'सुप्रीम कोर्ट जाएं दिल्ली और केंद्र की सरकारें'

इमेज स्रोत, Reuters
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
दिल्ली की सरकार के प्रस्तावित जनलोकपाल विधेयक के मामले पर जानकार बढ़ते टकराव का हल निकालने की ज़रूरत पर ज़ोर दे रहे हैं.
क़ानूनविद् सोली सोराबजी मानते हैं कि देश में किसी भी विधान सभा को ये अधिकार है कि वो क़ानून बनाए और क़ानून बनाना राज्य सरकार का अधिकार क्षेत्र है.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "क़ानून कैसे बनेगा? पहले राज्य सरकार विधेयक पेश करती है. उस विधेयक पर सदन में चर्चा होगी. वाद-विवाद होगा. विधेयक अगर पारित होता है तो उस पर फिर राष्ट्रपति का अनुमोदन होगा. मगर यहाँ तो विधेयक पेश करने से पहले ही इजाज़त लेने की बात कही जा रही है जो संवैधानिक रूप से ग़लत है. ये कह रहे हैं कि पहले उप राज्यपाल को लिखें. फिर उप राज्यपाल उसे केंद्र सरकार के पास भेजेंगे."
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कह चुके हैं कि अगर ये विधेयक विधान सभा में पारित नहीं हुआ तो वह इस्तीफ़ा दे देंगे.
निगाहें 16 फरवरी पर
सोली सोराबजी ने सवाल किया कि क्या दिल्ली की सरकार केंद्र सरकार का कोई विभाग है?
उनका कहना है कि सिर्फ़ आर्थिक विधेयकों के लिए अनुमति की ज़रूरत है. मगर वह कहते हैं कि इसका मतलब ये नहीं है कि हर किसी विधेयक में जहाँ वित्तीय अनुमोदन की ज़रूरत है, उस पर केंद्र सरकार की इजाज़त ज़रूरी होगी.
वह कहते हैं, "जनलोकपाल विधेयक कोई आर्थिक विधेयक नहीं है. वो भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए लाया जा रहा है. इजाज़त लेना जैसे केंद्र सरकार को दिल्ली की सरकार के फैसलों पर वीटो करने का अधिकार हो."
भारत के अटॉर्नी जनरल रह चुके सोराबजी मानते हैं कि ये एक गंभीर सवाल है क्योंकि ये एक विधेयक के पेश किए जाने पर ही पाबंदी लगाता है.
इस मुद्दे पर राजनीतिक रस्साकशी के बीच सोली सोराबजी मानते हैं कि टकराव के बजाय दोनों ही पक्षों यानी राज्य सरकार और केंद्र सरकार को चहिए कि वे इस मामले के समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएं.
बहरहाल सबकी निगाहें 16 फरवरी पर टिकी हैं जब दिल्ली की सरकार जनलोकपाल विधेयक पेश करेगी.
मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने पहले ही धमकी दी है कि अगर वह इस बिल को विधान सभा में पारित कराने में असमर्थ रहे तो पद से इस्तीफा दे देंगे.
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