सत्ता के चक्रव्यूह में केजरीवाल की उलझन

- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की संभावना बढ़ती जा रही है क्योंकि नई सरकार के गठन को लेकर गतिरोध बना हुआ है.
उपराज्यपाल नजीब जंग ने पहले सबसे बड़े दल के रूप में उभरी भाजपा से सरकार बनाने के बारे में पूछा लेकिन भाजपा ने कहा उसके पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त बहुमत नहीं है.
इसके बाद जब आम आदमी पार्टी या 'आप' को सरकार बनाने के लिए न्यौता दिया गया तो पार्टी ने भाजपा और कांग्रेस से समर्थन लेने के लिए शर्तों की एक फेहरिस्त सामने रख दी. इस पर भाजपा ने <link type="page"><caption> 'आप' पर सरकार बनाने से पीछे हटने का इलज़ाम</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/12/131214_reactions_kejriwal_letters_to_bjp_congress_dil.shtml" platform="highweb"/></link> लगाया.
भाजपा ने जब <link type="page"><caption> सरकार बनाने से इंकार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/12/131212_delhi_lg_najeeb_jung_ap.shtml" platform="highweb"/></link> किया, तब से आम आदमी पार्टी पर सरकार के गठन का दबाव बढ़ता जा रहा है. पहले पार्टी के नेता केजरीवाल ने कहा कि वो दोबारा चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं. पार्टी के खेमे में भी ये पैग़ाम गया कि दुबारा चुनाव की तयारी की जा रही है
'आप' की दुविधा

पार्टी नेता योगिंदर यादव ने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में साफ़ कहा कि उनकी पार्टी न तो किसी को समर्थन देगी और न ही समर्थन लेगी. लेकिन अरविंद केजरीवाल ने शनिवार को उपराज्यपाल से मिलने के बाद सत्ता की बागडोर सँभालने से इंकार नहीं किया बल्कि सरकार के गठन के लिए <link type="page"><caption> कांग्रेस और भाजपा के सामने 18 शर्तें</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/12/131214_kejriwal_demands_to_bjp_congress_dil.shtml" platform="highweb"/></link> रखीं.
'आप' के लिए ये एक कठिन समय है. पार्टी फिलहाल एक कश्मकश और दुविधा के दौर से गुज़र रही है. 'आप' का एक आंदोलन से एक राजनीतिक पार्टी तक का सफ़र तो आसान और तेज़ रफ़्तार वाला था लेकिन राजनीतिक पार्टी से सत्तारूढ़ पार्टी बनने का सफ़र कठिनाइयों से भरा है. इसका पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को अंदाज़ा है. सत्ता उनके इतना नज़दीक होते हुए भी काफी दूर है.
अगर 'आप' सरकार बनाने से सीधे तौर पर इंकार कर देती है तो उसे डर है कि उसके आलोचक कहेंगे कि पार्टी ने वोटरों के आदेश का अपमान किया है.
कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने कहा 'आप' सरकार बनाये और जनता से किए गए वादों को पूरा करे. यानी बिजली का दाम आधा करे और दिल्ली को पूरी तरह से एक राज्य बनाने के अपने वादे को भी पूरा करे.
राजनीतिक बदलाव

जाहिर तौर पर पार्टी अगर सत्ता संभालती है तो उसे अपने तमाम चुनावी वादे पूरे करने होंगे. पार्टी को खतरा इस बात का है कि सत्ता में ग़लतियाँ हो सकती हैं, जिसका आम चुनाव में उसके प्रदर्शन पर बुरा असर पड़ सकता है.
स्वतंत्र भारत के इतिहास में शायद ये पहला मौक़ा है जब एक सियासी पार्टी कम सीटों के कारण सरकार के गठन से इंकार कर रही. पार्टी के नेताओं का कहना है कि उनकी पार्टी ने राजनीतिक खेल के तौर-तरीकों को बदला है.
<link type="page"><caption> दिल्ली विधानसभा चुनाव</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/12/131209_assembly_elections_analysis_madhukar_ap.shtml" platform="highweb"/></link> से पहले के कई चुनावों में निर्वाचित विधायकों की खरीद और फ़रोख्त आम बात थी लेकिन इस बार 'आप' से डर कर किसी भी पार्टी ने विधायकों को खरीदने की कोशिश नहीं की.
ये अलग बात है कि 'आप' सत्ता संभालती है या नहीं, लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इसने राजनीतिक माहौल को बदल डाला है.
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