शेर, भालू, भेड़िए रह गए हैं आधे

- Author, मैट मैग्राथ
- पदनाम, पर्यावरण संवाददाता, बीबीसी
एक नए अध्ययन के मुताबिक दुनिया में शेर, भेड़िए और भालू जैसे तीन-चौथाई बड़े मांसाहारी जीवों की संख्या घटती जा रही है.
<link type="page"><caption> साइंस जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन</caption><url href="http://www.sciencemag.org/content/343/6167/1241484" platform="highweb"/></link> के अनुसार इन जानवरों की संख्या पहले की तुलना में आधी रह गई है. इसके लिए ज़िम्मेदार है मनुष्य जो इन जानवरों का शिकार कर रहा और उन्हें मार रहा है.
शोधकर्ताओं का कहना है कि इन जीवों के ख़त्म होने के कारण दुनिया केको भारी नुकसान हो सकता है. उनका कहना है कि विकसित देशों में अधिकतर मांसाहारी जीव पहले ही विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुके हैं.
शोधकर्ताओं ने जब 31 मांसाहारी जीवों के बारे में शोध किया तो उन्होंने पाया कि अमैज़न, दक्षिण पूर्व एशिया, दक्षिण और पूर्वी अफ्रीका में ये जीव अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं.
ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और मुख्य शोधकर्ता प्रो. विलियम रिपल ने कहा, ''वैश्विक स्तर पर हम अपने बड़े मांसाहारीजीवों को खो रहे हैं. उनका क्षेत्र घट रहा है. इनमें से अधिकतर जानवर स्थानीय या वैश्विक स्तर पर लुप्त होने के कगार पर हैं.''
शोधकर्ताओं का कहना है कि उनके काम से इन कई मांसाहारी जीवों की पारिस्थितिक भूमिका के महत्व के बारे में पता चलता है.
उन्होंने कहा कि जब उन्होंने अमरीका के यलोस्टोन नेशनल पार्क में भेड़ियों और तेंदुओं को देखा तो उन्होंने पाया कि इन बड़े जीवों के घटने के कारण बारहसिंगा और हिरण जैसे जीवों की संख्या बढ़ी है.
वैसे तो इसे एक अच्छी खबर कहा जा सकता है लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि <link type="page"><caption> ऐसे जीवों </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2012/08/120827_wildlife_pictures_gallery_psa.shtml" platform="highweb"/></link>की संख्या बढ़ना वनस्पतियों के अच्छा नहीं है, क्योंकि इससे पक्षियों और अन्य छोटे स्तनपायियों की ज़िंदगी पर नकारात्मक असर पड़ सकता है.
व्यापक असर
इसका असर काफ़ी व्यापक होते जा रहा है. दुनिया में भी ऐसे ही असर देखे जा रहे हैं.
शेर और चीतों की घटती संख्या को अफ्रीका में लंगूरों की बढ़ती संख्या से जोड़ा जा सकता है. लेकिन ये लंगूर अब हाथी की तुलना में फसलों और मवेशियों के लिए बड़ा खतरा बन गए हैं.

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस समस्या की जड़ वह पुरानी सोच है जिसमें कहा गया है कि मांसाहारी जीव नुकसान पहुंचाने वाले और अन्य वन्य जीवों के खतरनाक होते हैं.
उनका कहना है कि इन मांसाहारी जीवों की जटिल भूमिका और आर्थिक व पारिस्थितिक दृष्टि से इनके महत्व को तुरंत स्वीकार करने की जरूरत है.
प्रोफेसर रिपल का कहना है कि इस जीवों के संरक्षण के लिए इनके प्रति इंसान को सहिष्णु बनाना एक बड़ा मुद्दा है.
उन्होंने कहा, ''हम कहते हैं कि इन जीवों के पास जीने का प्राकृतिक अधिकार है, लेकिन वे आर्थिक और पारिस्थिक रूप से हमें लाभ पहुंचाते हैं.''
उन्होंने कहा कि जब इन मांसाहारी जीवों को यलोस्टोन में फिर से लाया गया तो पारिस्थितिकी में तेजी से बदलाव हुआ.
शोधकर्ताओं ने इन बड़े मांसाहारी जीवों के संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहल करने की ज़रूरत बताई है.
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