'मेरे बेगुनाह बेटे ने 23 साल जेल में काटे हैं'

राजीव गांधी शवयात्रा

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पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के मामले में तीन लोगों की मौत की सज़ा को उम्रक़ैद में बदलने के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर उनके परिजनों ने राहत की सांस ली है.

राजीव गांधी मई 1991 में तमिलनाडु में एक चुनावी रैली के दौरान एक आत्मघाती हमले में मारे गए थे. इस मामले में संथन, मुरुगन और पेरारीवालन को अदालत ने 1998 में <link type="page"><caption> मौत की सज़ा</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2011/08/110826_rajiv_assassination_psa.shtml" platform="highweb"/></link> सुनाई थी.

उन्होंने साल 2000 में राष्ट्रपति के पास अपनी माफ़ी की अर्ज़ी दी थी लेकिन 11 वर्षों के बाद राष्ट्रपति ने उनकी अर्ज़ी ख़ारिज कर दी थी.

पहले उन्हें 2011 में फांसी दी जानी थी लेकिन मद्रास हाई कोर्ट के आदेश पर उसे रोक दिया गया था. उसके बाद से ये मामला सुप्रीम कोर्ट में अटका हुआ था.

आख़िरकार मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मंगलवार को इन लोगों की मौत की सज़ा को उम्रक़ैद में बदल दिया.

पेरारीवालन की माँ अरुपताम्मल ने इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, "सबसे पहले मैं सदाशिवम की अध्यक्षता वाली खंडपीठ को धन्यवाद देती हूं. पिछले 23 साल से मैं इस शांति के लिए संघर्ष कर रही थी.

'बेगुनाह'

उन्होंने कहा, "मेरे बेटे ने बेगुनाह होने के बावजूद 23 साल सलाखों के पीछे काटे हैं. हर कोई ये जानता है. मैं कई सालों से इस पल का इंतज़ार कर रही थी और कई बार मुझे छला गया था. यही कारण था कि मैं आज भी घबराई हुई थी कि न जाने क्या होगा."

अरुपताम्मल ने कहा, "मैं दुनियाभर के सभी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की भी आभारी हूं जिन्होंने इस मामले में सक्रिय भूमिका निभाई."

याचिकाकर्ताओं के वकील युग मोहित चौधरी ने बीबीसी संवाददाता इक़बाल अहमद से बातचीत में कहा, "सरकार ने अपनी दलील में कहा कि उसके पास इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि सज़ा देने में इतनी देर क्यों हुई. सरकार ने कहा कि इन लोगों पर जेल में कोई अत्याचार नहीं हुआ और वे जेल में मज़े कर रहे थे."

उन्होंने कहा, "कोर्ट ने फिर पूछा कि जब वे जेल में मज़े कर रहे थे तो फिर बार-बार सरकार को चिट्ठी लिखकर दया याचिका पर फ़ैसला करने का आग्रह क्यों कर रहे थे. कोर्ट ने कहा कि इससे साबित होता है कि ये लोग बदतर मानसिक स्थिति में थे."

वाइको
इमेज कैप्शन, वाइको ने इसे एक ऐतिहासिक दिन बताया.

असर

क्या सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद उन तीनों की रिहाई भी संभव है, इस सवाल के जवाब में चौधरी ने कहा, "जिसे आजीवन कारावास मिलती है उसे कम से कम 14 साल जेल में रहना पड़ता है. उसके बाद सरकार फ़ैसला कर सकती है कि उसे कब रिहा किया जाए. यह राज्य सरकार के हाथ में है कि किस क़ैदी को कब छोड़ना है. हमें उम्मीद है कि तमिलनाडु की सरकार इस मामले में फ़ैसला लेगी."

उन्होंने कहा कि इस फ़ैसले का दूसरे मामलों पर भी असर पड़ेगा. जिन मामलों में मौत की सज़ा देने में देरी हुई है और सरकार के पास इसका स्पष्टीकरण नहीं है, उन मामलों पर इसका असर पड़ेगा.

चौधरी ने कहा, "मेरी राय में यह फ़ैसला मृत्युदंड को समाप्त किए जाने की दिशा में एक अहम क़दम है. इससे साबित होता है कि मृत्युदंड कितनी घृणित चीज़ है. मृत्युदंड पर अभी प्रतिबंध नहीं लगाया गया है लेकिन मैं उम्मीद करता हूं कि एक दिन ऐसा ज़रूर होगा."

एमडीएमके के नेता वाइको ने इसपर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, "आज का दिन ऐतिहासिक है. यह सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में भी अहम दिन है और स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा. पूरे तमिल समुदाय के लिए आज ख़ुशी का दिन है."

टिप्पणी

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और केन्द्रीय मंत्री राजीव शुक्ला ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को देखे बिना इस पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकते हैं.

भाजपा नेता बलबीर पुंज ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर ज़्यादा टिप्पणी नहीं करनी चाहिए पर राजीव गांधी जी की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या की घटना को क़रीब 24 साल हो गए हैं और इतने लंबे समय से हमारी न्याय व्यवस्था दोषियों को सज़ा नहीं दे पाई."

उन्होंने कहा, "इससे पता चलता है कि हमारी न्याय व्यवस्था कितनी धीमी है और ऐसे अहम मामलों में भी कितनी देरी से फ़ैसले आते हैं.

पीडीपी की नेता महबूबा मुफ़्ती ने कहा कि यह अच्छा फ़ैसला है.

इस मौक़े पर अफ़ज़ल गुरू को याद करते हुए महबूबा मुफ़्ती ने कहा, ''काश अफ़ज़ल गुरू के मामले में भी ऐसा हुआ होता तो अच्छा होता. इस फ़ैसले से जम्मू-कश्मीर के लोगों को एक बार फिर महसूस होगा कि उन पर अलग क़ानून लागू होता है और शेष भारत के लोगों पर अलग.''

ग़ौरतलब है कि अफ़ज़ल गुरू को भारतीय संसद पर 2001 में हुए हमले के लिए मौत की सज़ा सुनाई गई थी और उन्हें 2013 में फांसी दे दी गई थी.

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