बिहारः सीएम के दरबार से वापस, डीएम के दरबार

इमेज स्रोत, MANISH SHANDILYA
- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सरकारी आवास की ओर ले जानी वाली सड़क पर पैरों से निशक्त राजेश कुमार से मुलाकात होती है. हाथों में पड़ा नीला कार्ड यह बता रहा था कि वे नीतीश कुमार से मिल कर आ रहे थे.
मूल रूप से नालंदा जिले के रहने वाले पैंतालीस वर्षीय राजेश पटना में एक कोचिंग सेंटर चलाते हैं. राजेश के राजगीर स्थित पुश्तैनी होटल पर उनके ही गांव के दबंगों ने कथित रूप से कब्ज़ा कर रखा है.
बक़ौल राजेश निचली अदालत ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया है लेकिन अपने होटल पर वापस कब्ज़ा पाने के लिए उन्हें प्रशासनिक मदद की दरकार है. इसकी आशा में वे सोमवार तीन फरवरी को तीसरी बार 'जनता के दरबार में मुख्यमंत्री' में आए थे जिसे आम तौर पर 'जनता दरबार' कहा जाता है.
पिछले पांच महीनों के दौरान अब तक राजेश को तीन बार मुख्यमंत्री से मिलकर गुहार लगानी पड़ी है लेकिन अब तक उनकी परेशानी दूर नहीं हुई है. फिर भी वे इस बात से आश्वस्त दिख रहे थे कि मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद जल्द ही उनकी परेशानी दूर हो जाएगी.
काग़ज़ मिला, कब्ज़ा नहीं
जहां राजेश से मुलाकात हुई उसी सड़क के दूसरी ओर कुछ देर बाद जमुई ज़िले की ममता देवी से मुलाकात हुई. वह भी राजेश की तरह ही मुख्यमंत्री से मिल कर आ रही थीं.
बक़ौल ममता वे अब तक दस बार मुख्यमंत्री से मिल चुकी हैं. उनके पास उपलब्ध काग़जात उनके दावे को सही ठहराते हुए लग रहे थे.

इमेज स्रोत, MANISH SHANDILYA
ममता की परेशानी यह थी कि उन्हें सरकारी ज़मीन का कागज़ तो सौंप दिया गया लेकिन ज़िला प्रशासन उस पर कब्ज़ा नहीं दिला रहा है.
ममता ने बताया कि हर बार मुख्यमंत्री से मिलने पर उन्हें ज़िला स्तरीय अधिकारियों से मिलने को वापस भेज दिया जाता है और किसी वरिष्ठ अधिकारी का नंबर थमा दिया जाता है.
ममता ने आगे बताया कि सोमवार तीन फ़रवरी को जब वह अपनी परेशानी बताते हुए मुख्यमंत्री के सामने रो पड़ीं तो उन्हें यह भरोसा दिलाया गया कि पंद्रह दिनों के अंदर समस्या दूर कर दी जाएगी.
दूसरे के घरों में बर्तन-चौका का काम करने वाली ममता जब भी मुख्यमंत्री से मिलने आती हैं तो उन्हें न सिर्फ एक दिन की मज़दूरी गंवानी पड़ती है बल्कि उनके दो सौ रुपये भी ख़र्च हो जाते हैं.
'जनता दरबार' जिस सोमवार को आयोजित होता है उस दिन पटना में ऐसे सैकड़ों राजेश और ममता राज्य के अलग-अलग हिस्से से अपने परेशानियों के हल की आस लिए मुख्यमंत्री से मिलने आते हैं. इनमें से कई तो सोमवार की सुबह-सुबह या रविवार रात को ही मोटरी-गठरी लिए पटना पहुंच जाते हैं.
केजरीवाल ने पीछे खींचे कदम

इमेज स्रोत, MANISH SHANDILYA
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 2006 यानि कि पिछले आठ सालों से लगातार 'जनता दरबार' आयोजित कर रहे हैं. जबकि पिछले महीने 11 जनवरी को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपना पहला 'जनता दरबार' आयोजित करने के बाद ही इसे वापस ले लिया था.
उस दिन कार्यक्रम में आए हजारों लोगों की भीड़ के कारण पैदा हुई अव्यवस्था के कारण केजरीवाल को कार्यक्रम बीच में ही छोड़ कर जाना पड़ा था.
दूसरी ओर नीतीश कुमार लगातार ऐसा कर रहे हैं. उनका दावा है कि नियमित रूप से जनता से इस तरह मिलकर उनकी समस्याएं सुनने और उसके निपटारे की पहल एक मुख्यमंत्री के रूप में सबसे पहले उन्होंने ही की थी.
13 जनवरी को आयोजित 'जनता दरबार' के बाद आयोजित प्रेस-कांफ्रेंस में नीतीश कुमार ने यह दावा किया था.
गौरतलब है कि नीतीश कुमार इस कार्यक्रम के बाद हर बार पत्रकारों से भी रूबरू होते हैं.
तीसरे शतक की ओर बढ़ते कदम

