नीतीश के बिहार में मोदी की रैली के मायने

- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, बिहार से बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
नरेन्द्र मोदी की पटना में रविवार की रैली ख़ास समझी जा रही है. ऐसा ना केवल नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार के एक दूसरे पर तीरों कटाक्षों की वजह से है बल्कि बिहार की 40 लोक सभा सीटों के कारण भी है.
भाजपा ने मोदी की पटना रैली को लेकर एक एड़ी चोटी का ताकत लगा रखी है. भारत के बाकी हिस्सों से कुछ अलग यहाँ भाजपा मोदी को पिछड़े वर्ग के नेता के रूप में पेश कर रही है.
ये ‘हुंकार रैली’ इसलिए भी अहम है कि वही मोदी की वजह से बिहार में 17 साल से चला आ रहा भाजपा और जनता दल यू का गठबंधन टूटा.
हालंकि इस बहुप्रचारित रैली की घोषणा भाजपा ने तब की थी जब वह जदयू के साथ गठबंधन सरकार में शामिल थी. लेकिन अब भाजपा राज्य में मुख्य विपक्षी दल की भूमिका में है.
बिहार भाजपा अध्यक्ष मंगल पांडेय का कहना है कि यह रैली नीतीश कुमार के ‘विश्वासघात’ को धिक्कारने के लिए है.
'प्रचार मोदी मय'

राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन मोदी और भाजपा के लिए इस रैली को तीन वजहों से महत्त्वपूर्ण बताते हैं. पहला, मोदी के नाम पर बिहार में गठबंधन टूटा है. ऐसे में यहां मोदी के नाम पर सफल रैली करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती है.
दूसरा, बिहार 40 सांसदों को लोकसभा भेजने वाला राज्य है और यहां अपने बूते ज्यादा-से-ज्यादा से सीट लाना मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में मददगार साबित होगा. तीसरा ये कि बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जहां क्षे़त्रीय पार्टियां काफी मजबूत है वहां भाजपा के लिए बेहतर प्रदर्शन करना भी एक चुनौती है.
रैली से जुड़ी एक खास बात यह भी है कि बिहार में <link type="page"><caption> नरेंद्र मोदी की</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/09/130928_modi_negative_politics_dil.shtml" platform="highweb"/></link> जातीय पृष्ठभूमि भी महत्त्वपूर्ण हो गई है. उन्हें सूबे में विकास पुरूष के साथ-साथ पिछड़े वर्ग से आने वाले नेता के रूप में भी पेश किया जा रहा है.
लालू प्रसाद यादव के जेल जाने के बाद भाजपा राज्य में नीतीश कुमार विपक्ष की भूमिका में पूरी तरह छा जाना चाहती है और अपने आप को सबसे बड़े विकल्प के रूप में पेश करना चाहती है.
ऐसा विकल्प जिसका नेता बिहार के तमाम नीतीश और लालू प्रसाद की तरह ही पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखने वाला है.

शायद देश में ऐसा सिर्फ बिहार में ही हो रहा है. इसकी वजह वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार यह बताते हैं कि पूरे भारत, खास कर हिंदी पट्टी की राजनीति में जाति की केंद्रीय भूमिका रही है.
बिहार-यूपी जैसे राज्यों में लोहिया के ‘पिछड़ा पावे सौ में साठ’ नारे और उससे जुड़े आंदोलनों का भी काफी असर देखा गया था और मंडल उभार के के बाद तो बिहार का नेतृत्व पिछड़े नेताओं के ही हाथ में है. ऐसे में बिहार में विकास का नारा रटने वाली भाजपा के लिए नरेंद्र मोदी की जाति बताना उसके लिए राजनीतिक रूप से जरूरी भी है और मजबूरी भी.
पूरी ताकत
प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल भाजपा अपने को इस रैली के ज़रिये राज्य में सबसे बड़ी राजनीतिक के रूप में स्थापित करने में लगी हुई है. भाजपा ने रैली को सफल बनाने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है. वैसे चाय दुकान की दुकान से लेकर टी-शर्ट, जलेबी, मेंहदी, साइकिल रैली भाजपा के प्रचार का हर तरीका मोदी मय है.
भाजपा की ओर से कहा गया कि वो रैली में केंद्र से बिहार के लिए पचास हजार करोड़ के विशेष पैकेज की मांग करेगी.
लेकिन रैली के जरिए भाजपा की कोशिश मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को करार जवाब देना है. भाजपा गठबंधन टूटने के लिए जेडीयू से ज्यादा नीतीश कुमार को जिम्मेदार मानती रही है.
इस साल जून में नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा से अलग होकर जदयू ने यह संदेश दिया था कि मोदी के नेतृत्व में भाजपा अब राजनीतिक दलों के बीच स्वीकार्य नहीं होगी.

ऐसे में आम जनता के बीच मोदी की स्वीकार्यता दिखाने के लिए पार्टी ने पूरी ताकत झोंक दी है.
बिहार और देश के बदले राजनीतिक हालात में अब भाजपा के साथ-साथ मोदी के लिए भी यह रैली बहुत ही महत्त्वपूर्ण हो गई है.
तुलना
दूसरी ओर हुंकार रैली के दो दिन पहले भाकपा ने गांधी मैदान में ही <link type="page"><caption> जनाक्रोश रैली</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/10/131025_bihar_rallies_sm.shtml" platform="highweb"/></link> की थी. ऐसे में यह भी लाजिमी है कि इन दोनों रैलियों की तुलना भी होगी.
रैली की तैयारी में झोंके गए संसाधनों और मीडिया में हो रही चर्चा की बात करें तो जनाक्रोश रैली आज के हुंकार रैली के मुकाबले कहीं नहीं टिकती है. लेकिन जनाक्रोश रैली में जुड़ी भीड़ देखकर मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे एक सफल रैली बताया है.
फिलहाल बिहार में भाकपा का एक विधायक है तो भाजपा के इक्नायबे. ऐसे में यह देखना भी दिलचस्प होगा कि भाजपा रविवार को भाकपा के मुकाबले कितनी बड़ी संख्या में समर्थकों को जुटाने में सफल हो पाती है.
साथ ही यह भी दिलचस्प होगा कि जब मोदी पटना में भाषण देंगे तो नीतीश कुमार पटना नहीं अपने गृह जिला नालंदा में होंगे.
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