दर-दर भटकती विश्व चैंपियन

विंध्यावासिनी अपने सभी पदक और प्रमाण पत्र वापस करना चाहती हैं
इमेज कैप्शन, विंध्यावासिनी अपने सभी पदक और प्रमाण पत्र वापस करना चाहती हैं
    • Author, नीरज सिन्हा
    • पदनाम, रांची से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

"खेलने का हौसला अब भी है. परफ़ॉर्म भी ठीक कर रही हूं. लेकिन अभावों भरी जिंदगी टीस देती है वो सरकारी घोषणाएं. सच पूछिए, तो नौकरी के आसरे थक गई हूं. घोषणा के अनुरूप सरकार ने इनाम की राशि नहीं दी और ना ही नौकरी. तो ये पदक और प्रमाण पत्र भी वही रखें."

यह कहते हुए विंध्यवासिनी की आंखें भीग जाती हैं. 2012 में भारतीय टीम कबड्डी की विश्व चैंपियन बनी थी. बोकारो की रहने वाली विंध्यवासिनी भारतीय टीम की सदस्य हैं. लिहाजा उन्हें भी स्वर्ण पदक मिले थे.

तब विंध्यवासिनी के शानदार प्रदर्शन पर गर्व जताते हुए झारखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा उन्हें दस लाख रुपए का इनाम और सरकारी नौकरी देने की घोषणा की थी.

विंध्यवासिनी बताती हैं कि 16 मार्च 2012 को बोकारो में आयोजित सरकारी विकास मेले में मुख्यमंत्री की घोषणा ने उनकी जिंदगी में नई रोशनी, नई उर्जा भरी दी थी.

लेकिन दो साल पूरे होने को हैं, सरकार ने उन्हें कुछ नहीं दिया.

पदक व प्रमाण पत्र

पिछले हफ़्ते विंध्यवासिनी स्वर्ण पदक, प्रमाण पत्र के साथ दरख़्वास्तों का पुलिंदा लेकर झारखंड सरकार के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को वापस करने रांची आई थीं.

वो बताती हैं कि मुख्यमंत्री बहुत व्यस्त थे. उन्होंने मेरे पदक तो नहीं लिए लेकिन मेरी दरख्वास्त जरूर ली. भरोसा दिलाया कि 'देखता हूं'.

मुख्यमंत्री से आपने क्या कुछ कहा है, इस सवाल पर वो कहती हैं, "मैंने तत्कालीन मुख्यमंत्री की घोषणा याद दिलाई. अधिकारियों को लिखे दरख्वास्तों के बारे में जानकारी दी है."

यह भी बताया कि बोकारो जिले के तत्कालीन उपायुक्त सुनील कुमार ने सरकार के खेलकूद विभाग को राशि देने के लिए पत्र भी लिखे थे.

तो क्या आप पदक, प्रमाण पत्र लौटाने को अब भी तैयार हैं, विंध्यवासिनी कहती हैं, "अबकी बार तो अपनी मां और छोटी बहनों के साथ जाऊंगी और पदक व प्रमाणपत्र वापस करके ही लौटूंगी."

कठिन ज़िंदगी

विंध्यवासिनी के पिता सच्चिदानंद सिन्हा बोकारो स्टील प्लांट के कर्मचारी थे. वो 2004 में ही सेवानिवृत हो गए थे. एक जनवरी 2012 में उनका निधन हो गया.

विंध्यवासिनी बताती हैं कि जिस दिन उनके पिता का श्राद्ध कार्यक्रम था, उसी दिन दिल्ली से ख़बर आई थी कि कैंप के लिए उनका चयन हुआ है, वे शीघ्र दिल्ली आएं. भारी मन से वो दिल्ली के लिए रवाना हुई थीं.

विंध्यवासिनी की परिवार मुफलिसी में जीवन गुज़ार रहा है
इमेज कैप्शन, विंध्यवासिनी की परिवार मुफलिसी में जीवन गुज़ार रहा है

वो बताती हैं कि मां को सिर्फ़ पांच सौ रुपए पेंशन के रूप में मिलते हैं. दो बड़ी बहनों की शादी हो गई हैं.

