'मुलायम को मुसलमानों के वोट ने बड़ा बनाया'

मुसलमान
    • Author, इक़बाल अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली.

''आज का भारतीय मुसलमान हर तरफ़ से मायूस है. कांग्रेस के सेक्युलर स्लोगन से, मुलायम सिंह के सोशलिस्ट स्लोगन से, मायावती के दलित स्लोगन से. आज तक किसी स्लोगन ने उसकी उन्नति के लिए कुछ नहीं किया.''

ये कहना है अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में समाज शास्त्र पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर अब्दुल वहीद का और शायद कई मुसलमान अपनी मौजूदा स्थिति के लिए प्रोफ़ेसर वहीद की इस बात से सहमत भी होंगे.

दरअसल ये बात इसलिए भी अहम हो जाती है कि 2002 के गुजरात दंगों के बाद 2004 में धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व में जो यूपीए सरकार बनी उसने नौ साल के कार्यकाल में मुसलमानों के लिए क्या किया इस पर भी मुसलमान समुदाय में बहस जारी है.

विकास के आंकड़ों से ऐसा लगता है कि कुछ एक चीज़ों को छोड़ दिया जाए तो मुसलमान इस सरकार से ख़ुश नहीं हैं.

उत्तरी भारत के कई शहरों में 80 और 90 के दशक में साम्प्रदायिक दंगों के बाद मुसलमानों ने कांग्रेस से रिश्ता तोड़कर जनता दल, राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जैसी क्षेत्रीय पार्टियों को अपना समर्थन देना शुरू कर दिया था.

राज्य सभा में निर्दलीय सांसद मोहम्मद अदीब कहते हैं कि हर राजनीतिक पार्टी चुनावी घोषणा पत्र अलग बनाती है और उस पर अमल उससे अलग करती है.

मुसलमानों के विकास के लिए तो इन पार्टियों ने भी कुछ ख़ास नहीं किया था लेकिन इतना ज़रूर था कि दंगों के शिकार मुसलमानों के लिए शांति का माहौल ही शायद बहुत था.

एएमयू के छात्र

लेकिन मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद अब इस तरह के विकल्प पर भी गंभीर सवाल उठने लगे हैं.

ग़ौरतलब है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर और शामली ज़िले में इसी साल सिंतबर में हुए साम्प्रदायिक दंगों में सरकार के अनुसार 62 लोग मारे गए थे जिनमें 46 मुसलमान और 16 हिंदू थे.

उन दंगों के कारण दूर-दराज़ के गांवों में रहने वाले मुसलमान अपनी जान बचाने के लिए आज भी हज़ारों की संख्या में राहत शिविरों में रह रहे हैं.

'कहां जाएं'

सांसद मोहम्मद अदीब कहते हैं कि आज मुसलमानों की समझ में ये नहीं आ रहा कि वे जाएँ तो किसके पास जाएँ.

उनके अनुसार मुसलमान तो वोट डालने की एक मशीन है जो हर वक़्त किसी न किसी को वोट देता रहता है.

मोहम्मद अदीब
इमेज कैप्शन, सांसद मोहम्मद अदीब के अनुसार मुसलमान इस समय बहुत लाचार महसूस कर रहा है.

मोहम्मद अदीब कहते हैं, ''कांग्रेस ने सोच रखा है कि मुसलमान मजबूर होकर हमें ही वोट देगा. मुलायम सिंह को उसने (मुसलमानों ने) अपना मसीहा समझा था. अब ये अंदाज़ा हो रहा है कि मुलायम सिंह एक छोटी पार्टी के छोटे नेता थे, मुसलमानों ने अपने वोट की ताक़त से उन्हें बड़ा बना दिया था.''

अलीगढ़ विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर असमर बेग कहते हैं कि 90 के दशक से उत्तर प्रदेश के ज़्यादातर मुसलमान समाजवादी पार्टी को वोट दे रहे थे. उनके अनुसार 2009 के चुनाव के समय मुलायम सिंह को लगा कि मुसलमानों के पास कोई विकल्प नहीं है जिस कारण उन्होंने कुछ ऐसे काम किए जिससे लगा कि वह मुसलमानों का अपमान कर रहे थे.

