कछुआ तालाब में आपका स्वागत है

कछुआ पार्क कानपुर

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    • Author, रोहित घोष, कानपुर से
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

कानपुर में भाटिया तिराहे से मुड़ कर जब आप पनकी हनुमान मंदिर की तरफ जायेंगे तो सड़क के बांईं ओर आपको एक बोर्ड दिखायी देगा.

बोर्ड पर लिखा है, "श्री नागेश्वर मंदिर एवं कछुआ तालाब. कछुआ तालाब की विशेषतायें - इसमें बड़े-बड़े कछुएं एवं मछलियाँ करती है निवास."

बोर्ड पर बने तीर के निशान के जब आप अनुकरण करेंगे तब आपके सामने होगा एक मंदिर और उसके पास एक गंदा दिखने वाला तालाब. तालाब की लंबाई और चौड़ाई करीब 70 फुट है.

जब हम वहां पहुंचे तो तालाब के मटमैले पानी में न कछुए दिखाई दिए और न मछलियाँ. पानी एकदम शांत था.

इस बीच स्थानीय निवासी सुनील लालवानी ने तालाब की सीढ़ियों पर पनीर के छोटे-छोटे टुकड़े बिखेर कर कछुओं को आवाज लगाने लगे.

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कछुओं का संसार

पानी की सतह पर थोड़ी हलचल होती है. सीढ़ियों के पास कीचड़ से सना एक कछुआ आता है और पनीर खाना शुरू करता है. फिर दूसरा... तीसरा कछुआ. उन में पनीर खाने की होड़ लग जाती है और थोड़ी देर में वो सारा पनीर चट कर जाते हैं.

पनीर ख़त्म हो जाता है तो सुनील एक ब्रेड का पैकेट फाड़ते हैं और उन्हें ब्रेड देते हैं. पनीर का स्वाद चख चुके कछुओं में ब्रेड खाने की कोई दिलचस्पी नहीं है. पलक झपकते ही वो पानी में वापस चले जाते हैं. पानी की सतह थोड़ी देर में फिर शांत हो जाती है.

सुनील ने बीबीसी को बताया, "मैं पिछले एक साल से हर मंगलवार को इस तालाब में आ रहा हूं. पहले मंदिर में पूजा करता हूं और फिर कछुओं को खाना देता हूं."

कछुआ पार्क कानपुर देवी दयाल पाठक

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एक ऐसे दौर में जब तालाब और पानी में रहने वाले जीव समाप्त होते जा रहे हैं, कानपुर में एक घनी आबादी के बीच कछुए जैसे दुर्लभ प्राणी फल फूल रहें हैं. वह भी बिना किसी सरकारी मदद के.

नागेश्वर मंदिर के पुजारी देवी दयाल पाठक कहते हैं, "इस तालाब और मंदिर की स्थापना उनके पूर्वजों ने की थी, हालांकि ये कब बना इसके बारे में ठीक ठीक जानकारी नहीं है. लेकिन हमें बताया गया है कि ये तालाब 200 साल से अधिक पुराना है."

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दुर्लभ कछुए

देवी दयाल पाठक ने बताया कि उनके पूर्वज पाकिस्तान के सिंध से आकर कानपुर में बस गए थे.

देवी दयाल कहते हैं कि तालाब में सैकड़ों की तादाद में कछुए होंगे और हो सकता है कि उनमें से कुछ की उम्र 100 साल से अधिक हो.

सुनील लालवानी की तरह कई लोग इन कछुओं को खाना खिलाने के लिए यहां आते हैं. देवी दयाल ने बताया, " आसपास के लोग भी कछुओं से प्यार करने लगे हैं और उनकी देखभाल करते हैं."

वो बताते हैं कि दो-तीन बार कुछ लोगों ने तालाब से कछुओं को पकड़ने की कोशिश की थी लेकिन मोहल्ले वालों ने उन्हें पकड़ कर पीट दिया.

पर्यावरणविद् राकेश जयसवाल कहतें हैं, "यहां कुछ कछुए दुर्लभ किस्म के हैं और इनकी संख्या कम होती जा रही है, हालांकि स्थानीय लोग इन कछुओं की काफी देखभाल कर रहें हैं."

राकेश जयसवाल गंगा को साफ़ करने की मुहिम चला रहें हैं. उन्होंने कहा, "गंगा नदी में कछुओं की तादाद कम होती जा रही है. कछुआ तालाब की तरह हम गंगा में भी कछुओं का संरक्षण कर सकते हैं."

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