'महाराज मत कहो ना'

- Author, ऋषि पांडे
- पदनाम, भोपाल से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
किसी युवा बॉलीवुड सितारे की तरह दिखने वाले केंद्रीय ऊर्जा मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्य प्रदेश कांग्रेस की तरफ से दस साल से सत्ता में काबिज़ भारतीय जनता पार्टी को हटाने के लिए उतारे गए हैं.
उनके खानदान की छवि की बात करें तो उनके पिता माधव राव सिंधिया की याद में दिल्ली में एक सड़क का नाम रखा गया और उसे कहा गया "श्रीमंत माधव राव सिंधिया मार्ग."
उनकी दादी के नाम पर दिल्ली में एक दूसरी सड़क का नाम है "राजमाता विजयाराजे सिंधिया मार्ग."
राजस्थान में भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री पद की प्रत्याशी वसुंधरा राजे सिंधिया को लोग 'महारानी' कह कर ही संबोधित करते हैं.
उनकी दूसरी बुआ यशोधरा राजे सिंधिया ग्वालियर से सांसद हैं और उन्हें श्रीमंत ही कहते हैं.
ऐसे में बहुत सारे लोग सिंधिया को सामने देख कर स्वत: महाराज करने लगते हैं. बैनर, पोस्टर और होर्डिंग्स पर भी उनके समर्थक सिंधिया के नाम के साथ महाराजा विशेषण जोड़ना पसंद करते है.
आम आदमी बनने की कोशिश
इस सबके बीच में ज्योतिरादित्य कोशिश कर रहे हैं कि लोग उन्हें महाराज कह कर सम्बोधित ना करें. वो आम लोगों से रैलियों में, पत्रकारों से सभाओं में कांग्रेस कार्यकर्ता से लगातार कहते सुने जा रहे हैं कि वो एक आम आदमी हैं महाराज नहीं.
कारण मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान है जो कि अपने आपको को प्रदेश की सब बच्चियों का 'मामा' कहलवाना पसंद करते हैं.
उम्र, शिक्षा, राजनीतिक, पारिवारिक विरासत और व्यक्तिगत छवि में शिवराज सिंह चौहान के मुक़ाबले इक्कीसे बैठने के बावजूद सिंधिया पूरे प्रदेश में उतने लोकप्रिय नहीं है जितने शिवराज है. पूरे प्रदेश की तो छोडिए ख़ुद उनके संसदीय क्षेत्र में शिवराज की भाजपा ज़्यादा मज़बूत है.
पिछले विधानसभा चुनाव में शिवपुरी संसदीय क्षेत्र की आठ में सात सीटों पर भाजपा ने कब्ज़ा किया था. सिंधिया का प्रभाव मालवा के विदिशा-उज्जैन-इन्दौर-मंदसौर- शाजापुर में भी है. ये सारे क्षेत्र पूर्व में ग्वालियार रियासत का हिस्सा रहे हैं.
सिंधिया कभी कलफ़ किए कपड़े नहीं पहनते, लाल बत्ती लगी गाड़ियों का इस्तेमाल नहीं करते. यहाँ तक कि अपने संसदीय क्षेत्र में घूमते वक़्त गाड़ी का एसी चलाने से भी परहेज़ करते हैं.

सिंधिया मुंह में चांदी का चम्मच ले कर पैदा हुए हैं. भाजपा भी उनके इस सामंती परिवेश को भुनाने से नहीं चूक रही. हालांकि खुद सिंधिया भाजपा वालों से यह सवाल कर चुके हैं कि यदि वे सामंती है तो उनके परिवार के उन सदस्यों के बारे में वह क्या कहना चाहेगी जो भाजपा में हैं.
कांग्रेस द्वारा चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाए जाने के बाद भोपाल में पत्रकारों से बातचीत के दौरान सिंधिया ने कहा था, "भाजपा उन्हें सामंती बता रही है यह आश्चर्यजनक है. क्योंकि मेरी दादी भाजपा की संस्थापक सदस्य थीं और मेरी बुआ राजस्थान की मुख्यमंत्री रही तब इस पार्टी को चिंता क्यों नहीं हुई."
ज्योतिरादित्य सिंधिया की छोटी बुआ यशोधरा भी भाजपा की सांसद है और अब विधानसभा चुनाव लड़ रही हैं.
सबसे युवा
राज्य कांग्रेस में उन्हें सबसे साफ़ सुथरा नेता माना जाता है. मध्य प्रदेश में इस समय मुख्यमंत्री पद के जितने दावेदार हैं उनमें ज्योतिरादित्य सबसे युवा है. वो 42 साल के हैं जबकि शिवराज सिंह चौहान 57 साल के और दिग्विजयसिंह और कमलनाथ 65 पार के हैं .
हालांकि इन नेताओं के मुकाबले दून स्कूल में पढ़े सिंधिया का राजनीतिक अनुभव काफ़ी कम है. और अगर राजनीतिक सक्रियता की बात करें तो साल डेढ़ साल पहले तक वो भी काफ़ी कम थी.
हॉवर्ड से अर्थशास्त्र में ग्रेजुएट ज्योतिरादित्य 2001 में उस समय राजनीति में आए थे जब उनके पिता एक हवाई दुर्घटना का शिकार हो गए थे.
ज्योतिरादित्य को विरासत में अपने पिता के समर्थकों की ऐसी समर्पित फ़ौज मिली, जो पूरे सूबे में फैली हुई है. राजनीति में जमने के लिए उन्हें ज़रा भी पापड़ नहीं बेलने पड़े.
जैसा उनके पिता माधवराव सिंधिया का नाम और क़द था, उस हिसाब से तो ज्योतिरादित्य को काफ़ी पहले पूरे मध्य प्रदेश की राजनीति में छा जाना चाहिए था, लेकिन माधवराव सिंधिया के समकालीन नेताओं ने उनकी राह में रोड़े अटकाने में कोई क़सर नहीं छोड़ी थी.
ऐसे में उनकी राजनीति, अरसे तक सिर्फ ग्वालियर चंबल अंचल की सीमा में क़ैद रही. एक समय तो ऐसा भी आया जब सिंधिया के दौरों की दिल्ली दरबार में शिकायत हुई और दिल्ली से फ़रमान आने के बाद उन्हे दौरे बीच में रोकने पड़े.
दिग्विजय सिंह और उनके बीच की तनातनी कई मर्तबा सामने आई.
क्या बनेगी सरकार?
लेकिन आज कोई छोटा या बड़ा कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य के ख़िलाफ़ सार्वजनिक रूप से बोलता और भीतरघात करता नहीं दिखता.
ऐसा ज्योतिरादित्य सिंधिया के राजनीतिक प्रयासों के कारण हुआ या राहुल गांधी के भय की वजह से, यह विश्लेषण का विषय है.
उनके समर्थकों को लगता है कि सिंधिया का नाम यदि एक साल पहले भावी मुख्यमंत्री के लिए घोषित कर दिया जाता तो आज माहौल कुछ और होता, यह सही है कि पिछले विधानसभा चुनाव के मुक़ाबले इस चुनाव में राज्य में कांग्रेस की स्थिति सुधरी है और वह भाजपा को टक्कर देती नज़र भी आ रही है.
यह तय है कि 2013 के विधानसभा चुनाव में यदि कांग्रेस सफल रहती है तो जीत का सेहरा सिंधिया के सर ही बंधेगा.
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