प्रोफ़ेसर बेग के अनुसार मुलायम सिंह अपनी पार्टी में कल्याण सिंह को ले आए. भाजपा के राजनाथ सिंह के ख़िलाफ़ ग़ाज़ियाबाद में और अजीत सिंह के बेटे जयंत चौधरी के ख़िलाफ़ मथुरा में अपना कोई उम्मीदवार नहीं खड़ा किया.

प्रोफ़ेसर बेग कहते हैं कि 2009 में मुसलमानों ने मुलायम सिंह से अपनी नाराज़गी ज़रूर दिखाई लेकिन 2012 के विधान सभा में फिर उन्हें जमकर वोट दिया.

लेकिन उत्तर प्रदेश में अखिलेश सरकार के डेढ़ साल के कार्यकाल में छोटे-बड़े 100 दंगे हो चुके हैं और मुसलमानों से किया गया एक भी चुनावी वादा अब तक पूरा नहीं हो सका.

तो क्या मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के बाद मुसलमानों के लिए कोई संकट पैदा हो गया है कि वे किस पार्टी पर विश्वास करें?

एएमयू के प्रोफ़ेसर अब्दुल वहीद और प्रोफ़ेसर असमर बेग

दिल्ली स्थित वरिष्ठ पत्रकार सीमा चिश्ती ऐसा बिलकुल भी नहीं मानतीं. वह कहती हैं, ''ये पहली बार नहीं हैं जब मुलायम सिंह से मुस्लिम वोट भागा हो. इसलिए ये मुलायम सिंह के लिए संकट है, मुसलमानों के लिए नहीं.''

मुस्लिम आकांक्षा

राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों की स्थिति के बारे में सीमा चिश्ती उतनी अधिक चिंतित नहीं दिखाई पड़ती हैं.

सीमा कहती हैं कि यूपीए के दस सालों में मुसलमानों को अपनी सुरक्षा को लेकर जो चिंताएं थीं, वो बहुत हद तक दूर हो गईं थीं. सीमा के अनुसार गुजरात (2002) के बाद और मुज़फ़्फ़रनगर (2013) से पहले तक इन वर्षों में कुछ छोटे-मोटे दंगे ज़रूर हुए लेकिन वे कभी राष्ट्रीय चुनौती के रूप में उभर कर नहीं आए जैसा कि गुजरात में हुआ था.

सीमा के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में भारत में जो आर्थिक और तकनीकी बदलाव हुए हैं, मुसलमान बहुत हद तक उस पूरी कहानी का एक अहम हिस्सा रहा है.

सरकारों से मुसलमानों की नाराज़गी या निराशा के बारे में सीमा कहती हैं, ''एक मुसलमान शिकायत तभी करता है, जब उसे उम्मीद है कि उसको चीज़ें मिलेंगी. उसे भी नौकरी, घर, बिजली और पानी सब कुछ चाहिए.''

सीमा के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से भारत में दलित आकांक्षाएं बढ़ी हैं और बहुत हद तक पूरी भी हुईं हैं, आज उसी तरह के दौर से भारत का मुसलमान, ख़ासकर युवा मुसलमान गुज़र रहा है.

देवबंद मदरसा

लेकिन जितनी आशान्वित सीमा चिश्ती हैं शायद मुस्लिम युवा उतने आशान्वित नहीं हैं.

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के बीए के छात्र हारून रशीद कहते हैं, ''मुसलमान युवा तो अपनी परेशानियों में इतना उलझ गया है कि उसे पता ही नहीं चल पा रहा है कि दरअसल समस्या क्या है.''

अलीगढ़ में इंजीनियरिंग के छात्र अमीन अहमद कहते हैं कि जब घर में आग लगी होती है तो पहले घर की आग बुझाई जाती है.

अमीन कहते हैं कि प्रजातंत्र में पूछ उसी की होती है जो संगठित होता और जिसकी आवाज़ में दम होता है. अमीन के अनुसार मुसलमानों के पास न तो राज्य स्तर पर कोई नेता है और न राष्ट्रीय स्तर पर.

क्या मुसलमानों की समस्याओं की असल वजह, मुस्लिम नेतृत्व का अभाव है?

अगर ऐसा है तो आख़िर मुस्लिम नेतृत्व क्यों नहीं उभर सका इतने वर्षों में? क्या मुसलमानों की अपनी पार्टी होनी चाहिए और क्या एक धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र में और ख़ासकर भारत की परिस्थिति में ये संभव है? इन सब पर चर्चा इस ऋंखला की अगली कड़ी में.

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