इमेज स्रोत, MANISH SHANDILYA
मुख्यमंत्री सचिवालय से प्राप्त आंकड़े बताते हैं कि 2006 में 20 अप्रैल को पहली बार नीतीश कुमार इस कार्यक्रम के ज़रिए आम लोगों से मिले थे. तब से अब तक 213 बार यह कार्यक्रम आयोजित हो चुका है. सबसे ज्यादा शुरुआती साल 2006 में चौवन 'जनता दरबार' आयोजित हुए थे.
नीतीश सरकार ने इस कार्यक्रम के नामकरण में भी सावधानी बरती है. ध्यान रखा गया है कि भावनाएं आहत न हों. चूंकि इस दरबार में मुख्यमंत्री हाजिर होते हैं, इस कारण ही इसका पूरा नाम 'जनता के दरबार में मुख्यमंत्री' है.
यह कार्यक्रम महीने के अंतिम सोमवार को छोड़, हर सोमवार आयोजित होता है. हर सोमवार के लिए अलग-अलग विभाग तय किए गए हैं. जैसे अपराध और जमीन संबंधित शिकायतें पहले सोमवार को सुनी जाती हैं तो दूसरा सोमवार स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग से संबंधित शिकायतों के लिए निर्धारित है.
वित्त, विधि, सूचना और जन-संपर्क जैसे आठ विभागों से जुड़ी शिकायतों पर सुनवाई इस कार्यक्रम में नहीं की जाती है. अमूमन यह कार्यक्रम तभी स्थगित होता है जब मुख्यमंत्री राज्य से बाहर रहते हैं या विधानमंडल का सत्र चल रहा होता है.
सुनी जाती है हर शिकायत

इमेज स्रोत, MANISH SHANDILYA
जनता दरबार में हर उम्र के लोग अपनी समस्याएं लेकर आते हैं. मुख्यमंत्री आवास के एक हिस्से में खास तौर पर इस कार्यक्रम के लिए एक हॉल तैयार किया गया है.
लोगों को क़तार में बारी-बारी से मुख्यमंत्री से मिलने का मौक़ा मिलता है. जबकि पहले मुख्यमंत्री ख़ुद घूम-घूम कर लोगों से मिलते थे. शिकायतकर्ता अपनी कुर्सी पर बैठे रहते थे और मुख्यमंत्री खड़े होकर उनकी बातें सुनते थे. हालांकि महिलाओं और निशक्त लोगों से मुख्यमंत्री आज भी इसी तरह मिलते हैं.
कार्यक्रम नियत समय यानि की सुबह दस बजे पर शुरू हो जाता है लेकिन इसके समापन का कोई समय निर्धारित नहीं किया गया है. मुख्यमंत्री द्वारा दरबार में आए हरेक व्यक्ति की शिकायत सुनने के बाद ही यह समाप्त होता है.
मुख्यमंत्री हरेक शिकायती आवेदन पर ग़ौर करने के बाद उसे ज़रूरी कार्रवाई के लिए संबंधित विभाग में भेज देते हैं. मुख्यमंत्री के कुर्सी के आस-पास के अधिकारी में से कोई एक शिकायतकर्ता को विभागीय मंत्री या अधिकारी तक ले जाते हैं. गौरतलब है कि इस कार्यक्रम में विभागों के मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी भी निर्धारित सोमवार को उपस्थित रहते हैं.
कार्यक्रम के दौरान वे लोग अपना आक्रोश भी जताते हैं बार-बार आने के बावजूद जिनकी समस्याएं दूर नहीं हो पाती हैं. कई तो मुख्यमंत्री के सामने ही अपना आपा खो बैठते हैं. ऐसा होते ही वहां उपस्थित मीडियाकर्मी ब्रेकिंग न्यूज की आस में उस ओर दौड़ पड़ते हैं.
रस्म बन जाने का खतरा

इमेज स्रोत, MANISH SHANDILYA
'जनता दरबार' को बिहार की जनता इंसाफ पाने के अंतिम ठौर के रूप में देखती है. एक मुख्यमंत्री की ऐसी उपलब्धता और उनमें आम लोगों का विश्वास सकारात्मक बात है.
लेकिन मूल सवाल है कि मुख्यमंत्री से मिलने वालों की शिकायतें दूर हो रही हैं कि नहीं?
जनता दरबार में और इससे बाहर निकले जितने भी शिकायतकर्ताओं से मुलाकात बीबीसी ने की उनकी प्रतिक्रिया का सार यह था कि वे इसको लेकर बहुत भरासेमंद नहीं थे कि मुख्यमंत्री से मिलने के बाद उनकी परेशानी दूर हो ही जाएगी.
ऐसा कहने वालों में वे भी शामिल थे जो पहली बार मुख्यमंत्री से मिलने आए थे. जिन्हें दोबारा या इससे अधिक बार आना पड़ा था उनका चक्कर काटना ही कार्यक्रम की सफलता की कहानी बयान करने के लिए काफी था.
'जनता दरबार' अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल क्यों नहीं हो रहा है, इसे दो प्रतिक्रियाओं के जरिए समझा जा सकता है.

इमेज स्रोत, MANISH SHANDILYA
इस बारे में सामाजिक कार्यकर्ता उदय का कहना है, "नौकरशाही से परेशान जनता मुख्यमंत्री से मिलने जाती है और मुख्यमंत्री फिर जनता को उसी के भरोसे छोड़ देते हैं. ऐसे में जब तक सरकार नौकरशाही को जनपक्षीय नहीं बनाती, उस पर अंकुश नहीं लगाती, तब तक ऐसे कार्यक्रमों से बहुत कुछ नहीं बदलेगा."
वहीं दूसरी ओर 'जनता दरबार' में आने वाले राजेश कुमार भी कहते हैं कि उन्हें पता है कि अदालत के आदेश के बावजूद अफ़सर आसानी से उनका काम नहीं करने वाले.
ऐसे में वे संबंधित अफसरों पर मुख्यमंत्री का दवाब बनाने के लिए जनता दरबार में आते रहते हैं.
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi " platform="highweb"/></link>. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi " platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi " platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>












