कैंसर ने और मज़बूत किया इनका हौसला

इमेज स्रोत, Neeraja Malik
"कैंसर उतना भयावह नहीं होता, जितना उसका डर. लेकिन डर काल्पनिक होता है. उस पर अगर आपने क़ाबू पा लिया तो समझो आपकी आधी जीत तय है."
ये कहना है चेन्नई की रहने वाली 59 वर्षीय नीरजा मलिक का. उन्होंने एक नहीं दो-दो बार कैंसर का ना सिर्फ़ सामना किया बल्कि उसे मात भी दी.
विश्व कैंसर दिवस के मौक़े पर हमने ऐसे ही कुछ लोगों से बात की जिन्होंने इस भयावह बीमारी पर विजय पाई.
'मर-मर के क्यों जिऊं?'
चेन्नई निवासी 59 साल की नीरजा मलिक को एक नहीं बल्कि दो बार कैंसर हुआ. नीरजा को साल 1998 में पता चला कि उनके बाएं स्तन में कैंसर है. इसके बाद उनका इलाज हुआ और वो ठीक हो गईं.
लेकिन पांच साल तक कैंसर मुक्त रहने के बाद एक बार फिर 2004 में उनके दाहिने स्तन में इस बीमारी का पता चला. इस बार भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और दूसरी बार भी इस बीमारी को उन्होंने पराजित कर दिया.
बीबीसी से बात करते हुए नीरजा ने कहा, "जब पहली बार मुझे इस बीमारी का पता चला तो डॉक्टरों ने कहा कि बचने की उम्मीद सिर्फ़ 25 फ़ीसदी है. लेकिन मैंने अपने आपसे कहा कि मेरे जीने या मरने की उम्मीद बताने वाले ये डॉक्टर कौन होते हैं? मैंने इसके इलाज को बेहद सकारात्मक रूप से लिया. इलाज बहुत मुश्किल था लेकिन मुझे जीने की उम्मीद थी. मुझे लगा कि एक ही ज़िंदगी मिली है उसे मर-मर के क्यों जिऊं?"
नीरजा का आत्मविश्वास रंग लाया और अब वह पूरी तरह से ठीक हैं. नीरजा कैंसर से पीड़ित मरीज़ों की काउंसिलिंग भी करती हैं.
शुरुआती चरण में पता लगना ज़रूरी

नीरजा जैसी ही दास्तान दिल्ली की रीता अय्यर की भी है.
वह आज से पांच साल पहले अपने सामान्य मेडिकल चेकअप के लिए गई थीं तब उन्हें स्तन कैंसर की बीमारी का पता चला. वह कहती हैं, "पूरे इलाज के दौरान मेरे परिवार का मुझे पूरा सहयोग रहा. उस वजह से मैं सकारात्मक मानसिकता बनाए रखने में कामयाब रही."
रीता बताती हैं कि इलाज बहुत हिला देने वाला था और इसके लिए ख़ासी हिम्मत जुटानी पड़ी.
साथ ही वह कहती हैं, "इस बीमारी का शुरुआती दौर में ही पता लगना भी बहुत अहम है. मुझे बीमारी से उबरे पांच साल हो गए हैं. मैं इसके बाद और ज़्यादा पॉजिटिव हो गई हूं. पहले तो मुझे ज़रा-ज़रा सी बात में घबराहट होने लगती थी."
युवराज की कैंसर से जंग

क्रिकेटर युवराज सिंह के कैंसरग्रस्त होने और फिर उससे उबरने की दास्तां से भला कौन वाकिफ़ नहीं. युवराज की मां शबनम ने बताया कि साल 2011 के विश्व कप के दौरान पहली बार उन्हें इस बीमारी का पता लगा.
शबनम कहती हैं, "हमारे तो पैरों तले ज़मीन ही सरक गई. जब युवी ने ये बात सचिन तेंदुलकर और अपने दूसरे साथी खिलाड़ियों को बताई तो किसी को यक़ीन नहीं हुआ. सचिन ने उससे कहा कि तुझे कैंसर हो ही नहीं सकता."
शबनम ने बताया कि युवराज को हालांकि पहले ही चरण में कैंसर का पता लग गया था और डॉक्टरों ने कह दिया था कि वह ठीक हो जाएंगे.
"लेकिन हमें बता दिया गया था कि इलाज बहुत स्ट्रॉन्ग होगा. वाकई ये हिला देने वाला अनुभव था. युवी दर्द की वजह से रोने लगता था. लेकिन मैं इस दौरान पूरी तरह से आशावान थी क्योंकि मुझे पता था कि ये इलाज उसकी बेहतरी के लिए हो रहा है. पूरी बीमारी के दौरान वो हमेशा मेरी तरफ़ ही उम्मीद भरी नज़रों से देखता था."
शबनम के मुताबिक़ इलाज के दौरान युवराज के प्रशंसकों और साथी खिलाड़ियों का जो प्यार था वो उन्हें मौत के मुंह से खींच लाया.
वह कहती हैं, "इलाज के दौरान एक दफ़ा सचिन उससे मिलने आए. सचिन से मिलकर भी उसे बहुत प्रेरणा मिली."
बीमारी से उबरने के बाद जब पहली बार युवराज सिंह एनसीए (नेशनल क्रिकेट अकादमी) गए तो वह बल्ला पकड़ते हुए भी कांप रहे थे और उन्होंने अपनी मां को फ़ोन करके कहा, "ये मुझसे नहीं होगा. मैं वापस आना चाहता हूं." लेकिन एक दिन के ब्रेक के बाद ही उनका मन फिर से बदल गया और उन्होंने हिम्मत जुटाकर प्रैक्टिस शुरू कर दी और टीम में वापसी कर दिखाई.
फ़िलहाल युवराज और उनकी मां शबनम सिंह, कैंसर से जुड़ी जागरूकता मुहिम के तहत काम कर रहे हैं.
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