़तवर इंसान आज एक महिला है, उस देश में ये सोच एक विरोधाभास लगती है.
तंज़ भरे लहज़े में विनी सिंह कहती हैं, "भारत में बिना शादी किए महिला कहलाए जाने का एक ही तरीका है.....जब आपके बाल सफ़ेद हो जाएं."
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