वे ख़ुद तीसरे नंबर पर हैं, दो छोटी बहनें अमृतलता व हेमलता भी बैंडमिंटन की उम्दा खिलाड़ी हैं. उन्होंने स्नातक तक पढ़ाई की है. दोनों छोटी बहनें भी पढ़ाई कर रही हैं.

वो कहती हैं कि स्कॉलरशिप के कुछ पैसे मिले थे, जो पढ़ाई और घर चलाने में ख़र्च हो गए.

अब वे बीपीएड में दाखिला लेना चाहती हैं. लेकिन आर्थिक परेशानी आड़े आ रही हैं.

वो कहती हैं, "बड़ी बहनें मदद न करें, तो भूखे सोने की नौबत आ सकती है. मां की अलग चिंता है कि बेटियों के ब्याह कैसे होंगे."

सिर्फ़ वादे

वे बताती हैं कि भारतीय टीम से खेलने वाली साथी खिलाड़ियों को उनके राज्यों की सरकारों ने ख़ूब इनाम दिए और पढ़ाई के हिसाब से नौकरी भी. लेकिन वो अभाव में ही रह गई.

खिलाड़ियों को मदद करने में तत्पर रहे बोकारो के पूर्व वेट लिफ्टर अनिल कुमार कहते हैं कि खिलाड़ी जब मेडल जीतता है, तो उसे सीने से लगा लेता है.

तमाम अभावों के बीच विंध्यवासिनी ने भी जब पदक जीते थे, तो उन्हें लगा यह पदक उनके आगे बढ़ने का सहारा बनेगा. लेकिन अब वो अपना पदक ही लौटा देना चाहती है.

वे बताते हैं कि सरकारी अधिकारियों से मिलते, पत्र लिखते वे लोग निराश हो गए हैं.

वरिष्ठ खेल पत्रकार अजय कुकरेती कहते हैं कि झारखंड सरकार के मुख्यमंत्री और मंत्री कई मौके पर राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों को नौकरी देने की घोषणा ख़ूब करते हैं, लेकिन सरकारें कभी इस पर गंभीर नहीं होती.

उनका कहना है कि झारखंड में खेल नीति ही दोषपूर्ण है औ नियुक्ति नियमावली भी स्पष्ट नहीं है.

कुकरेती बताते हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर के एथलीट अनमोल रतन टेटे को जब झारखंड में नौकरी नहीं मिली, तो वे खेलने उड़ीसा चले गए. वहां उन्हें अच्छी नौकरी मिल गई.

राज्य के कई उम्दा खिलाड़ियों की उम्र नौकरी की आस में गुजर रही है.

'मज़ाक बनी खेल नीति'

विंध्यवासिनी
इमेज कैप्शन, विंध्यवासिनी को सम्मान नहीं नौकरी चाहिए

झारखंड सरकार की खेल मंत्री गीताश्री उरांव कहती हैं, "राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों को नौकरी देने की घोषणाएं होती रही हैं. विंध्यवासिनी के बारे में फाइल देखूंगी कि अब तक क्या कार्रवाई हुई है."

क्या पूर्व सरकार की घोषणा पर वर्तमान सरकार अमल करना नहीं चाहती, इस सवाल पर उन्होंने, कहा ऐसा नहीं है. उन्होंने कहा कि खिलाड़ियों के नियोजन को लेकर नियमावली का ड्राफ्ट नए सिरे से बनाया जा रहा है.

उरांव कहती हैं, "सरकार खिलाड़ियों को आगे बढ़ते देखना चाहती है, हताश होते नहीं."

झारखंड कबड्डी संघ के महामंत्री विपिन सिंह मंत्री की बातों से इत्तेफाक नहीं रखते.

वे कहते हैं कि झारखंड में खेल नीति ही मज़ाक बनी है. विंध्यवासिनी जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के पदक विजेता इस राज्य में रोटी के लिए तरस रहे हैं, जबकि दूसरे राज्यों की अच्छी नीतियों की वजह से खिलाड़ियों की छाती चौड़ी रहती है.

सरकार ही नहीं, बोकारो स्टील प्लांट ने भी विंध्य़वासिनी को नौकरी देने में दिलचस्पी नहीं दिखाई.

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